Album Passion

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं 
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं 

उन पे तूफां को भी अफ़सोस हुआ करता है 
वो सफ़ीने जो किनारे पे उलट जाते हैं 

हम तो आये थे रहें शाख़ में फूलों की तरह 
तुम अगर खार समझते हो तो हट जाते हैं 

                                  सुदर्शन फ़ाकिर


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ये भी क्या अहसान कम है देखिये ना आपका 
हो रहा है हर तरफ चर्चा हमारा आपका 

चाँद में तो दाग है पर आप में तो वो भी नहीं 
चौदहवी के चाँद से बढ़के चेहरा है आपका 

इश्क़ में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आपके 
अपने चेहरे पे सदाहोता है धोखाआपका 

चाँद सूरज धुप सुबह कहकशां तारे शमा 
हर उजाले ने चुराया है उजाला आपका 

                              वाज़िदा तबस्सुम

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ये क्या जाने में जाना है, जाते हो खफा होकर 
मैं जब जानूं मेरे दिल से चले जाओ जुदा होकर  

क़यामत तक उड़ेगी दिल से उठकर खाक आखों तक 
इसी रस्ते गया है हसरतों का काफ़िला होकर 

तुम्ही अब दर्दे दिल के नाम से घबराये जाते हो 
तुम्ही तो दिल में शायद आये थे दर्द-ऐ-आशियाँ होकर 

यूँ ही हम तुम घडी भर मिला करते थे बेहतर था 
ये दोनों वक़्त जैसे रोज मिलते हैं जुदा होकर 

                                  सीमाब अकबराबादी

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Come Alive By Jagjit Singh


कौन कहता है मुहब्बत की जुबाँ होती है 
ये हक़ीकत तो निगाहों से बयां होती है 

वो न आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को 
वो जो आये तो ख़लिश और जवां होती है 

रूह को शाद करे, दिल को पुरनूर करे 
हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है 

ज़िन्दगी इक सुलगती सी चिता है ' साहिर '
शोला बनती है न ये बुझके धुआं होती है 

                                         साहिर होशियारपुरी



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हरसू दिखाई देते हैं वो जलवागर मुझे 
क्या क्या फरेब देती है मेरी नज़र मुझे 

डाला है बेखुदी ने अजब राह पर मुझे 
आँखें है, और कुछ नहीं आता है नज़र मुझे 

दिल लेके मुझसे देते हो दाग-ऐ-जिगर मुझे 
ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे 

आया ना रास नाला-ऐ-दिल का असर मुझे 
अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी खबर मुझे 

                                  जिगर मुरादाबादी

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कोई पास आया सवेरे सवेरे 
मुझे आजमाया सवेरे सवेरे 

मेरी दास्ताँ को जरा सा बदलकर 
मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे 

जो कहता था कल शब् सम्भलना सम्भलना 
वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे 

कटी रात सारी मेरी मैकदे में 
ख़ुदा याद आया सवेरे सवेरे 

जली थी शमा रात भर जिसकी खातिर 
उसीको जलाया सवेरे सवेरे 

                                                 सईद राही

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मेरी तन्हाइयों तुम ही लगा लो मुझको सीने से 
कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से 

ये आधी रात को फिर चूड़ियां सी क्या खनकती है 
कोई आता है या मेरी ही जंजीरें खनकती है 
ये बातें किस तरह पूछूं मैं सावन के महीने से 

पीने दो मुझे अपने ही लहू का जाम पीने दो 
ना सीने दो किसी को भी मेरा दामन ना सीने दो 
मेरी वहशत न बढ़ जाए कहीं दामन के सीने से 

                                                  prem warbartoni

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Munavvar Rana on Maa

उर्दू साहित्य में जो दर्जा ग़ालिब को प्राप्त है, हिंदी में जो तुलसीदास जी को है ।

माँ की शायरी ने मुनव्वर राना को वही दर्जा दिलाया है । आज के इस महान दिन पर आप लोगों के लिए नजराना :

लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती                   
बस इक माँ है जो कभी ख़फा नहीं होती

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ऐ अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

' मुनव्वर ' माँ के आगे यूँ कभी खुलकर मत रोना
जहाँ बुनियाद हो वहाँ इतनी नमी अच्छी नहीं होती

For Rajasthani songs lovers

प्यारे पाठकों, आपके लिए बेहद मशहूर और लोकप्रिय राजस्थानी गीतों के बोल ( lyrics )  भी उपलब्ध होंगे हमारे नए ब्लॉग पर :

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Qateel Shifaai at his best


चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल 
एक तू ही धनवान है गौरी, बाकि सब कंगाल 

हर आँगन में आये तेरे, उजले रूप की धुप 
छैल छबीली रानी थोड़ा घूँघट और निकाल 

भर भर नज़रें देखें तुझको आते जाते लोग 
देख तुझे बदनाम न कर दे हिरणी जैसी चाल 

सामने तू आये तो धड़के मिलकर लाखों दिल 
अब जाना धरती पर कैसे आते हैं भूचाल 

बीच में रंग महल है तेरा, खाई चारों ओर 
हमसे मिलने की गौरी अब तू ही राह निकाल 

Awesome Poetry of Gulzar


देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा,


देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,


ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.


काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,


ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,


जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा.

Gulzar : Ghazal

अपने आप जल गयी
कल की रात टल गयी
इक धुआं उठा था
फिर राख में बदल गयी
बून्द बून्द टपकी शब्
सड़कों पर पिघल गयी
कल जो रात टल गयी
कितना कुछ बदल गयी

Album :Classic Forever ( Jagjit Singh )



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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है


                                 " कैफ़ भोपाली "

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मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ
मेरा शऊर जगाओ के मैं शराबी हूँ

ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ

ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलूस वालो से
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ

तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ


                                    " सबा सीकरी "

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कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क, ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त ले के पड़ौसी के घर आया होगा

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
आँधियों तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा

‘कैफ’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा


                                         " कैफ भोपाली "

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उसकी बातें बहार की बातें
वादी-ए-लालाज़ार* की बातें       ( गुलाब की वादी )

गुल-ओ-शबनम* का ज़िक्र कर ना अभी       ( फूल और ओस )
मुझको करनी है यार की बातें

मखमली फ़र्श पे हो जिनकें कदम
क्या वो समझेंगे ख़ार* की बातें       ( कांटे )

शेख़* जी मैकदा* है काबा* नहीं       ( पंडित, शराबखाना, मस्जिद )
याँ तो होंगी ख़ुमार की बाते

इश्क़ का कारवाँ चला भी नहीं
और अभी से ग़ुबार की बातें

ये क़फ़स* और तेरा ख़याल-ए-हसीं       ( पिंजरा )
उस पे हरसू बहार की बातें

याद है तुझसे गुफ़्तगू करना
कभी इश्क़, कभी रार की बातें

नसीम-ए-सहर* मुझे भी सुना,       ( सुबह की ठंडी हवा )
गेसू-ए-मुश्क़बार* की बातें       ( खुशबूदार जुल्फें )

जब सुकूँ है कफ़स* में ऐ 'राही'       ( पिंजरा )
क्यूँ करें हम फ़रार* की बातें       ( भागने की बात )

                              " सईद राही "


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हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चाँद

जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँद

रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद

चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद


                                      " राही मासूम रज़ा "


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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये

चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये

सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये

घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये


                                            " मदन पाल "


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नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

खिलखिलाते हुए अपना दामन उठाते हुए
बच्चों के पाँव की धूल का कारवाँ
गाँव की हर गली अपने पैरों की ज़ंजीर है
गाँव का हर मकान अपने रस्ते की दीवार है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

एक अँगोछा लपेटे हुए वक़्त बैठा है दहलीज़ पर
बांस के झुण्ड़ से बचके चलती रहगुज़र
वो गली के किनारे पर बैठी वज़ू करती
मस्जि़द की एक मीनार पर
कब की अटकी हुई इक अज़ान
जिसका सन्नाटा तलवार की धार है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

मैं भी बरगद के साये में बैठी हुई
अपनी यादों की परछाईयाँ बेच दूँ
मेरे लफ्ज़ों में है उस उदासी कहानी का रस
जिसपे चलता न था कच्चे आँगन का बस
निमकियों के कड़े सख़्त लड़े
जो न जाने थे किसके लिए
आज भी किस कदर याद है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है



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