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An evening with Jagjit & Chitra singh

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं
ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं


गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं


जिसको तूने न आज़माया हो
वो कहीं पर भी कामयाब नहीं


जाने किस किस की मौत आयी है
आज रुख़ पे कोई नक़ाब नहीं


वो करम उँगलियों पे गिनते हैं
ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं


जो क़यामत न ढा सके 'राही'
वो किसी काम का शबाब नहीं                                               
                                             " सईद राही "

गाहे-गाहे : कभी कभी 

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हरसू दिखाई देते हैं वो जल्वागर मुझे
क्या क्या फ़रेब देती है मेरी नज़र मुझे

डाला है बेख़ुदी ने अजब राह पर मुझे
आँखें हैं और कुछ नहीं आता नज़र मुझे

दिल लेके मुझसे देते हो दाग़-ए-जिगर 
मुझे ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे

आया ना रास नाला-ए-दिल का असर मुझे
अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी ख़बर मुझे

                                                    " जिगर मुरादाबादी "


दाग़-ए-जिगर : दिल की आग 
नाला-ए-दिल : दिल की पुकार 

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जब कभी तेरा नाम लेते हैं
दिल से हम इन्तक़ाम लेते हैं

मेरी बर्बादियों के अफ़साने
मेरे यारों के नाम लेते हैं


बस यही एक जुर्म है अपना
हम मुहब्बत से काम लेते हैं


हर क़दम पर गिरे मगर सीखा
कैसे गिरतों को थाम लेते हैं


हम भटक कर जुनूँ की राहों में
अक़्ल से इन्तक़ाम लेते हैं


                                             " सरदार अन्जुम "


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कोई पास आया सवेरे सवेरे
मुझे आज़माया सवेरे सवेरे 

मेरी दास्ताँ को ज़रा सा बदल कर

मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे

जो कहता था कल शब संभलना संभलना
वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे

जली थी शमा रातभर जिसकी ख़ातिर

उसी को जलाया सवेरे सवेरे

कटी रात सारी मेरी मैकदे में

ख़ुदा याद आया सवेरे सवेरे

                                                     " सईद राही "
शब : रात 

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माना के मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़कर नहीं हूँ मैं
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूँ मैं

इंसान हूँ धड़कते हुये दिल पे हाथ रख

यूँ डूबकर न देख समुंदर नहीं हूँ मैं

चेहरे पे मल रहा हूँ सियाही नसीब की

आईना हाथ में है सिकंदर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब तेरी ज़मीन में लिक्खी तो है ग़ज़ल
तेरे कद-ए-सुख़न के बराबर नहीं हूँ मैं

                                                      " मुज़फ़्फ़र वारसी "
मुश्त-ए-ख़ाक : मुट्ठी भर धूल 
कद-ए-सुख़न : लेखन कला 

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मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के पन्ने उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा पन्ना मुड़ा हुआ निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले


                                                       " वसीम बरेलवी "


किताब-ए-माज़ी : बीते समय की दास्ताँ 
औराक़ : पृष्ठ 
सफ़हा : पन्ना 

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ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो

अब कोई आरज़ू नहीं बाक़ी

जुस्तजू मेरी आख़री तुम हो

मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ

आसमानों की चांदनी तुम हो


दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो
                                             " बशीर बद्र "

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Someone Somewhere : Jagjit and Chitra Singh

मेरी ज़िन्दगी किसी और की, मेरे नाम का कोई और है 
मेरा अक्स है सर-ए-आईना, पस-ए-आईना कोई और है 

मेरी धड़कनों में है चाप सी, ये भी जुदाई है मिलाप सी 
मुझे क्या पता मेरे दिल बता, मेरे साथ क्या कोई और है 

न गये दिनों को खबर मेरी, न शरीक-ए-हाल नज़र तेरी 
तेरे देस में, मेरे भेस में, कोई और था, कोई और है 

वो मेरी तरफ निगराँ रहे, मेरा ध्यान जाने कहाँ रहे 
मेरी आँख में कई सूरतें, मुझे चाहता कोई और है 

                                                    " Mujaffar Warsi "


सर-ए-आईना - आईने के सामने
सर-ए-आईना - आईने के पीछे
चाप - आवाज़
निगराँ - नज़र रखने वाला

sung by : jagjit singh

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मेरे दुःख की कोई दवा न करो 
मुझको मुझसे अभी जुदा न करो 

नाख़ुदा को ख़ुदा कहा तो फिर 
डूब जाओ ख़ुदा ख़ुदा न करो 

ये सिखाया है दोस्ती ने हमें 
दोस्त बनकर कभी वफ़ा न करो 

इश्क़ है इश्क़, ये मजाक नहीं
चंद लम्हों में फैसला न करो 

आशिक़ी हो कि बंदगी ' फ़ाकिर '
बेदिली से तो इब्तिदा न करो 

                                                 " Sudarshan Fakir "


बंदगी - पूजा, प्रार्थना
इब्तिदा - प्रारम्भ

sung by : chitra singh

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फासला तो है मगर, कोई फासला नहीं 
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं 

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां ख़फ़ा सही 
आप ये बताइये, आप तो ख़फ़ा नहीं 

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास है 
कह दो नाख़ुदाओं से, तुम कोई ख़ुदा नहीं 

लीजिये, बुला लिया आपको ख्याल में 
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं 

आइये चराग़-ए-दिल, आज ही जलाएं हम 
कैसी कल हवा चले, कोई जानता नहीं 

                                                     " Shami Karhani "



 नाख़ुदा : नाविक, मल्लाह

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आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा 

मेरा क़ातिल ही मेरा मुन्सिफ़ है 
क्या मेरे हक़ में फैसला देगा 

ज़िन्दगी को करीब से देखो 
इसका चेहरा तुम्हे रुला देगा 

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

इश्क़ का जहर पी लिया ' फाकिर '
अब ख़ुदा भी क्या दवा देगा 

                                            " Sudarshan Fakir "


मुन्सिफ़ : न्यायकर्ता 

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कोई समझेगा क्या राज-ए-गुलशन 
जब तक उलझे ना काँटों में दामन 

यक-ब-यक सामने आ न जाना 
रुक न जाए कहीं दिल की धड़कन 

गुल तो गुल, खार तक चुन लिए हैं 
फिर भी खाली है गुलचीं का दामन 

अज़मत-ए-आशियाँ बढ़ा दी 
बर्क को दोस्त समझूँ कि दुश्मन 

                                                 " Fana Nizami "

अज़मत-ए-आशियाँ : घर की रौनक
बर्क : बिजली

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Jagjit & Lata ji : Album Sajda


माँ सरस्वती का जीता जागता रूप और ग़ज़ल सम्राट अर्थात लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जब एक साथ एक एल्बम में आये तो वो एल्बम विशिष्ट तो हो ही जाता है। मुझे याद है जब hmv ने बड़े ही royal पैक में इन दोनों दिग्गजों का एल्बम जारी किया था जिसकी कीमत भी उस वक़्त के हिसाब से ज्यादा थी। फिर भी ग़ज़ल प्रेमियों ने इस एल्बम को हाथों हाथ लिया। मेरी उम्र उस वक़्त कम थी महज 18 साल लगभग, किन्तु मैंने अपनी माँ से इतने पैसे की व्यवस्था करवाई, बदले में एक साल तक मुझे 1 भी रुपया नहीं मिला। लेकिन ग़ज़ल के शौक के आगे सभी जरूरतें बौनी थी। उस वक़्त के हिसाब से इसमें आधुनिक echo sound भी था जो कि लोगों के लिए विशेष था। विभिन्न शायरों की रचनाओं से युक्त ये एल्बम कालजयी की श्रेणी में आ गया। लता जी की आवाज़ एक बारगी जगजीत जी को भी फीका कर देती है। अपने गायकी और आवाज़ के चरम पर हैं लता जी इस एल्बम में। फिलहाल दोनों की गाई हुई ग़ज़ल आपके सामने रखी है। और हाँ अगर आप ग़ज़ल प्रेमी हैं तो ये एल्बम आपके पास होना ही चाहिए।


ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है - मेरा भी 
ये नज़राना तेरा भी है - मेरा भी 

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना 
राग पुराना तेरा भी है - मेरा भी 

तू मुझको और मैं तुझको समझाऊँ क्या 
दिल दीवाना तेरा भी है - मेरा भी 

शहर में गलियों गलियों जिसका चर्चा है 
वो अफसाना तेरा भी है - मेरा भी 

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है - मेरा भी 

                                             " Shahid Kabir " 

sung by both : lata ji and jagjit ji

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मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों 
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों 

वो बेख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों 

मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
मैं अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों 

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था 
मैं उसकी घर का पता किससे पूछता यारों 

                                                   " Waseem Barelvi "

sung by jagjit ji

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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग 
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग 

क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी 
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग 

तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया 
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग 

कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर 
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग 

                                             " दानिश अलीगढ़ी "

sung by jagjit ji

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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह 
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह 

मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे 
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह 

सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके 
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह 

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे 
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह 

                                         " qateel shifai "

sung by Lata ji

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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं 

मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ 
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 

ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब 
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं 

वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना 
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                    " Sahir Bhopali "

sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी 

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ 
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी 

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते 
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी 

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ 
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी 

ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आखरी सांस तक बेकरार आदमी 

                                                 " Nida fazli " 

मज़ार : कब्र 

sung by  : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

                                                         " Nida Fazli "

sung by : jagjit ji

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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है 
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है 

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता 
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है

नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले 
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो 
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन 
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है

                                                 " अख्तर शीरानी "

sung by : lata ji and jagjit ji

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मेरी तस्वीर में, रंग और किसी का तो नहीं 
घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं 

ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ 
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं 

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं 
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं 

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा 
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं 

                                             " मुजफ्फर वारसी "

sung by : lata ji

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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा 
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा 

इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने 
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा 

तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे 
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा 

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला 
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा 

                                                    " अहमद फ़राज़ "

मानूस : लगाव 
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन 
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी 
अता : तोहफा 



sung by : Lata Ji 

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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ 
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ 

वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था 
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ 

दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे 
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ 

ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी 
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ 

यकता : बेजोड़ 
बेगाना-रवी : रूखापन 

                                            " अहमद नदीम क़ासमी "


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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं 
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते 

                                        " ज़फर गोरखपुरी "

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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे 
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे 

इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे 

बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई 
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे 

ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां 
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे 

                                         " सबा अफगानी "

इब्तिदा : आरम्भ 
इंतिहा : अंत 
तसकीन : तसल्ली 


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