Samvedna : Atal Bihari Vajpayee

आज की तारीख में हमारे सर्वकालिक प्रसिद्ध प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी कुंवारे थे, ये सर्वविदित तथ्य है किन्तु उनकी संवेदनशीलता ने उन्हें कवि पहले बनाया और नेता बाद में।  उनकी कवितायेँ दिल के तारों को झंकृत कर देती हैं।  इसीलिए ग़ज़ल सम्राट जगजीत जी ने उनकी कविताओं को अपनी धुन और स्वर देकर उन्हें दुनिया के कोने कोने पहुंचा दिया।  लोगों के सामने अटल बिहारी जी कवि के रूप में आये और छा गए।  इस एल्बम में नरेशन भी अमिताभ बच्चन की आवाज़ में है जो इसका प्रभाव और भी बढाता है और हाँ इसके विडियो में शाहरुख़ खान ने अभिनय किया। इतने दिग्गज बहुत कम अवसरों पर साथ आते हैं। आप Youtube  पर जाकर भी इस गीत को आसानी से खोज सकते हैं।

क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत, यद्यपि छला गया पग पग में
एक दृष्टि बीती पर डाले  यादों की पोटली टटोलें
अपने ही मन से कुछ बोले-अपने ही मन से कुछ बोले

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी, जीवन एक अनंत कहानी 

पर तन की अपनी सीमाएं, यद्यपि सौ सर्दों की वाणी 
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाज़ा खोलें…अपने ही मन से कुछ बोले 

जन्म मरण का अविरत फेरा, जीवन बंजारों का डेरा 

आज यहाँ कल वहाँ कूच है, कौन जानता किधर सवेरा 
अँधियारा आकाश असीमित प्राणों के पंखों को खोले…अपने ही मन से कुछ बोले

क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में

मुझे किसी से नहीं शिकायत, यद्यपि छला गया पग पग में
एक दृष्टि बीती पर डाले  यादों की पोटली टटोलें
अपने ही मन से कुछ बोले-अपने ही मन से कुछ बोले

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एक बरस बीत गया.…एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास, शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का अंतर्घट रीत गया

सींखचों में सिमटा जग, किन्तु विकल प्राण विहग 
धरती से अम्बर तक गूँज मुक्ति गीत गया

पथ निहारते नयन, गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आयेगा, मन का जो मीत गया 

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बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ
   
पावों के नीचे अंगारे
   
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ
निज हाथों से हँसते-हँसते 
आग लगाकर जलना होगा ।
   
क़दम मिलाकर चलना होगा ।

हास्य-रुदन में, तूफ़ानों में
अमर असंख्यक बलिदानों में
   
उद्द्यानों में, वीरानों में
   
अपमानों में, सम्मानों में
उन्नत मस्तक, उभरा सीना
पीड़ाओं में पलना होगा ।
   
क़दम मिलाकर चलना होगा ।

उजियारे में, अंधकार में
कल कछार में, बीच धार में
   
घोर घृणा में, पूत प्यार में
   
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में
जीवन के शत-शत आकर्षक  
अरमानों को दलना होगा ।
   
क़दम मिलाकर चलना होगा ।

सम्मुख फैला अमर ध्येय पथ
प्रगति चिरंतन, कैसा इति अथ
   
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ
   
असफल, सफल समान मनोरथ
सब कुछ देकर कुछ न मांगते
पावस बनकर ढलना होगा ।
   
क़दम मिलाकर चलना होगा ।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन
प्रखर प्यार से वंचित यौवन
   
नीरवता से मुखरित मधुबन
   
परहित अर्पित अपना तन-मन
जीवन को शत-शत आहुति में 
जलना होगा, गलना होगा ।
   
क़दम मिलाकर चलना होगा ।


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जीवन बीत चला
कल कल करते आज 
हाथ से निकले सारे
भूत भविष्य की चिंता में
वर्तमान की बाज़ी हारे
पहरा कोई काम न आया
रसघट रीत चला
जीवन बीत चला

हानि लाभ के पलड़ों में
तुलता जीवन व्यापार हो गया 
मोल लगा बिकने वाले का
बिना बिका बेकार हो गया
मुझे हाट में छोड़ अकेला
एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला


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दूर कहीं कोई रोता है
तन पर पहरा भटक रहा मन
साथी है केवल सूनापन
बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का
क्रंदन सदा करूण होता है 


जन्म दिवस पर हम इठलाते
क्यों ना मरण त्यौहार मनाते
अन्तिम यात्रा के अवसर पर
आँसू का अशकुन होता है 


अंतर रोयें आँख ना रोयें
धुल जायेंगे स्वप्न संजोये
छलना भरे विश्व में केवल
सपना ही तो सच होता है ।


इस जीवन से मृत्यु भली है
आतंकित जब गली गली है
मैं भी रोता आसपास जब
कोई कहीं नहीं होता है ।



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