Nida Fazli

निदा फ़ाज़ली साहब के लिए आपको इतना बता दूँ कि मौजूदा दौर के शायरों में जितनी गहराई इनके पास है वो किसी के पास नहीं।  आम आदमी के बीच ये गुलज़ार, बशीर बद्र जितने लोकप्रिय नहीं लेकिन शायरी के अच्छे जानकारों के लिए निदा फ़ाज़ली की हैसियत इनसे बड़ी है।  इनको आधुनिक दौर का कबीर भी कहा जाता है।  कबीर कहलाना ही अपने आप में सबसे बड़ा परिचय है। कोई कैसे भूल सकता है इनके कालजयी  'शेर' :

" घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
  किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये "
" कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
  कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता "



ग़ज़ल

दुनिया जिसे कहते हैं

होश वालों को ख़बर क्या

Album : Insight

Album : Muntazir

Maa

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album : chausar

एक से हो गए मौसम हो, कि चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंजर मेरा

किससे पूंछू कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा

मुद्दतें हो गई इक ख्वाब सुनहरा देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा

                                                               
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आईना देख के बोले, ये संवरने वाले,
अब तो बे-मौत मरेंगे, मेरे  मरने वाले

देख के तुमको होश में आना भूल गए
याद रहे तुम और ज़माना भूल गए
जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

चाहा था ये कहेंगे, सोचा था वो कहेंगे
आये वो सामने तो कुछ भी न कह सके
बस देखा किये उन्हें हम

देख कर तुमको यकीं होता है
कोई इतना भी हसीं होता है
देख पाते हैं कहाँ हम तुमको
दिल कहीं होश कहीं होता है

जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

आकर चले न जाना ऐसे नहीं सताना
देकर हंसी लबों को आँखों को नहीं रुलाना
देना न बेक़रारी दिल का क़रार बनके
यादों में खो न जाना इंतज़ार बनके

भूल कर तुमको न जी पाएंगे
साथ तुम होगी जहाँ जायेंगे
हम कोई वक़्त नहीं है हमदम
जब बुलाओगे चले आएंगे

जब सामने तुम आ जाते हो
क्या जाने क्या हो जाता है
कुछ मिल जाता है, कुछ खो जाता है
क्या जाने क्या हो जाता है

                                          
Voice : Asha Bhonsle & Jagjit Singh

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album : hope

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला 
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला 

उसको रुख़सत तो किया था मुझे मालूम न था 

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला 

इक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया 

कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला 

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा 

जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला 
                                                           

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तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे
जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो
चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे


                                                                  
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album : insight


अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम है 
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है 
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं 

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से 
किसको मालूम कहाँ के है किधर के हम हैं 

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब 

सोचते रहते हैं किस राहगुजर के हम हैं 

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album : love is blind

तुम ये कैसे जुदा हो गये 
हर तरफ हर जगह हो गये 

अपना चेहरा न बदला गया 
आईने से ख़फ़ा हो गये 

जाने वाले गए भी कहाँ 
चाँद सूरज घटा हो गये 

बेवफ़ा तो न वो थे न हम 
यूँ हुआ बस जुदा हो गये 

आदमी बनना आसां न था 

शेख जी आरसा हो गये 

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album : sajda

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी 

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ 
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी 

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते 
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी 

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ 
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी 

ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आखरी सांस तक बेकरार आदमी 

मज़ार : कब्र 

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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है

                                                       
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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है 
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है 

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता 
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है

नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले 
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो 
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन 
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है

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वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे
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दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती

हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने को यहाँ वैसे भी फुरसत नहीं मिलती


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कुछ तबियत ही मिली थी ऐसी, चैन से जीने की सूरत ना हुई 
जिसको चाहा, उसे अपना न सके, जो मिला उससे मुहब्बत न हुई 

जिससे जब तक मिले, दिल ही से मिले, दिल जो बदला तो फ़साना बदला 
रस्में दुनिया की निभाने के लिए, हमसे  रिश्तों की तिज़ारत न हुई 

वक़्त रूठा रहा बच्चे की तरह, राह में कोई खिलौना ना मिला 
दोस्ती भी तो निभाई ना गई, दुश्मनी में भी अदावत न हुई 

दूर से था वो कई चेहरों में, पास से कोई वैसा ना लगा 
बेवफाई भी था उसी का चलन फिर किसी से भी शिकायत ना हुई 

तिज़ारत : व्यापार 
अदावत : निभाना 

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दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है 
मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है 

बरसात का बादल तो दीवाना है, क्या जाने 
किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है 

अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम 
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है 

ग़म हो कि ख़ुशी, दोनों कुछ देर के साथी है 
हर गाम पे पहरा है, फिर भी इसे खोना है 

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को 
आकाश की चादर है, धरती का बिछोना है 

गाम : कदम 


















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