cry for cry

मित्रों, जगजीत सिंह को ग़ज़ल सम्राट यूं ही नहीं कहते,  यह बात इस ग़ज़ल से सिद्ध हो जाती है.... उन्होंने जब से ग़ज़ल गायन शुरू किया तब से लेकर इंतेकाल तक अपनी क्वालिटी, अपनी लोक लुभावन धुनों से दुनिया भर के दिलों पर राज किया, ये एक मात्र कलाकार मेरे दिमाग में आते है जिन्होंने अपने पूरे संगीत कॅरिअर में कभी भी विफलता नहीं देखी…उसके पीछे एक बड़ी वजह उनकी ग़ज़लों का चयन भी था, उन्होंने आम आदमी को समझ में आने वाली रचनाएं चुनी, न कि क्लिष्ट और भारी भरकम शब्दों से युक्त रचना…उनका एक भी एल्बम ये कह कर नकारा नहीं जा सकता कि यार मज़ा नहीं आया…खुद गुलज़ार इस बात को मानते है कि  " जगजीत के उत्पाद में कोई भिन्नता नहीं है, ये निरंतरता वाला कलाकार है ( a composer with consistency ) "……

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
जख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ  है ?

जब हक़ीक़त है कि हर जहन में तू रहता है 
फिर ज़माने में कहीं मस्ज़िद कहीं मंदिर क्यूँ  है ?

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है ?

ज़िन्दगी जीने के काबिल ही नहीं अब फाकिर 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है ?  



                                            " sudarshan fakir "


*********************************************************************************

कभी आंसू कभी खुशी बेची
हम ग़रीबों ने बेकसी बेची 

चंद सांसें खरीदने के लिए 
रोज थोड़ी सी ज़िन्दगी बेची 

जब रुलाने लगे मुझे साये 
मैंने उकता के रौशनी बेची

एक हम थे कि बिक गए खुद ही 
वरना दुनिया ने दोस्ती बेची

                                   " Abu Talib "

*********************************************************************************

अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ 

इतनी महंगाई कि बाजार से कुछ लाता हूँ 
अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ 

अपनी नींदों का लहू पोंछने की कोशिश में,
जागते जागते थक जाता हूँ, सो जाता हूँ 

कोई चादर समझ के खींच न ले फिर से ' खलील '
मैं कफ़न ओढ़ के फूटपाथ पे सो जाता हूँ। 

                                              "  Khalil dhantejvi "

********************************************************************************

माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी

जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें न हो अप्सरा की
हो न परियां जहाँ आसमानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख को जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रौशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

                                        " नन्द लाल पाठक "

******************************************************************************





No comments:

Post a Comment