" रंज से ख़ूगर हुआ दिल तो मिट जाता है ग़म
मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई "
" मिर्ज़ा ग़ालिब "
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये।
बाग़ में जाने के अदब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उडाया जाये।
जिन चरागों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं
उन चरागों को हवाओं से बचाया जाये।
घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूँ करले
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये।
इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि मस्ज़िद न जाकर किसी रोते बच्चे को ही हंसाया जाये। इसी विराट विचार ने इस शेर को कालजयी बना दिया है। जब तक दुनिया का अस्तित्व है ये शेर फिजाओं में गूंजता रहेगा। निदा फ़ाज़ली साहब को मेरा नमन।
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गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़ धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यूँ हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
फिर रोशन कर जहर का प्याला चमका नयी सलीनें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
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बदला न अपने आप को, जो थे वही रहे
मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई "
" मिर्ज़ा ग़ालिब "
तो साहब कुछ लोगों की ज़िन्दगी में इतनी मुश्किलें होती हैं कि उनको सहते सहते वो सामान्य सी लगने लगती है। मुश्किलें, और सामान्य ? लेकिन सच है कि हाथ तो सब के एक जैसे होते हैं लेकिन उनमें छपी लकीरें अलग अलग नसीब लेकर आती है। तभी तो कहते हैं कि कोई बिना ख़ास मेहनत के बहुत हासिल कर लेता है और कोई बहुत संघर्ष और मेहनत के बाद भी कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाता। यूँ तो जीवन बिना संघर्ष के अपना पूरा रंग नहीं बिखेरता फिर भी लक्ष्य के पास जाकर उससे वंचित होने का दर्द तो वो ही समझ सकता है जिसने अपना सब कुछ उस लक्ष्य के लिए दांव पर लगाया हो। मेरा दृढ़ता से मानना है कि सफलता की बड़ी बड़ी कहानियां हम तक पहुच जाती है क्यूंकि वो सबको प्रेरित करती है लेकिन असफल होने वालों की तादाद इनसे कहीं ज्यादा है और चूँकि असफलता आपके failure होने का प्रमाण है तो वो किसी की रूचि का विषय कैसे हो सकती है ? लेकिन ये तय है कि अगर आप अभी अपने को प्रमाणित नहीं भी कर पाये और आप में जूनून है तो आप वो पाएंगे ही, जो चाहते हैं। खैर किस्मत की बातें सदियों से उलझी हैं और रहेगी भी। क्यूंकि सफलता और भाग्य के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं निकला जा सकता। लेकिन जो सफल हैं उनके लिए भाग्य है ही और जो सफल नहीं है उनके लिए दुनिया के तीखे तंज।
इस विषय पर मुझे निदा फ़ाज़ली की एक ग़ज़ल याद आ रही है जिसने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है और सकारात्मकता की राह में आगे बढ़ाया है। ये ग़ज़ल है एल्बम insight से, जिसे गाया जगजीत सिंह ने।
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये।
बाग़ में जाने के अदब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उडाया जाये।
जिन चरागों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं
उन चरागों को हवाओं से बचाया जाये।
घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूँ करले
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये।
इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि मस्ज़िद न जाकर किसी रोते बच्चे को ही हंसाया जाये। इसी विराट विचार ने इस शेर को कालजयी बना दिया है। जब तक दुनिया का अस्तित्व है ये शेर फिजाओं में गूंजता रहेगा। निदा फ़ाज़ली साहब को मेरा नमन।
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गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़ धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यूँ हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
फिर रोशन कर जहर का प्याला चमका नयी सलीनें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला……चिड़ियों को दाने बच्चों को
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बदला न अपने आप को, जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर, अजनबी रहे
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम
थोड़ी बहुत तो जहन में नाराज़गी रहे
गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले है फूल वो, डाली भरी रहे
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे
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मै रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार,
दुःख में दुःख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार
चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान
सातो दिन भगवान के, क्या मंगल क्या वीर
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर
सपने झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना सांसों का इतिहास
सबकी पूजा एक सी अलग अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाए गीत
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गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले है फूल वो, डाली भरी रहे
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे
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मै रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार,
दुःख में दुःख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार
चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान
सातो दिन भगवान के, क्या मंगल क्या वीर
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर
सपने झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना सांसों का इतिहास
सबकी पूजा एक सी अलग अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाए गीत
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ये ज़िन्दगी आज जो तुम्हारे बदन की
छोटी बड़ी नसों में मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में गले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूं ही शक्लें बदल रही है
बदलती शक्लों बदलते जिस्मों में
चलता फिरता है इक शरारा
जो इस घडी है नाम तुम्हारा
इसी से सारी चहल पहल है इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
कलम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा ये खेल होगा
छोटी बड़ी नसों में मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में गले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूं ही शक्लें बदल रही है
बदलती शक्लों बदलते जिस्मों में
चलता फिरता है इक शरारा
जो इस घडी है नाम तुम्हारा
इसी से सारी चहल पहल है इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
कलम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा ये खेल होगा
All ghazal lyrics : Nida fazli
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