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Nasha : Jagjit singh

चराग़-ओ-आफ़ताब गुम, बड़ी हसीन रात थी 
शबाब की नक़ाब गुम, बड़ी हसीन रात थी

मुझे पिला रहे थे वो, कि खुद ही शमा बुझ गई 
गिलास गुम शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है 
हुई वही किताब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब ही सिल गए 
सवाल गुम जवाब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

चराग़-ओ-आफ़ताब : दीया और सूरज   
                                                                   " सुदर्शन फ़ाकिर "

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जवां है रात साक़िया, शराब ला शराब ला 
जरा सी प्यास तो बुझा, शराब ला शराब ला

तेरे शबाब पर सदा करम रहे बहार का 
तुझे लगे मेरी दुआ, शराब ला शराब ला

यहाँ कोई न जी सका, न जी सकेगा होश में 
मिटा दे नाम होश का, शराब ला शराब ला

तेरा बड़ा ही शुक्रिया, पिलाये जा पिलाये जा 
न जिक्र कर हिसाब का, शराब ला शराब ला

                                                            " मदन पाल "

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ये पीने वाले बहुत ही अजीब होते हैं 
जहाँ से दूर, ये खुद के करीब होते हैं 

किसी को प्यार मिले और किसी को रुसवाई 
मोहब्बतों के सफर भी अजीब होते हैं 

मिला किसी को है क्या सोचिये अमीरी से 
दिलों के शाह तो अक्सर ग़रीब होते हैं 

यहाँ के लोगों की है ख़ासियत ये सबसे बड़ी 
हबीब लगते हैं लेकिन रक़ीब होते हैं 

हबीब : दोस्त 
रक़ीब : प्रेमिका का दूसरा प्रेमी 


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शायद में ज़िदगी की सहर ले के आ गया 
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया 

ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की 
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र ले के आ गया 

नश्तर है मेरे हाथ में, कान्धों पे मयकदा 
लो मैं ईलाजे दर्द-ए-जिगर ले के आ गया 

' फ़ाकिर ' सनम-कदे में ना आता मैं लौटकर 
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया 

सनम-कदे : प्रेमिका का स्थान 

                                                   " सुदर्शन फाकिर "

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ना कह साक़ी बहार आने के दिन हैं 
जिगर के दाग छिल जाने के दिन हैं 

अदा सीखो अदा आने के दिन हैं 
अभी तो दूर शरमाने के दिन हैं 

गिरेबां ढूंढते हैं हाथ मेरे 
चमन में फूल खिल जाने के दिन हैं 


तुम्हे राज़-ए-मोहब्बत क्या बताएं 
तुम्हारे खेलने खाने के दिन हैं

                                                " बेखुद देहलवी "

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क़ासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं 
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में 

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ऐ-ख़राब में 
शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में 

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ऐ-जाम 
साक़ी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में 

ता फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर 
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में 

ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी कभी 
पीता हूँ रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब में 

                                                       " मिर्ज़ा ग़ालिब "
क़ासिद : डाकिया 
हिज्र : जुदाई 
बज़्म : महफ़िल 
अहद : वादा 
रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब : जिस दिन आसमान में चाँद निकला हो 

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Mirza Ghalib

लीजिये जनाब, आज ग़ालिब साहब की ग़ज़ल आपके सामने रख ही दी....मेरी कलम में वो दवात नहीं जो इनके बारे में लिख सके.…लेकिन मशहूर फ़नकारों की रचनाओ को आप तक पहुचाने का जिम्मा लिया है तो पूरा करना ही होगा…ग़ज़लों में ग़ालिब  को वो ही रुतबा प्राप्त है जो किसी गुलशन में ग़ुलाब को.…उर्दू में इनसे अधिक गहराई अपनी शायरी में शायद कोई नहीं रख पाया ऐसा मैंने पढ़ा है.…बाकी फ़नकारो के मुकाबले इनके बहुत कम दीवान बाज़ार में उपलब्ध है क्युकि ये अपने कलामों के प्रति अत्यधिक निष्ठुर थे.…बार बार उनको काट छांट कर कुछ नया लाने के क्रम में इनकी रचनाएं बहुत सीमित मात्रा में सामने आ पाई.…सही भी है, आखिर master stroke तो ऐसे perfection की बदौलत ही मारा जा सकता है.…इनकी शायरी पढ़ने के बाद बाकी शायरी आपको चीनी कम लग सकती है.…और अगर इनके शेर समझ आ जाए तो आप अपना बुद्धिमत्ता स्तर काफी ऊपर मान सकते है.…जनाब ये मजाक नहीं है बल्कि हक़ीकत फरमा रहा हूँ, क्यूंकि अपने जीते जी इनको अपने आपको साबित करने में बहुत समय लगा, कहा जाता था कि ये क्या लिखता है जो समझ की सीमा से ही बाहर है.…बहुत उपेक्षा और जिल्लत सहने के बाद इनके हुनर को पहचाना उर्दू अदब पसंद राजा बहादुर शाह जफ़र ने.…फिर तो साहब इतिहास में शामिल होने का हुनर तो ग़ालिब की ग़ज़लों में था ही.…
ये सब बातें आप भी इनके बारे में विस्तार से जान सकते हैं.…गुलज़ार द्वारा रचित सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब जो कि youtube पर पूरा उपलब्ध है, इस सीरियल में इनकी ग़ज़लों को संगीतबद्ध और स्वरबद्ध किया जगजीत सिंह ने… में दावे से कह सकता हूँ कि अगर जगजीत पूरे जीवन काल में केवल यही एल्बम करते तो भी लोगों की यादों में अमर हो जाते, फिर उन्होंने तो सैकड़ों उम्दा एल्बम दिये…बहरहाल ये सीरियल देखिये, और यकीन मानिये आपको इससे बेहतर सामग्री इस फनकार के बारे में कही से नहीं मिल सकती....youtube पर खोजने का फार्मूला आप बेहतर जानते हैं  :)

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन*
हमारी जेब को अब हाजते* रफू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तज़ू क्या है

रही न ताकते गुफ्तार* और अगर हो भी
तो किस उम्मीद से कहिये कि आरज़ू क्या है

                     
शब्दार्थ : पैराहन - कपड़े , हाजते - जरूरत, गुफ्तार - सब्र

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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यूँ
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यूँ

क़ैदे हयात-ओ-बन्दे ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यूँ

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, गैर हमें उठाये क्यूँ

ग़ालिबे ख़स्ता के बगैर कौनसे काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिये हाय हाय क्यूँ


संग-ओ-ख़िश्त : पत्थर का टुकड़ा 
क़ैदे हयात : ज़िन्दगी की क़ैद 
हरम : घर बार 
आस्तां : आशियाना 

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ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता। 

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झुठ जाना 
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।  

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह 
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता। 

कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।  

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता। 


विसाल - मिलन 
नासेह - उपदेशक 
चारासाज़ - दर्द कम करने वाला  
ग़म-गुसार - हमदर्द 

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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है ?

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ।

हम हैं मुश्ताक़* और वो बेज़ार*
या इलाही ये माजरा क्या है ।

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है ।

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैंने नहीं जानता दुआ क्या है । 

मुश्ताक़ : बेसब्र 


बेज़ार : मंद 

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं ख़ून-ए-जिगर होने तक

हमने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़मर्ग इलाज 
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक                 

                                       
सब्र-तलब : धैर्य
तग़ाफ़ुल : उपेक्षा
जुज़मर्ग : मौत के अलावा

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उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक 
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है 

देखिये पाते हैं उशाक़ बुतों से क्या फैज़ 
इक ब्राह्मण ने कहा है कि ये साल अच्छा है 

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है 

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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल - खेल का मैदान 
शब-ओ-रोज़ - रात दिन 
निहाँ - गुप्त 
जबीं - माथा 
जुम्बिश - हरकत, गति 

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क़ासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं 
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में 

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ऐ-ख़राब में 
शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में 

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ऐ-जाम 
साक़ी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में 

ता फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर 
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में 

ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी कभी 
पीता हूँ रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब में 

                                                       " मिर्ज़ा ग़ालिब "
क़ासिद : डाकिया 
हिज्र : जुदाई 
बज़्म : महफ़िल 
अहद : वादा 

रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब : जिस दिन आसमान में चाँद निकला हो 

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