आवारा है गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई
जाएं तो कहाँ जाएं, हर मोड़ पर रुसवाई
ये फूल से चेहरे है, हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना, बेगाने हैं सब रस्ते
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई.......मैं और मेरी तन्हाई
अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई.......मैं और मेरी तन्हाई
आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई.......मैं और मेरी तन्हाई
हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंसकर कभी गाती है
ये प्यार की बाहें है, या मौत की अंगड़ाई.......मैं और मेरी तन्हाई
" Ali Sardar Jafri "
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तम्मनाओं के बहलावे में अक्सर आ ही जाते हैं
कभी हम चोट खाते हैं, कभी हम मुस्कुराते हैं
हम अक्सर दोस्तों की बेवफाई सह तो लेते हैं
मगर हम जानते हैं, दिल हमारे टूट जाते हैं
किसी के साथ जब बीते हुए लम्हों की याद आई
फटी आँखों में अश्क़ों के सितारे झिलमिलाते हैं
ये कैसा इश्तियाक़-ए-दीद है और कैसी मजबूरी
किसी की बज़्म तक जा जा के हम क्यों लौट आते हैं
" Ali Sardar Zafri "
इश्तियाक़-ए-दीद : दीदार की लालसा
बज़्म : महफ़िल
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नशीली रात में जब तुमने ज़ुल्फ़ों को संवारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
गुलों को मिल गई रंगत तुम्हारे सुर्ख गालों से
सितारों ने चमक पाई तबस्सुम के उजालों से
तुम्हारी मुस्कराहट ने बहारों को निखारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
लब-ए-रंगीं अरे तौबा, गुलाबी कर दिया मौसम
तुम्हारी शौख नज़रों ने शराबी कर दिया मौसम
नशे में चूर है आलम, नशीला हर नज़ारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
" Asrar M. Suri "
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जब नहीं आये थे तुम तब भी तो तुम आये थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत
तुम नहीं आये अभी फिर भी तो तुम आये हो
रात के सीने में मेहताब के खंजर की तरह
सुबह के हाथ में खुर्शीद के सागर की तरह
तुम नहीं आओगे जब फिर भी तो तुम आओगे
ज़ुल्फ़ दर ज़ुल्फ़ बिखर जायेगा फिर रात का रंग
शब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़े मुलाकात का रंग
आओ आने की करें बात कि तुम आये हो
अब तुम आये हो तो मैं कौनसी शय नज़र करूँ
कि मेरे पास सिवा मेहर-ओ-वफ़ा कुछ भी नहीं
एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
" Ali Sardar Zafri "
मेहताब : चाँद
खुर्शीद : सूरज
शब-ए-तन्हाई : तन्हाई भरी रात
मेहर-ओ-वफ़ा : प्यार व् वफ़ा
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जाएं तो कहाँ जाएं, हर मोड़ पर रुसवाई
ये फूल से चेहरे है, हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना, बेगाने हैं सब रस्ते
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई.......मैं और मेरी तन्हाई
अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई.......मैं और मेरी तन्हाई
आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई.......मैं और मेरी तन्हाई
हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंसकर कभी गाती है
ये प्यार की बाहें है, या मौत की अंगड़ाई.......मैं और मेरी तन्हाई
" Ali Sardar Jafri "
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मेरे दरवाज़े से अब
चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म-खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद
" Ali Sardar Jafri "
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ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए
दिल को अपने सजा न दे यूँही
इस ज़माने की बेरुखी के लिए
कल जवानी का हश्र क्या होगा
सोच ले आज दो घड़ी के लिए
हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए
वक़्त के साथ साथ चलता रहे
यही बेहतर है आदमी के लिए
" Sudarshan Fakir "
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तम्मनाओं के बहलावे में अक्सर आ ही जाते हैं
कभी हम चोट खाते हैं, कभी हम मुस्कुराते हैं
हम अक्सर दोस्तों की बेवफाई सह तो लेते हैं
मगर हम जानते हैं, दिल हमारे टूट जाते हैं
किसी के साथ जब बीते हुए लम्हों की याद आई
फटी आँखों में अश्क़ों के सितारे झिलमिलाते हैं
ये कैसा इश्तियाक़-ए-दीद है और कैसी मजबूरी
किसी की बज़्म तक जा जा के हम क्यों लौट आते हैं
" Ali Sardar Zafri "
इश्तियाक़-ए-दीद : दीदार की लालसा
बज़्म : महफ़िल
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नशीली रात में जब तुमने ज़ुल्फ़ों को संवारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
गुलों को मिल गई रंगत तुम्हारे सुर्ख गालों से
सितारों ने चमक पाई तबस्सुम के उजालों से
तुम्हारी मुस्कराहट ने बहारों को निखारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
लब-ए-रंगीं अरे तौबा, गुलाबी कर दिया मौसम
तुम्हारी शौख नज़रों ने शराबी कर दिया मौसम
नशे में चूर है आलम, नशीला हर नज़ारा है
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है
" Asrar M. Suri "
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आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत
तुम नहीं आये अभी फिर भी तो तुम आये हो
रात के सीने में मेहताब के खंजर की तरह
सुबह के हाथ में खुर्शीद के सागर की तरह
तुम नहीं आओगे जब फिर भी तो तुम आओगे
ज़ुल्फ़ दर ज़ुल्फ़ बिखर जायेगा फिर रात का रंग
शब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़े मुलाकात का रंग
आओ आने की करें बात कि तुम आये हो
अब तुम आये हो तो मैं कौनसी शय नज़र करूँ
कि मेरे पास सिवा मेहर-ओ-वफ़ा कुछ भी नहीं
एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
" Ali Sardar Zafri "
मेहताब : चाँद
खुर्शीद : सूरज
शब-ए-तन्हाई : तन्हाई भरी रात
मेहर-ओ-वफ़ा : प्यार व् वफ़ा
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