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Encore : jagjit singh


आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया


                                           " वसीम बरेलवी "

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तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी होगी
फिर उस सजदे का क्या कहना अनोखी बंदगी होगी

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी

दिखा दूँगा सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर
वो मेरे दिल में होगी और दुनिया देखती होगी

मज़ा आ जायेगा महशर फिर कुछ सुनने सुनाने का
ज़ुबाँ होगी वहाँ मेरी, कहानी आप की होगी

तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी

                                             " सीमाब अकबराबादी "

क़ज़ा : मौत 
नसीम-ए-सुबह : सुबह की ठंडी हवा 
सर-ए-महफ़िल : भरी महफ़िल में 
सर-ए-महशर : क़यामत के दिन 
दानिस्ता : जान बुझ कर 

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इश्क़ की दास्तान है प्यारे
अपनी अपनी ज़ुबान है प्यारे

हम ज़माने से इन्तक़ाम तो लें
एक हसीं दरमियान है प्यारे

तू नहीं मैं हूँ, मैं नहीं तू है
अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे

रख क़दम फूँक फूँक कर नादाँ
ज़र्रे ज़र्रे में जान है प्यारे


                                       " जिगर मुरादाबादी "


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ठुकराओ अब, के प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ऐ-वफ़ा मगर
मेरा ना एतबार करो, मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे, मेरा साग़र संभाल लो
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

मुझको क़दम-क़दम पे भटकने दो वाइज़ों
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ

फ़िर बेख़ुदी में हद से गुज़रने लगा हूँ मैं
इतना ना मुझसे प्यार करो, मैं नशे में हूँ

                                                         " शाहिद कबीर "


वाइज : धर्म उपदेशक 

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चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले

फ़स्ल-ए-गुल आई फिर इक बार असिरान-ए-वफ़ा
अपने ही ख़ून के दरिया में नहाने निकले

दिल ने एक ईटं से तामीर किया ताज-महल
तूने इक बात कही लाख़ फ़साने निकले

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा में खड़ा सोचता हूँ
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले

                                                          " अमजद इस्लाम अमजद "


फ़स्ल-ए-गुल : बहार का मौसम 
असिरान-ए-वफ़ा : वफ़ा निभाने वाले 
तामीर : निर्माण 
दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा : बिछड़ा हुआ तन्हाई के जंगल में 

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Beyond Time : Jagjit Singh

अपनी आखों के समंदर में उतर जाने दे 
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे 

ऐ मेरे दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना 
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे 

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी 
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे 

ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको 
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे 

                                                          " नज़ीर बाकरी "

माज़ी : भूतकाल 

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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सम्भलते क्यों हैं 
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है 

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं


                                                      " राहत इंदौरी "

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मेरा दिल भी शौक़ से तोड़ो, एक तजुर्बा और सही
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही

रात है ग़म की आज बुझा दो, जलता हुआ हर एक चरागाँ 
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही

दम है निकलता इक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही

खंजर लेकर सोचते क्या हो, क़त्ल--'मुराद' भी कर डालो
दाग़ हैं सौ दामन पे तुम्हारे, एक इज़ाफ़ा और सही


                                                                       " मुराद लखनवी "

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सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं

ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं

चंद मासूम से पत्तों का लहू है ' फ़ाकिर '
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं

                                                                  " सुदर्शन फ़ाकिर "
सिला : पुरस्कार 

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नींद से आँख खुली है, अभी देखा क्या है 
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है 

बांध रखा है किसी सोच ने घर से हमको 
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है 

रेत के, ईंट के, पत्थर के हो या मिट्टी के 
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है 

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ' शाहिद '
वरना हाथों में लकीरों के  अलावा क्या है 

                                                    " शाहिद कबीर "

दानिस्त :  ज्ञान 

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सारे बदन का ख़ून, पसीने में जल गया 
इतना चले कि जिस्म हमारा पिघल गया 

चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन 
दम लेने जो हम बैठ गए दम निकल गया 

अच्छा हुआ जो राह में ठोकर लगी हमें 
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया 

वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका 
दामन की फ़िक्र की तो गिरेबाँ निकल गया 
                                                               
                                                                " महमूद दुर्रानी "

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अपनी आग को ज़िंदा रखना कितना मुश्किल है 
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है 

कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की  
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है 

तुमने मंदिर देखे होंगे ये मेरा आँगन है 
एक दीया भी जलता रखना कितना मुश्किल है 

चुल्लू में हो दर्द का दरिया, ध्यान में उसके होंठ 
यूँ भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है

                                                                   " इशरत आफरीन "

पस-ए-आईना : आईने के सामने

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झूठी-सच्ची आस पे जीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
मय की जगह खून-ए-दिल पीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे
तूफ़ानों की ज़द पे सफ़ीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

एक महीने के वादे पर साल गुज़ारा फिर भी ना आये
वादे का ये एक महीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सामने दुनिया भर के ग़म हैं और इधर इक तन्हा हम हैं
सैकड़ों पत्थर, इक आईना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

                                                                            " काशिफ़ इंदौरी "


सफ़ीना : कश्ती, नाव 

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Love is Blind

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे  

कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुमसे
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे

कभी दुनिया मुकम्मल बनके आएगी निगाहों में
कभी मेरी कमी दुनिया की हर इक शय में पाओगे

कहीं पर भी रहे हम तुम मुहब्बत फिर मुहब्बत है
तुम्हे हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगे

                                               " नज़ीर बनारसी "

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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गये
मेरी आँखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गये

कब की पत्थर हो चुकी थी मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गये

जाने क्या अहसास साजे-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गये

अब कोई उम्मीद है ' शाहिद ' न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गये 

                                     " Shahid Kabir "

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तुम ये कैसे जुदा हो गये 
हर तरफ हर जगह हो गये 

अपना चेहरा न बदला गया 
आईने से ख़फ़ा हो गये 

जाने वाले गए भी कहाँ 
चाँद सूरज घटा हो गये 

बेवफ़ा तो न वो थे न हम 
यूँ हुआ बस जुदा हो गये 

आदमी बनना आसां न था 
शेख जी आरसा हो गये 

                              " Nida Fazli "

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वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता 
किस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता 

ऐसे भी है दुनिया में जिन्हे ग़म नहीं होता 
इक ग़म है हमारा जो कभी कम नहीं होता 

क्या सुरमा भरी आँखों से आंसू नहीं गिरते 
क्या मेहंदी लगी हाथों से मातम नहीं होता 

कुछ और भी होती है बिगड़ने की अदाएं  
बनने में संवरने में ये आलम नहीं होता 

                                                             " Raiz Khairabadi "


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Jagjit & Lata ji : Album Sajda


माँ सरस्वती का जीता जागता रूप और ग़ज़ल सम्राट अर्थात लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जब एक साथ एक एल्बम में आये तो वो एल्बम विशिष्ट तो हो ही जाता है। मुझे याद है जब hmv ने बड़े ही royal पैक में इन दोनों दिग्गजों का एल्बम जारी किया था जिसकी कीमत भी उस वक़्त के हिसाब से ज्यादा थी। फिर भी ग़ज़ल प्रेमियों ने इस एल्बम को हाथों हाथ लिया। मेरी उम्र उस वक़्त कम थी महज 18 साल लगभग, किन्तु मैंने अपनी माँ से इतने पैसे की व्यवस्था करवाई, बदले में एक साल तक मुझे 1 भी रुपया नहीं मिला। लेकिन ग़ज़ल के शौक के आगे सभी जरूरतें बौनी थी। उस वक़्त के हिसाब से इसमें आधुनिक echo sound भी था जो कि लोगों के लिए विशेष था। विभिन्न शायरों की रचनाओं से युक्त ये एल्बम कालजयी की श्रेणी में आ गया। लता जी की आवाज़ एक बारगी जगजीत जी को भी फीका कर देती है। अपने गायकी और आवाज़ के चरम पर हैं लता जी इस एल्बम में। फिलहाल दोनों की गाई हुई ग़ज़ल आपके सामने रखी है। और हाँ अगर आप ग़ज़ल प्रेमी हैं तो ये एल्बम आपके पास होना ही चाहिए।


ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है - मेरा भी 
ये नज़राना तेरा भी है - मेरा भी 

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना 
राग पुराना तेरा भी है - मेरा भी 

तू मुझको और मैं तुझको समझाऊँ क्या 
दिल दीवाना तेरा भी है - मेरा भी 

शहर में गलियों गलियों जिसका चर्चा है 
वो अफसाना तेरा भी है - मेरा भी 

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है - मेरा भी 

                                             " Shahid Kabir " 

sung by both : lata ji and jagjit ji

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मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों 
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों 

वो बेख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों 

मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
मैं अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों 

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था 
मैं उसकी घर का पता किससे पूछता यारों 

                                                   " Waseem Barelvi "

sung by jagjit ji

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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग 
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग 

क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी 
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग 

तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया 
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग 

कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर 
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग 

                                             " दानिश अलीगढ़ी "

sung by jagjit ji

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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह 
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह 

मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे 
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह 

सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके 
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह 

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे 
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह 

                                         " qateel shifai "

sung by Lata ji

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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं 

मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ 
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 

ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब 
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं 

वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना 
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                    " Sahir Bhopali "

sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी 

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ 
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी 

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते 
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी 

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ 
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी 

ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आखरी सांस तक बेकरार आदमी 

                                                 " Nida fazli " 

मज़ार : कब्र 

sung by  : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

                                                         " Nida Fazli "

sung by : jagjit ji

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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है 
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है 

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता 
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है

नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले 
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो 
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन 
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है

                                                 " अख्तर शीरानी "

sung by : lata ji and jagjit ji

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मेरी तस्वीर में, रंग और किसी का तो नहीं 
घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं 

ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ 
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं 

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं 
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं 

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा 
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं 

                                             " मुजफ्फर वारसी "

sung by : lata ji

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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा 
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा 

इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने 
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा 

तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे 
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा 

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला 
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा 

                                                    " अहमद फ़राज़ "

मानूस : लगाव 
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन 
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी 
अता : तोहफा 



sung by : Lata Ji 

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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ 
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ 

वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था 
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ 

दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे 
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ 

ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी 
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ 

यकता : बेजोड़ 
बेगाना-रवी : रूखापन 

                                            " अहमद नदीम क़ासमी "


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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं 
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते 

                                        " ज़फर गोरखपुरी "

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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे 
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे 

इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे 

बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई 
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे 

ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां 
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे 

                                         " सबा अफगानी "

इब्तिदा : आरम्भ 
इंतिहा : अंत 
तसकीन : तसल्ली 


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Jagjit singh : Face to Face

दैरो हरम में बसने वालों,
मैखानों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे,
तुम अपनी कश्ती को सम्भालो।

मैखाने में आये वाइज़,
इनको भी इंसान बना लो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो,
ताजमहल पे रंग न डालो।

                      " खामोश ग़ाज़ीपुरी "

वाइज़ - पंडित,
दैरो हरम - घरबार
आरिज़-ओ-लब - गाल और होंठ

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शेख़ जी, थोड़ी सी पीकर आइये
मय है क्या शै फिर हमें बतलाइये

आप क्यूँ है सारी दुनिया से जुदा
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइये

क्या है अच्छा, क्या बुरा बन्दा-नवाज़
आप समझें तो हमें समझाइये

जाने दीजे अक्ल की बातें जनाब
दिल की सुनिए और पीते जाइये

उलझनें दुनिया की सुलझा लेंगे हम
आप अपनी ज़ुल्फ़ तो सुलझाइए

                            ' sudarshan fakir '


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तुमने बदले हमसे गिन गिन के लिये  
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिये 

वस्ल का दिन और इतना मुक्तसर 
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये 

वो नहीं सुनते हमारी क्या करें 
मांगते हैं हम दुआ जिनके लिये 

चाहने वालों से गर मतलब नहीं 
आप फिर पैदा हुए किनके लिये 

बागबां कलियाँ वो हलके रंग की 
भेजनी है एक कमसिन के लिये 

                                         " Daag & Ameer Minayee "

वस्ल - मिलन
मुक्तसर - थोड़ा/कम

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सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन न आया.... सच्ची बात कही थी मैंने

ले के जहाँ भी वक़्त गया है
ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है
सच का इक इनाम मिला है.... सच्ची बात कही थी मैंने

सबसे बेहतर कभी न बनना
जग के रहबर कभी न बनना
पीर-पैगम्बर कभी न बनना.... सच्ची बात कही थी मैंने

चुप रहकर ही वक़्त गुजारो
सच कहने में जां मत वारो
कुछ तो सीखो मुझसे यारों.... सच्ची बात कही थी मैंने

                                                                     " Sabir Dutt "

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बेसबब बात बढाने की जरुरत क्या है
हम ख़फ़ा कब थे मनाने की जरुरत क्या है

आप के दम से तो दुनिया का भरम है कायम
आप जब हैं तो ज़माने की जरुरत क्या है

तेरा कूचा, तेरा दर, तेरी गली काफी है
बे-ठिकानों को ठिकाने के जरुरत क्या है

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में
हाथ से हाथ मिलाने की जरुरत क्या है

रंग आँखों के लिए, बू है दिमागों के लिए 
फूल को हाथ लगाने की जरुरत क्या है 

                                     " Shahid kabir "

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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है 
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है 

गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हो या डोर 
लाख करे कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है 

हमने इलाजे ज़ख्मे दिल तो ढूंढ लिया लेकिन 
गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है 

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था 
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है

                                                            " Hastimal Hasti "

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कोई मौसम ऐसा आये 
उसको अपने साथ जो लाये 

लोगों से तारीफ़ सुनी थी 
उससे मिलकर देखा जाये 

आज भी दिल पर बोझ बहुत है 
आज भी शायद नींद न आये 

हाल है दिल का जुगनू जैसा 
जलता जाए बुझता जाये 

बीते लम्हे कुछ ऐसे हैं 
खुशबू जैसे हाथ न आये 

                                      " Azhar Inayati "

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ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या, कुछ भी नहीं 

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो 
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं 

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ 
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं 

या-खुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार 
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं 

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह 
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं 

                                                                      " rajesh reddy "

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