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Qateel Shifaai at his best


चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल 
एक तू ही धनवान है गौरी, बाकि सब कंगाल 

हर आँगन में आये तेरे, उजले रूप की धुप 
छैल छबीली रानी थोड़ा घूँघट और निकाल 

भर भर नज़रें देखें तुझको आते जाते लोग 
देख तुझे बदनाम न कर दे हिरणी जैसी चाल 

सामने तू आये तो धड़के मिलकर लाखों दिल 
अब जाना धरती पर कैसे आते हैं भूचाल 

बीच में रंग महल है तेरा, खाई चारों ओर 
हमसे मिलने की गौरी अब तू ही राह निकाल 

A Milestone

Lyricist of this album is : " Qateel Shifai "


परेशां रात सारी है, सितारों तुम तो सो जाओ 
सुकूते-मर्गतारी है, सितारों तुम तो सो जाओ 

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा 
यही किस्मत हमारी  है, सितारों तुम तो सो जाओ

तुम्हे क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया 
ये बाजी हमने हारी  है, सितारों तुम तो सो जाओ 

कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से 
ये कैसी राज़दारी है, सितारों तुम तो सो जाओ 

हंसो और हँसते हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में 
हमें ये रात भारी  है, सितारों तुम तो सो जाओ 

                                                                      
* सुकूते-मर्गतारी - मौत की ख़ामोशी से घिरे
* ख़लाओं - शून्य

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मिल कर जुदा हुए तो, न सोया करेंगे हम 
इक दूसरे की याद में, रोया करेंगे हम 

आंसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर 
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम 

जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी 
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम 

गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी ' क़तील '
साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम 


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अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की 
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की 

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में 
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की 

वस्ल की रात न जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर 
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की 

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया 
रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की 

* वस्ल -  मिलन
* इसरार - आग्रह
* दानाई - अक्लमंदी


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सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं

बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं

क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं

ले मेरे तजुर्बों से सबक़ ऐ मेरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं


रक़ीब - प्रतिद्वंद्वी 

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पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइए
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइए

पहले मिजाज़-ए-राहगुजर जान जाइए
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइए


कुछ कह रहीं हैं आपके सीने की धड़कनें
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइए

इक धूप सी जमी है निगाहों के आसपास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइए

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झांककर हमें पहचान जाइए


मिजाज़-ए-राहगुजर = रास्ते का स्वाभाव/ प्रकृति, 
गर्द-ए-राह = रास्ते की धूल
निस्बत = सम्बन्ध

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तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमानें कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

निकल कर दैरो काबा से अगर मिलता ना मैख़ाना
तो ठुकराये हुये इन्सान ख़ुदा जाने कहाँ जाते


अंजुमन = महफ़िल वाबस्ता =  सम्बन्धित, सम्बद्ध
बादा-ख़ाना = मदिरालय
दैरो काबा = मंदिर और मस्जिद

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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं 'क़तील'
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको

बादा = शराब


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दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों
पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों

ये दिल, ज़रा सा दिल, तेरी यादों में खो गया
ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों

तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी
अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों

ग़म-ए-हयात : जीवन में ग़म 

शब = रात

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ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे

वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ "क़तील"
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे

मोजज़ा = चमत्कार

संग = पत्थर
बदगुमाँ = मन में संदेह लिया हुआ आदमी 
ग़म-ए-हयात = जीवन का दुःख

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Jagjit & Lata ji : Album Sajda


माँ सरस्वती का जीता जागता रूप और ग़ज़ल सम्राट अर्थात लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जब एक साथ एक एल्बम में आये तो वो एल्बम विशिष्ट तो हो ही जाता है। मुझे याद है जब hmv ने बड़े ही royal पैक में इन दोनों दिग्गजों का एल्बम जारी किया था जिसकी कीमत भी उस वक़्त के हिसाब से ज्यादा थी। फिर भी ग़ज़ल प्रेमियों ने इस एल्बम को हाथों हाथ लिया। मेरी उम्र उस वक़्त कम थी महज 18 साल लगभग, किन्तु मैंने अपनी माँ से इतने पैसे की व्यवस्था करवाई, बदले में एक साल तक मुझे 1 भी रुपया नहीं मिला। लेकिन ग़ज़ल के शौक के आगे सभी जरूरतें बौनी थी। उस वक़्त के हिसाब से इसमें आधुनिक echo sound भी था जो कि लोगों के लिए विशेष था। विभिन्न शायरों की रचनाओं से युक्त ये एल्बम कालजयी की श्रेणी में आ गया। लता जी की आवाज़ एक बारगी जगजीत जी को भी फीका कर देती है। अपने गायकी और आवाज़ के चरम पर हैं लता जी इस एल्बम में। फिलहाल दोनों की गाई हुई ग़ज़ल आपके सामने रखी है। और हाँ अगर आप ग़ज़ल प्रेमी हैं तो ये एल्बम आपके पास होना ही चाहिए।


ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है - मेरा भी 
ये नज़राना तेरा भी है - मेरा भी 

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना 
राग पुराना तेरा भी है - मेरा भी 

तू मुझको और मैं तुझको समझाऊँ क्या 
दिल दीवाना तेरा भी है - मेरा भी 

शहर में गलियों गलियों जिसका चर्चा है 
वो अफसाना तेरा भी है - मेरा भी 

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है - मेरा भी 

                                             " Shahid Kabir " 

sung by both : lata ji and jagjit ji

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मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों 
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों 

वो बेख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों 

मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
मैं अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों 

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था 
मैं उसकी घर का पता किससे पूछता यारों 

                                                   " Waseem Barelvi "

sung by jagjit ji

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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग 
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग 

क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी 
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग 

तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया 
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग 

कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर 
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग 

                                             " दानिश अलीगढ़ी "

sung by jagjit ji

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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह 
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह 

मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे 
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह 

सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके 
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह 

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे 
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह 

                                         " qateel shifai "

sung by Lata ji

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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं 

मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ 
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 

ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब 
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं 

वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना 
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                    " Sahir Bhopali "

sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी 

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ 
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी 

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते 
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी 

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ 
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी 

ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आखरी सांस तक बेकरार आदमी 

                                                 " Nida fazli " 

मज़ार : कब्र 

sung by  : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

                                                         " Nida Fazli "

sung by : jagjit ji

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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है 
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है 

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता 
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है

नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले 
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो 
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन 
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है

                                                 " अख्तर शीरानी "

sung by : lata ji and jagjit ji

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मेरी तस्वीर में, रंग और किसी का तो नहीं 
घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं 

ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ 
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं 

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं 
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं 

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा 
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं 

                                             " मुजफ्फर वारसी "

sung by : lata ji

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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा 
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा 

इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने 
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा 

तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे 
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा 

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला 
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा 

                                                    " अहमद फ़राज़ "

मानूस : लगाव 
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन 
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी 
अता : तोहफा 



sung by : Lata Ji 

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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ 
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ 

वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था 
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ 

दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे 
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ 

ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी 
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ 

यकता : बेजोड़ 
बेगाना-रवी : रूखापन 

                                            " अहमद नदीम क़ासमी "


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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं 
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते 

                                        " ज़फर गोरखपुरी "

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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे 
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे 

इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे 

बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई 
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे 

ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां 
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे 

                                         " सबा अफगानी "

इब्तिदा : आरम्भ 
इंतिहा : अंत 
तसकीन : तसल्ली 


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Jagjit singh : In Search

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आंसू तेरे दामन पर गिरा कर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

                                " qateel shifai "

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जब किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना 

यूँ उजालों से वास्ता रखना 
शमा के पास ही हवा रखना 

घर की तावीर चाहे जैसी हो 
इसमें रोने की कुछ जगह रखना 

मस्जिदें है नमाज़ियों के लिए 
अपने घर में ही कहीं खुदा रखना 

मिलना जुलना जहाँ जरूरी है 
मिलने जुलने का हौसला रखना 

                                                " Nida Fazli "

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कैसे कैसे हादसे सहते रहे 
फिर हम भी जीते रहे हँसते रहे 

उसके आ जाने की उम्मीदें लिए 
रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे 

वक़्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह 
हम चराग़ों की तरह जलते रहे 

कितने चेहरे थे हमारे आस-पास 
तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे 

                                                        " Wazida Tabassum "

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दोस्ती जब किसी से की जाये 
दुश्मनों की राय ली जाये 

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में 
अब कहाँ जा के सांस ली जाये 

बस इसी सोच में डूबा हुआ 
ये नदी कैसे पार की जाये 

मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे 
आज फिर कोई भूल की जाये 

बोतलें खोल के पी बरसों 
आज दिल खोल कर भी पी जाये 

                                                 " Rahat Indori "

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