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चिट्ठी न कोई सन्देश

चिट्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौनसा देस
जहाँ तुम चले गये
इस दिल को लगाकर ठेस, जाने वो कौनसा देस
जहाँ तुम चले गये !!

इक आह भरी होगी, हमने ना सुनी होगी
जाते जाते तुमने, आवाज़ तो दी होगी
हर वक़्त यही है ग़म, उस वक़्त कहाँ थे हम
कहाँ तुम चले गये  !

हर चीज पे अश्क़ों से, लिखा है तुम्हारा नाम
ये रस्ते घर गलियां, तुम्हे कर न सके सलाम
हाय दिल में रह गई बात, जल्दी में छुड़ा के हाथ
कहाँ तुम चले गये  !

अब यादों के कांटे, इस दिल में चुभते हैं
ना दर्द ठहरता है, ना आंसू रुकते हैं
तुम्हे ढूंढ रहा है प्यार, हम कैसे करें इक़रार
कि हाँ तुम चले गये  !

चिट्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौनसा देस
जहाँ तुम चले गये
इस दिल को लगाकर ठेस, जाने वो कौनसा देस
जहाँ तुम चले गये !!





Nida Fazli & Jagjit Singh : Sarfarosh

होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िन्दगी क्या चीज़ है

उन से नज़रें क्या मिली रोशन फिजाएँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाये उन से हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है 


Chausar : Jagjit Singh

हर घड़ी खुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ मुझ ही में है समंदर मेरा

एक से हो गए मौसम हो, कि चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंजर मेरा

किससे पूंछू कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा

मुद्दतें हो गई इक ख्वाब सुनहरा देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा

                                                                " Nida Fazli "

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आईना देख के बोले, ये संवरने वाले,
अब तो बे-मौत मरेंगे, मेरे  मरने वाले

देख के तुमको होश में आना भूल गए
याद रहे तुम और ज़माना भूल गए
जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

चाहा था ये कहेंगे, सोचा था वो कहेंगे
आये वो सामने तो कुछ भी न कह सके
बस देखा किये उन्हें हम

देख कर तुमको यकीं होता है
कोई इतना भी हसीं होता है
देख पाते हैं कहाँ हम तुमको
दिल कहीं होश कहीं होता है

जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

आकर चले न जाना ऐसे नहीं सताना
देकर हंसी लबों को आँखों को नहीं रुलाना
देना न बेक़रारी दिल का क़रार बनके
यादों में खो न जाना इंतज़ार बनके

भूल कर तुमको न जी पाएंगे
साथ तुम होगी जहाँ जायेंगे
हम कोई वक़्त नहीं है हमदम
जब बुलाओगे चले आएंगे

जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

                                            " Nida Fazli "

Voice : Asha Bhonsle & Jagjit Singh

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कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है 
तुमको भूल न पाएंगे हम ऐसा लगता है 

ऐसा भी इक रंग है जो करता है बातें भी 
जो भी इसको पहन ले वो अपना सा लगता है 
तुमको भूल न पाएंगे हम ऐसा लगता है

और तो सब कुछ ठीक है लेकिन 
कभी कभी यूँ ही चलता फिरता शहर 
अचानक तनहा लगता है 
तुमको भूल न पाएंगे हम ऐसा लगता है

अब भी यूँ मिलते हैं हमसे फूल चमेली के 
जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है 
तुमको भूल न पाएंगे हम ऐसा लगता है

                                                        " Nawaz Deobandi "

Voices : Lata ji, Asha ji, Jagjit ji

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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी 
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे 
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशां क्यूँ हो 

उँगलियाँ उठेगी सूखे हुए बालों की तरफ 
इक नज़र देखेंगे गुजरे हुए सालों की तरफ 
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किये जायेंगे 
कांपते हाथों पे भी फिकरे कसे जायेंगे 
लोग ज़ालिम है हर एक बात का ताना देंगे 
बातों बातों में मेरा जिक्र भी ले आएंगे 
उनकी बातों का जरा सा भी असर मत लेना 
वर्ना चेहरे के तास्सुर से समझ जायेंगे 
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे - 2 
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे 
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी 

                                                         " Kafir Aazer "

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Album : Aawaz ( jagjit & chitra singh )

आवारा है गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई 
जाएं तो कहाँ जाएं, हर मोड़ पर रुसवाई 

ये फूल से चेहरे है, हँसते हुए गुलदस्ते 
कोई भी नहीं अपना, बेगाने हैं सब रस्ते 
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई.......मैं और मेरी तन्हाई

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे 
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे 
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई.......मैं और मेरी तन्हाई

आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है 
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है 
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई.......मैं और मेरी तन्हाई

हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है 
रोकर कभी हंसती है, हंसकर कभी गाती है 
ये प्यार की बाहें है, या मौत की अंगड़ाई.......मैं और मेरी तन्हाई

                                                                      " Ali Sardar Jafri "

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मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म-खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद

                                                                  " Ali Sardar Jafri "

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ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए 
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए 

दिल को अपने सजा न दे यूँही 
इस ज़माने की बेरुखी के लिए 

कल जवानी का हश्र क्या होगा 
सोच ले आज दो घड़ी के लिए 

हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ 
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए 

वक़्त के साथ साथ चलता रहे 
यही बेहतर है आदमी के लिए 

                                                       " Sudarshan Fakir "

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तम्मनाओं के बहलावे में अक्सर आ ही जाते हैं 
कभी हम चोट खाते हैं, कभी हम मुस्कुराते हैं 

हम अक्सर दोस्तों की बेवफाई सह तो लेते हैं 
मगर हम जानते हैं, दिल हमारे टूट जाते हैं 

किसी के साथ जब बीते हुए लम्हों की याद आई 
फटी आँखों में अश्क़ों के सितारे झिलमिलाते हैं 

ये कैसा इश्तियाक़-ए-दीद  है और कैसी मजबूरी 
किसी की बज़्म तक जा जा के हम क्यों लौट आते हैं

                                                                   " Ali Sardar Zafri "

इश्तियाक़-ए-दीद : दीदार की लालसा
बज़्म : महफ़िल

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नशीली रात में जब तुमने ज़ुल्फ़ों को संवारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है 

गुलों को मिल गई रंगत तुम्हारे सुर्ख गालों से 
सितारों ने चमक पाई तबस्सुम के उजालों से 
तुम्हारी मुस्कराहट ने बहारों को निखारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है

लब-ए-रंगीं अरे तौबा, गुलाबी कर दिया मौसम 
तुम्हारी शौख नज़रों ने शराबी कर दिया मौसम 
नशे में चूर है आलम, नशीला हर नज़ारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है

                                                              " Asrar M. Suri "

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जब नहीं आये थे तुम तब भी तो तुम आये थे 
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत 
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत 

तुम नहीं आये अभी फिर भी तो तुम आये हो 
रात के सीने में मेहताब के खंजर की तरह 
सुबह के हाथ में खुर्शीद के सागर  की तरह 

तुम नहीं आओगे जब फिर भी तो तुम आओगे 
ज़ुल्फ़ दर ज़ुल्फ़ बिखर जायेगा फिर रात का रंग 
शब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़े मुलाकात का रंग 

आओ आने की करें बात कि तुम आये हो 
अब तुम आये हो तो मैं कौनसी शय नज़र करूँ 
कि मेरे पास सिवा मेहर-ओ-वफ़ा कुछ भी नहीं 
एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                       " Ali Sardar Zafri "
मेहताब : चाँद
खुर्शीद : सूरज
शब-ए-तन्हाई : तन्हाई भरी रात 
मेहर-ओ-वफ़ा : प्यार व् वफ़ा 

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Album : Muntazir

Muntazir means " waiting for someone/something " .

बहुत खूबसूरत है आँखें तुम्हारी
अगर हो इनायत ए जाने मुहब्बत
बना दीजिये इनको किस्मत हमारी

जो सबसे जुदा है वो अंदाज़ हो तुम
छुपा था जो दिल में वो ही राज़ हो तुम
तुम्हारी नज़ाकत बनी जब से चाहत
सुकून बन गई है हर इक बेक़रारी

न थे जब तलक तुम हमारी नज़र में
न था चाँद शब में न सूरज सहर में
तुम्हारी इजाजत तुम्हारी हुक़ूमत
ये सारा गगन है ये धरती है सारी

बहुत खूबसूरत है आँखें तुम्हारी
अगर हो इनायत ए जाने मुहब्बत
बना दीजिये इनको किस्मत हमारी  

                                              " Nida fazli "
                                                                                                       
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यूं तो गुजर रहा है हर इक पल ख़ुशी के साथ 
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ 

रिश्ते वफायें दोस्ती सब कुछ तो पास है 
क्या बात है पता नही दिल क्यों उदास है 
हर लम्हा है हसीन नई दिलकशी के साथ 
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ

चाहत भी है सुकून भी है दिलबरी भी है 
आँखों में ख्वाब भी है लबों पर हंसी भी है 
दिल को नहीं है कोई शिकायत किसी के साथ 
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ

सोचा था जैसा वैसा ही जीवन तो है मगर 
अब और किस तलाश में बेचैन है नज़र 
कुदरत भी मेहरबान है दरियादिली के साथ 
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ

                                                     " Nida Fazli "
                                                                      
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बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता 
जो बीत गया है वो गुजर क्यूँ नहीं जाता 

सब कुछ तो है क्या ढूंढती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता 

वो एक चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में 
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता 

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा 
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता 

वो नाम जो बरसों से न चेहरा न बदन है 
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता 

                                          " Nida Fazli "

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रूख़ से पर्दा उठा दे जरा साक़िया 
बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जायेगा 
है जो बेहोश वो होश में आएगा 
गिरने वाला है जो वो संभल जायेगा 

तुम तसल्ली न दो सिर्फ बैठे रहो 
वक़्त कुछ मेरे मरने का टल जायेगा 
क्या ये कम है मसीहा के होने ही से 
मौत का भी इरादा बदल जायेगा 

तीर की जान है दिल दिल की जान तीर है  
तीर को यूँ न खींचो कहा मान लो 
तीर खिंचा तो दिल भी निकल आएगा 
दिल जो निकला तो दम भी निकल जायेगा 

जिसके हंसने में रोने का अंदाज़ है 
खाक उड़ाने में फरियाद का राज है 
इसको छेड़ो न ' अनवर ' खुदा के लिए 
वर्ना बीमार का दम निकल जायेगा 
                                                        " Anwar Mirzapuri "

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All Time Hit : Ye daulat bhi le lo

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो 
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी 
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन 
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी 

मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी 
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी 
वो नानी की बातों में परियों का डेरा 
वो चेहरे की झुरियों मे सदियों का फेरा  
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई 
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी 

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना 
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना 
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना झगड़ना 
वो झूलों से गिरना वो गिरके सम्भलना  
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे 
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी 

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना 
घरोंदे बनाना, बनाकर मिटाना 
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी 
वो ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी 
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन 
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी 

                           " सुदर्शन फाकिर "

from movie : Aaj

अगर आपने ये गाना नहीं सुना तो आप बहुत कुछ गँवा रहे हैं। listen it on this link :
http://www.saavn.com/p/song/hindi/Jazbah---Jagjit-Singh/Yeh-Daulat-Bhi-Lelo/GxEFCUdFfWE

Love is Blind

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे  

कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुमसे
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे

कभी दुनिया मुकम्मल बनके आएगी निगाहों में
कभी मेरी कमी दुनिया की हर इक शय में पाओगे

कहीं पर भी रहे हम तुम मुहब्बत फिर मुहब्बत है
तुम्हे हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगे

                                               " नज़ीर बनारसी "

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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गये
मेरी आँखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गये

कब की पत्थर हो चुकी थी मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गये

जाने क्या अहसास साजे-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गये

अब कोई उम्मीद है ' शाहिद ' न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गये 

                                     " Shahid Kabir "

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तुम ये कैसे जुदा हो गये 
हर तरफ हर जगह हो गये 

अपना चेहरा न बदला गया 
आईने से ख़फ़ा हो गये 

जाने वाले गए भी कहाँ 
चाँद सूरज घटा हो गये 

बेवफ़ा तो न वो थे न हम 
यूँ हुआ बस जुदा हो गये 

आदमी बनना आसां न था 
शेख जी आरसा हो गये 

                              " Nida Fazli "

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वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता 
किस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता 

ऐसे भी है दुनिया में जिन्हे ग़म नहीं होता 
इक ग़म है हमारा जो कभी कम नहीं होता 

क्या सुरमा भरी आँखों से आंसू नहीं गिरते 
क्या मेहंदी लगी हाथों से मातम नहीं होता 

कुछ और भी होती है बिगड़ने की अदाएं  
बनने में संवरने में ये आलम नहीं होता 

                                                             " Raiz Khairabadi "


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Album : Saher

ये जो ज़िन्दगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है 
कहीं इक हसीन सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा हिजाब है

कहीं छाँव है कहीं धुप है, कहीं और ही कोई रूप है 
कई चेहरे इसमें छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है 

कहीं खो दिया कहीं पा लिया, कहीं रो लिया कहीं गा लिया 
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबाँ बेहिसाब है 

कहीं आंसुओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ 
कहीं बरकतों की है बारिशें, कहीं तिश्नगी बेहिसाब है 

                                                     " राजेश रेड्डी "

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मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो                                    
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

एक टहनी पे चाँद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

उजले उजले फूल खिले थे
मैं ये समझा तुम हँसते हो

मुझको शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

तुम तनहा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

                    " डॉ बशीर बद्र "

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तेरे आने की जब खबर महके
तेरी खुशबू से सारा घर महके

शाम महके तेरे तसव्वुर से
शाम के बाद फिर सहर महके

रात भर सोचता रहा तुझको
ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर महके

याद आए तो दिल मुनव्वर हो
दीद हो जाए तो नज़र महके

वो घड़ी दो घड़ी जहाँ बैठे
वो ज़मीं महके वो शजर महके

तेरे आने की जब खबर महके
तेरी खुश्बू से सारा घर महके


Lyrics : Dr. Nawaz Deobandi

दीद : दिखना 
शज़र : माहौल 

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चराग़े इश्क़ जलाने की रात आयी है 
किसी को अपना बनाने की रात आयी है 

वो आज आये हैं महफ़िल में चांदनी लेकर 
कि रौशनी में नहाने की रात आयी है 

फ़लक का चाँद भी शरमा के मुंह छुपायेगा 
नक़ाब रुख़ से उठाने की रात आयी है 

निगाहे साक़ी से पैहम छलक रही है शराब 
पियो कि पीने पिलाने की रात आयी है 

                              " faiz ratlami "

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Prem Geet : Hothon se choo lo tum

होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे मेरी प्रीत अमर कर दो  होठों से छू लो

ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नई रीत चला कर तुम ये रीत अमर कर दो  होठों से छू लो

आकाश का सूनापन मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम आ जाओ जीवन में
सांसें देकर अपनी संगीत अमर कर दो  होठों से छू लो

जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे, मैं हरदम ही हारा
तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो  होठों से छू लो

Lyrics : Indeevar

Mirza Ghalib

लीजिये जनाब, आज ग़ालिब साहब की ग़ज़ल आपके सामने रख ही दी....मेरी कलम में वो दवात नहीं जो इनके बारे में लिख सके.…लेकिन मशहूर फ़नकारों की रचनाओ को आप तक पहुचाने का जिम्मा लिया है तो पूरा करना ही होगा…ग़ज़लों में ग़ालिब  को वो ही रुतबा प्राप्त है जो किसी गुलशन में ग़ुलाब को.…उर्दू में इनसे अधिक गहराई अपनी शायरी में शायद कोई नहीं रख पाया ऐसा मैंने पढ़ा है.…बाकी फ़नकारो के मुकाबले इनके बहुत कम दीवान बाज़ार में उपलब्ध है क्युकि ये अपने कलामों के प्रति अत्यधिक निष्ठुर थे.…बार बार उनको काट छांट कर कुछ नया लाने के क्रम में इनकी रचनाएं बहुत सीमित मात्रा में सामने आ पाई.…सही भी है, आखिर master stroke तो ऐसे perfection की बदौलत ही मारा जा सकता है.…इनकी शायरी पढ़ने के बाद बाकी शायरी आपको चीनी कम लग सकती है.…और अगर इनके शेर समझ आ जाए तो आप अपना बुद्धिमत्ता स्तर काफी ऊपर मान सकते है.…जनाब ये मजाक नहीं है बल्कि हक़ीकत फरमा रहा हूँ, क्यूंकि अपने जीते जी इनको अपने आपको साबित करने में बहुत समय लगा, कहा जाता था कि ये क्या लिखता है जो समझ की सीमा से ही बाहर है.…बहुत उपेक्षा और जिल्लत सहने के बाद इनके हुनर को पहचाना उर्दू अदब पसंद राजा बहादुर शाह जफ़र ने.…फिर तो साहब इतिहास में शामिल होने का हुनर तो ग़ालिब की ग़ज़लों में था ही.…
ये सब बातें आप भी इनके बारे में विस्तार से जान सकते हैं.…गुलज़ार द्वारा रचित सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब जो कि youtube पर पूरा उपलब्ध है, इस सीरियल में इनकी ग़ज़लों को संगीतबद्ध और स्वरबद्ध किया जगजीत सिंह ने… में दावे से कह सकता हूँ कि अगर जगजीत पूरे जीवन काल में केवल यही एल्बम करते तो भी लोगों की यादों में अमर हो जाते, फिर उन्होंने तो सैकड़ों उम्दा एल्बम दिये…बहरहाल ये सीरियल देखिये, और यकीन मानिये आपको इससे बेहतर सामग्री इस फनकार के बारे में कही से नहीं मिल सकती....youtube पर खोजने का फार्मूला आप बेहतर जानते हैं  :)

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन*
हमारी जेब को अब हाजते* रफू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तज़ू क्या है

रही न ताकते गुफ्तार* और अगर हो भी
तो किस उम्मीद से कहिये कि आरज़ू क्या है

                     
शब्दार्थ : पैराहन - कपड़े , हाजते - जरूरत, गुफ्तार - सब्र

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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यूँ
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यूँ

क़ैदे हयात-ओ-बन्दे ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यूँ

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, गैर हमें उठाये क्यूँ

ग़ालिबे ख़स्ता के बगैर कौनसे काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिये हाय हाय क्यूँ


संग-ओ-ख़िश्त : पत्थर का टुकड़ा 
क़ैदे हयात : ज़िन्दगी की क़ैद 
हरम : घर बार 
आस्तां : आशियाना 

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ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता। 

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झुठ जाना 
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।  

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह 
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता। 

कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।  

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता। 


विसाल - मिलन 
नासेह - उपदेशक 
चारासाज़ - दर्द कम करने वाला  
ग़म-गुसार - हमदर्द 

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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है ?

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ।

हम हैं मुश्ताक़* और वो बेज़ार*
या इलाही ये माजरा क्या है ।

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है ।

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैंने नहीं जानता दुआ क्या है । 

मुश्ताक़ : बेसब्र 


बेज़ार : मंद 

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं ख़ून-ए-जिगर होने तक

हमने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़मर्ग इलाज 
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक                 

                                       
सब्र-तलब : धैर्य
तग़ाफ़ुल : उपेक्षा
जुज़मर्ग : मौत के अलावा

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उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक 
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है 

देखिये पाते हैं उशाक़ बुतों से क्या फैज़ 
इक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है 

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है 

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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल - खेल का मैदान 
शब-ओ-रोज़ - रात दिन 
निहाँ - गुप्त 
जबीं - माथा 
जुम्बिश - हरकत, गति 

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क़ासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं 
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में 

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ऐ-ख़राब में 
शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में 

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ऐ-जाम 
साक़ी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में 

ता फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर 
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में 

ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी कभी 
पीता हूँ रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब में 

                                                       " मिर्ज़ा ग़ालिब "
क़ासिद : डाकिया 
हिज्र : जुदाई 
बज़्म : महफ़िल 
अहद : वादा 

रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब : जिस दिन आसमान में चाँद निकला हो 

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Jagjit singh : In Search

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आंसू तेरे दामन पर गिरा कर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

                                " qateel shifai "

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जब किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना 

यूँ उजालों से वास्ता रखना 
शमा के पास ही हवा रखना 

घर की तावीर चाहे जैसी हो 
इसमें रोने की कुछ जगह रखना 

मस्जिदें है नमाज़ियों के लिए 
अपने घर में ही कहीं खुदा रखना 

मिलना जुलना जहाँ जरूरी है 
मिलने जुलने का हौसला रखना 

                                                " Nida Fazli "

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कैसे कैसे हादसे सहते रहे 
फिर हम भी जीते रहे हँसते रहे 

उसके आ जाने की उम्मीदें लिए 
रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे 

वक़्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह 
हम चराग़ों की तरह जलते रहे 

कितने चेहरे थे हमारे आस-पास 
तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे 

                                                        " Wazida Tabassum "

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दोस्ती जब किसी से की जाये 
दुश्मनों की राय ली जाये 

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में 
अब कहाँ जा के सांस ली जाये 

बस इसी सोच में डूबा हुआ 
ये नदी कैसे पार की जाये 

मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे 
आज फिर कोई भूल की जाये 

बोतलें खोल के पी बरसों 
आज दिल खोल कर भी पी जाये 

                                                 " Rahat Indori "

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Album : Insight

" रंज से ख़ूगर हुआ दिल तो मिट जाता है ग़म 
मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई "
                                       
                                            " मिर्ज़ा ग़ालिब "

तो साहब कुछ लोगों की ज़िन्दगी में इतनी मुश्किलें होती हैं कि उनको सहते सहते वो सामान्य सी लगने लगती है।  मुश्किलें, और सामान्य ?  लेकिन सच है कि हाथ तो सब के एक जैसे होते हैं लेकिन उनमें छपी लकीरें अलग अलग नसीब लेकर आती है।  तभी तो कहते हैं कि कोई बिना ख़ास मेहनत के बहुत हासिल कर लेता है और कोई बहुत संघर्ष और मेहनत के बाद भी कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाता।  यूँ तो जीवन बिना संघर्ष के अपना पूरा रंग नहीं बिखेरता फिर भी लक्ष्य के पास जाकर उससे वंचित होने का दर्द तो वो ही समझ सकता है जिसने अपना सब कुछ उस लक्ष्य के लिए दांव पर लगाया हो।  मेरा दृढ़ता से मानना है कि सफलता की बड़ी बड़ी कहानियां हम तक पहुच जाती है क्यूंकि वो सबको प्रेरित करती है लेकिन असफल होने वालों की तादाद इनसे कहीं ज्यादा है और चूँकि असफलता आपके failure होने का प्रमाण है तो वो किसी की रूचि का विषय कैसे हो सकती है ? लेकिन ये तय है कि अगर आप अभी अपने को प्रमाणित नहीं भी कर पाये और आप में जूनून है तो आप वो पाएंगे ही, जो चाहते हैं।  खैर किस्मत की बातें सदियों से उलझी हैं और रहेगी भी। क्यूंकि सफलता और भाग्य के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं निकला जा सकता। लेकिन जो सफल हैं उनके लिए भाग्य है ही और जो सफल नहीं है उनके लिए दुनिया के तीखे तंज।

इस विषय पर मुझे निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल याद आ रही है जिसने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है और सकारात्मकता की राह में आगे बढ़ाया है।  ये ग़ज़ल है एल्बम  insight  से, जिसे गाया जगजीत सिंह ने।

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये 
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये। 

बाग़ में जाने के अदब हुआ करते हैं 
किसी तितली को न फूलों से उडाया जाये। 

जिन चरागों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं 
उन चरागों को हवाओं से बचाया जाये। 

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूँ करले 
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये। 

इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि मस्ज़िद न जाकर किसी रोते बच्चे को ही हंसाया जाये।  इसी विराट विचार ने इस शेर को कालजयी बना दिया है।  जब तक दुनिया का अस्तित्व है ये शेर फिजाओं में गूंजता रहेगा। निदा फ़ाज़ली साहब को मेरा नमन।

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गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़ धानी दे मौला 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है 
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यूँ हो 
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा 
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को

फिर रोशन कर जहर का प्याला चमका नयी सलीनें 
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को 

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बदला न अपने आप को, जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर, अजनबी रहे 

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम 
थोड़ी बहुत तो जहन में नाराज़गी रहे

गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले है फूल वो, डाली भरी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे

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मै रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार,
दुःख में दुःख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार

आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार 

चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरान 

मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान 

सातो दिन भगवान के, क्या मंगल क्या वीर 

जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर 

सपने झरना नींद का, जागी आँखें प्यास 

पाना खोना खोजना सांसों का इतिहास                                                   

सबकी पूजा एक सी अलग अलग हर रीत 

मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाए गीत 

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ये ज़िन्दगी आज जो तुम्हारे बदन की 
छोटी बड़ी नसों में मचल रही है 
तुम्हारे पैरों से चल रही है 

तुम्हारी आवाज़ में गले से निकल रही है 
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है 
ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूं ही शक्लें बदल रही है 

बदलती शक्लों बदलते जिस्मों में
चलता फिरता है इक शरारा 
जो इस घडी है नाम तुम्हारा 
इसी से सारी चहल पहल है इसी से रोशन है हर नज़ारा 
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
कलम उठाओ या सर झुकाओ 
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक है खेल सारा 
ये खेल होगा नहीं दोबारा ये खेल होगा 

All ghazal lyrics : Nida fazli

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cry for cry

मित्रों, जगजीत सिंह को ग़ज़ल सम्राट यूं ही नहीं कहते,  यह बात इस ग़ज़ल से सिद्ध हो जाती है.... उन्होंने जब से ग़ज़ल गायन शुरू किया तब से लेकर इंतेकाल तक अपनी क्वालिटी, अपनी लोक लुभावन धुनों से दुनिया भर के दिलों पर राज किया, ये एक मात्र कलाकार मेरे दिमाग में आते है जिन्होंने अपने पूरे संगीत कॅरिअर में कभी भी विफलता नहीं देखी…उसके पीछे एक बड़ी वजह उनकी ग़ज़लों का चयन भी था, उन्होंने आम आदमी को समझ में आने वाली रचनाएं चुनी, न कि क्लिष्ट और भारी भरकम शब्दों से युक्त रचना…उनका एक भी एल्बम ये कह कर नकारा नहीं जा सकता कि यार मज़ा नहीं आया…खुद गुलज़ार इस बात को मानते है कि  " जगजीत के उत्पाद में कोई भिन्नता नहीं है, ये निरंतरता वाला कलाकार है ( a composer with consistency ) "……

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
जख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ  है ?

जब हक़ीक़त है कि हर जहन में तू रहता है 
फिर ज़माने में कहीं मस्ज़िद कहीं मंदिर क्यूँ  है ?

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है ?

ज़िन्दगी जीने के काबिल ही नहीं अब फाकिर 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है ?  



                                            " sudarshan fakir "


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कभी आंसू कभी खुशी बेची
हम ग़रीबों ने बेकसी बेची 

चंद सांसें खरीदने के लिए 
रोज थोड़ी सी ज़िन्दगी बेची 

जब रुलाने लगे मुझे साये 
मैंने उकता के रौशनी बेची

एक हम थे कि बिक गए खुद ही 
वरना दुनिया ने दोस्ती बेची

                                   " Abu Talib "

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अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ 

इतनी महंगाई कि बाजार से कुछ लाता हूँ 
अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ 

अपनी नींदों का लहू पोंछने की कोशिश में,
जागते जागते थक जाता हूँ, सो जाता हूँ 

कोई चादर समझ के खींच न ले फिर से ' खलील '
मैं कफ़न ओढ़ के फूटपाथ पे सो जाता हूँ। 

                                              "  Khalil dhantejvi "

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माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी

जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें न हो अप्सरा की
हो न परियां जहाँ आसमानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख को जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रौशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

                                        " नन्द लाल पाठक "

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