अपनी आखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे
ऐ मेरे दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे
ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे
" नज़ीर बाकरी "
माज़ी : भूतकाल
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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सम्भलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है
मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं
" राहत इंदौरी "
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे
ऐ मेरे दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे
ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे
" नज़ीर बाकरी "
माज़ी : भूतकाल
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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सम्भलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है
मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं
" राहत इंदौरी "
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मेरा दिल भी शौक़
से तोड़ो, एक तजुर्बा और सही
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही
रात है ग़म की आज बुझा दो, जलता हुआ हर एक चरागाँ
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही
दम है निकलता इक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही
खंजर लेकर सोचते क्या हो, क़त्ल--ए'मुराद' भी कर डालो
दाग़ हैं सौ दामन पे तुम्हारे, एक इज़ाफ़ा और सही
" मुराद लखनवी "
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही
रात है ग़म की आज बुझा दो, जलता हुआ हर एक चरागाँ
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही
दम है निकलता इक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही
खंजर लेकर सोचते क्या हो, क़त्ल--ए'मुराद' भी कर डालो
दाग़ हैं सौ दामन पे तुम्हारे, एक इज़ाफ़ा और सही
" मुराद लखनवी "
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सामने है जो उसे
लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं
ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं
फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं
चंद मासूम से पत्तों का लहू है ' फ़ाकिर '
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं
" सुदर्शन फ़ाकिर "
ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं
फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं
चंद मासूम से पत्तों का लहू है ' फ़ाकिर '
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं
" सुदर्शन फ़ाकिर "
सिला : पुरस्कार
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नींद से आँख खुली है, अभी देखा क्या है
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है
बांध रखा है किसी सोच ने घर से हमको
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है
रेत के, ईंट के, पत्थर के हो या मिट्टी के
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है
अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ' शाहिद '
वरना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है
" शाहिद कबीर "
दानिस्त : ज्ञान
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सारे बदन का ख़ून, पसीने में जल गया
इतना चले कि जिस्म हमारा पिघल गया
चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन
दम लेने जो हम बैठ गए दम निकल गया
अच्छा हुआ जो राह में ठोकर लगी हमें
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया
वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका
दामन की फ़िक्र की तो गिरेबाँ निकल गया
" महमूद दुर्रानी "
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अपनी आग को ज़िंदा रखना कितना मुश्किल है
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है
कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है
तुमने मंदिर देखे होंगे ये मेरा आँगन है
एक दीया भी जलता रखना कितना मुश्किल है
चुल्लू में हो दर्द का दरिया, ध्यान में उसके होंठ
यूँ भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है
" इशरत आफरीन "
पस-ए-आईना : आईने के सामने
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सफ़ीना : कश्ती, नाव
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देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है
बांध रखा है किसी सोच ने घर से हमको
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है
रेत के, ईंट के, पत्थर के हो या मिट्टी के
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है
अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ' शाहिद '
वरना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है
" शाहिद कबीर "
दानिस्त : ज्ञान
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सारे बदन का ख़ून, पसीने में जल गया
इतना चले कि जिस्म हमारा पिघल गया
चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन
दम लेने जो हम बैठ गए दम निकल गया
अच्छा हुआ जो राह में ठोकर लगी हमें
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया
वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका
दामन की फ़िक्र की तो गिरेबाँ निकल गया
" महमूद दुर्रानी "
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अपनी आग को ज़िंदा रखना कितना मुश्किल है
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है
कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है
तुमने मंदिर देखे होंगे ये मेरा आँगन है
एक दीया भी जलता रखना कितना मुश्किल है
चुल्लू में हो दर्द का दरिया, ध्यान में उसके होंठ
यूँ भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है
" इशरत आफरीन "
पस-ए-आईना : आईने के सामने
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झूठी-सच्ची आस पे जीना,
कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
मय की जगह खून-ए-दिल पीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे
तूफ़ानों की ज़द पे सफ़ीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
एक महीने के वादे पर साल गुज़ारा फिर भी ना आये
वादे का ये एक महीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
सामने दुनिया भर के ग़म हैं और इधर इक तन्हा हम हैं
सैकड़ों पत्थर, इक आईना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
" काशिफ़ इंदौरी "
मय की जगह खून-ए-दिल पीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे
तूफ़ानों की ज़द पे सफ़ीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
एक महीने के वादे पर साल गुज़ारा फिर भी ना आये
वादे का ये एक महीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
सामने दुनिया भर के ग़म हैं और इधर इक तन्हा हम हैं
सैकड़ों पत्थर, इक आईना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
" काशिफ़ इंदौरी "
सफ़ीना : कश्ती, नाव
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