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Jagjit singh : In Search

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आंसू तेरे दामन पर गिरा कर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

                                " qateel shifai "

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जब किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना 

यूँ उजालों से वास्ता रखना 
शमा के पास ही हवा रखना 

घर की तावीर चाहे जैसी हो 
इसमें रोने की कुछ जगह रखना 

मस्जिदें है नमाज़ियों के लिए 
अपने घर में ही कहीं खुदा रखना 

मिलना जुलना जहाँ जरूरी है 
मिलने जुलने का हौसला रखना 

                                                " Nida Fazli "

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कैसे कैसे हादसे सहते रहे 
फिर हम भी जीते रहे हँसते रहे 

उसके आ जाने की उम्मीदें लिए 
रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे 

वक़्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह 
हम चराग़ों की तरह जलते रहे 

कितने चेहरे थे हमारे आस-पास 
तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे 

                                                        " Wazida Tabassum "

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दोस्ती जब किसी से की जाये 
दुश्मनों की राय ली जाये 

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में 
अब कहाँ जा के सांस ली जाये 

बस इसी सोच में डूबा हुआ 
ये नदी कैसे पार की जाये 

मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे 
आज फिर कोई भूल की जाये 

बोतलें खोल के पी बरसों 
आज दिल खोल कर भी पी जाये 

                                                 " Rahat Indori "

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