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Rahat Indori : Ghazal

मोम के पास कभी आग को लेकर देखूं 
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगाकर देखूं 

मैंने देखा है ज़माने को शराब पीकर 
दम निकल जाए अगर होश में आकर देखूं 

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है 
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूं 

तेरे बारे में सुना है ये कि तू सूरज है 
मैं जरा देर तेरे साये में आकर देखूं 

याद आता है के पहले भी कर बार यूँ ही 
मैंने सोचा था के तुझे भुलाकर देखूं 

Beyond Time : Jagjit Singh

अपनी आखों के समंदर में उतर जाने दे 
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे 

ऐ मेरे दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना 
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे 

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी 
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे 

ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको 
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे 

                                                          " नज़ीर बाकरी "

माज़ी : भूतकाल 

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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सम्भलते क्यों हैं 
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है 

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं


                                                      " राहत इंदौरी "

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मेरा दिल भी शौक़ से तोड़ो, एक तजुर्बा और सही
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही

रात है ग़म की आज बुझा दो, जलता हुआ हर एक चरागाँ 
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही

दम है निकलता इक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही

खंजर लेकर सोचते क्या हो, क़त्ल--'मुराद' भी कर डालो
दाग़ हैं सौ दामन पे तुम्हारे, एक इज़ाफ़ा और सही


                                                                       " मुराद लखनवी "

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सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं

ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं

चंद मासूम से पत्तों का लहू है ' फ़ाकिर '
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं

                                                                  " सुदर्शन फ़ाकिर "
सिला : पुरस्कार 

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नींद से आँख खुली है, अभी देखा क्या है 
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है 

बांध रखा है किसी सोच ने घर से हमको 
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है 

रेत के, ईंट के, पत्थर के हो या मिट्टी के 
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है 

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ' शाहिद '
वरना हाथों में लकीरों के  अलावा क्या है 

                                                    " शाहिद कबीर "

दानिस्त :  ज्ञान 

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सारे बदन का ख़ून, पसीने में जल गया 
इतना चले कि जिस्म हमारा पिघल गया 

चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन 
दम लेने जो हम बैठ गए दम निकल गया 

अच्छा हुआ जो राह में ठोकर लगी हमें 
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया 

वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका 
दामन की फ़िक्र की तो गिरेबाँ निकल गया 
                                                               
                                                                " महमूद दुर्रानी "

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अपनी आग को ज़िंदा रखना कितना मुश्किल है 
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है 

कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की  
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है 

तुमने मंदिर देखे होंगे ये मेरा आँगन है 
एक दीया भी जलता रखना कितना मुश्किल है 

चुल्लू में हो दर्द का दरिया, ध्यान में उसके होंठ 
यूँ भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है

                                                                   " इशरत आफरीन "

पस-ए-आईना : आईने के सामने

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झूठी-सच्ची आस पे जीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
मय की जगह खून-ए-दिल पीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे
तूफ़ानों की ज़द पे सफ़ीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

एक महीने के वादे पर साल गुज़ारा फिर भी ना आये
वादे का ये एक महीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सामने दुनिया भर के ग़म हैं और इधर इक तन्हा हम हैं
सैकड़ों पत्थर, इक आईना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

                                                                            " काशिफ़ इंदौरी "


सफ़ीना : कश्ती, नाव 

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Jagjit singh : In Search

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आंसू तेरे दामन पर गिरा कर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

                                " qateel shifai "

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जब किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना 

यूँ उजालों से वास्ता रखना 
शमा के पास ही हवा रखना 

घर की तावीर चाहे जैसी हो 
इसमें रोने की कुछ जगह रखना 

मस्जिदें है नमाज़ियों के लिए 
अपने घर में ही कहीं खुदा रखना 

मिलना जुलना जहाँ जरूरी है 
मिलने जुलने का हौसला रखना 

                                                " Nida Fazli "

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कैसे कैसे हादसे सहते रहे 
फिर हम भी जीते रहे हँसते रहे 

उसके आ जाने की उम्मीदें लिए 
रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे 

वक़्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह 
हम चराग़ों की तरह जलते रहे 

कितने चेहरे थे हमारे आस-पास 
तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे 

                                                        " Wazida Tabassum "

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दोस्ती जब किसी से की जाये 
दुश्मनों की राय ली जाये 

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में 
अब कहाँ जा के सांस ली जाये 

बस इसी सोच में डूबा हुआ 
ये नदी कैसे पार की जाये 

मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे 
आज फिर कोई भूल की जाये 

बोतलें खोल के पी बरसों 
आज दिल खोल कर भी पी जाये 

                                                 " Rahat Indori "

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