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Album Passion

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं 
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं 

उन पे तूफां को भी अफ़सोस हुआ करता है 
वो सफ़ीने जो किनारे पे उलट जाते हैं 

हम तो आये थे रहें शाख़ में फूलों की तरह 
तुम अगर खार समझते हो तो हट जाते हैं 

                                  सुदर्शन फ़ाकिर


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ये भी क्या अहसान कम है देखिये ना आपका 
हो रहा है हर तरफ चर्चा हमारा आपका 

चाँद में तो दाग है पर आप में तो वो भी नहीं 
चौदहवी के चाँद से बढ़के चेहरा है आपका 

इश्क़ में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आपके 
अपने चेहरे पे सदाहोता है धोखाआपका 

चाँद सूरज धुप सुबह कहकशां तारे शमा 
हर उजाले ने चुराया है उजाला आपका 

                              वाज़िदा तबस्सुम

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ये क्या जाने में जाना है, जाते हो खफा होकर 
मैं जब जानूं मेरे दिल से चले जाओ जुदा होकर  

क़यामत तक उड़ेगी दिल से उठकर खाक आखों तक 
इसी रस्ते गया है हसरतों का काफ़िला होकर 

तुम्ही अब दर्दे दिल के नाम से घबराये जाते हो 
तुम्ही तो दिल में शायद आये थे दर्द-ऐ-आशियाँ होकर 

यूँ ही हम तुम घडी भर मिला करते थे बेहतर था 
ये दोनों वक़्त जैसे रोज मिलते हैं जुदा होकर 

                                  सीमाब अकबराबादी

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Beyond Time : Jagjit Singh

अपनी आखों के समंदर में उतर जाने दे 
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे 

ऐ मेरे दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना 
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे 

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी 
कोई आंसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे 

ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको 
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे 

                                                          " नज़ीर बाकरी "

माज़ी : भूतकाल 

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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सम्भलते क्यों हैं 
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है 

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं


                                                      " राहत इंदौरी "

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मेरा दिल भी शौक़ से तोड़ो, एक तजुर्बा और सही
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही

रात है ग़म की आज बुझा दो, जलता हुआ हर एक चरागाँ 
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही

दम है निकलता इक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही

खंजर लेकर सोचते क्या हो, क़त्ल--'मुराद' भी कर डालो
दाग़ हैं सौ दामन पे तुम्हारे, एक इज़ाफ़ा और सही


                                                                       " मुराद लखनवी "

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सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं

ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं

चंद मासूम से पत्तों का लहू है ' फ़ाकिर '
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं

                                                                  " सुदर्शन फ़ाकिर "
सिला : पुरस्कार 

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नींद से आँख खुली है, अभी देखा क्या है 
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है 

बांध रखा है किसी सोच ने घर से हमको 
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है 

रेत के, ईंट के, पत्थर के हो या मिट्टी के 
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है 

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ' शाहिद '
वरना हाथों में लकीरों के  अलावा क्या है 

                                                    " शाहिद कबीर "

दानिस्त :  ज्ञान 

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सारे बदन का ख़ून, पसीने में जल गया 
इतना चले कि जिस्म हमारा पिघल गया 

चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन 
दम लेने जो हम बैठ गए दम निकल गया 

अच्छा हुआ जो राह में ठोकर लगी हमें 
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया 

वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका 
दामन की फ़िक्र की तो गिरेबाँ निकल गया 
                                                               
                                                                " महमूद दुर्रानी "

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अपनी आग को ज़िंदा रखना कितना मुश्किल है 
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है 

कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की  
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है 

तुमने मंदिर देखे होंगे ये मेरा आँगन है 
एक दीया भी जलता रखना कितना मुश्किल है 

चुल्लू में हो दर्द का दरिया, ध्यान में उसके होंठ 
यूँ भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है

                                                                   " इशरत आफरीन "

पस-ए-आईना : आईने के सामने

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झूठी-सच्ची आस पे जीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक
मय की जगह खून-ए-दिल पीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे
तूफ़ानों की ज़द पे सफ़ीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

एक महीने के वादे पर साल गुज़ारा फिर भी ना आये
वादे का ये एक महीना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

सामने दुनिया भर के ग़म हैं और इधर इक तन्हा हम हैं
सैकड़ों पत्थर, इक आईना, कब तक आख़िर, आख़िर कब तक

                                                                            " काशिफ़ इंदौरी "


सफ़ीना : कश्ती, नाव 

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Golden Moments : Mohabbat ki Zubaan


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अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें  
हम उनको लिए ज़िंदगानी लूटा दें 

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें  
चलो ज़िन्दगी को मुहब्बत बना दें  

अगर खुद को भूले तो, कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उनकी ख़ुदा को भुला दें 

कभी ग़म की आंधी जिन्हे छू न पाये 
वफ़ाओं के हम वो नशेमन बना दे 

क़यामत के दीवाने, कहते हैं हमसे 
चलो उनके चेहरे से पर्दा हटायें 

सजा दे, सिला दे, बना दे, मिटा दे 
मगर वो कोई फैसला तो सुना दे

नशेमन : घोंसला 

                                    ' सुदर्शन फ़ाकिर '

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बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं 
तुझे ऐ ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं 

तबीयत अपनी घबराती है, जब सुनसान रातों में 
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं 

मेरी नज़रें भी ऐसे काफिरों का जान-ओ-इमां है 
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं 

' फ़िराक़ ' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर 
कभी हम जान लेते हैं, कभी पहचान लेते हैं 

                                                         ' फ़िराक गोरखपुरी '

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दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उनको सुनाई न गई 
बात बिगड़ी कुछ ऐसी, कि बनाई न गई 

सबको हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन 
इक तेरी याद थी ऐसी, कि भुलाई न गई 

इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का काबू 
उसने जो आग लगा दी, वो बुझाई न गई 

                                                 ' जिगर मुरादाबादी '

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जब कभी तेरा नाम लेते हैं 
दिल से हम इन्तेक़ाम लेते हैं 

मेरी बर्बादियों के अफ़साने 
मेरे यारों के नाम लेते हैं 

बस यही एक जुर्म है अपना 
हम मोहब्बत से काम लेते हैं 

हर कदम पर गिरे, मगर सीखा 
कैसे गिरतों को थाम लेते हैं 

हम भटककर जुनून की राहों में 
अक्ल से इन्तेक़ाम लेते हैं 

                                         ' सरदार अंजुम '

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जब से हम तबाह हो गए
तुम जहाँपनाह हो गए

हुस्न पर निखार आ गया
आईने सियाह हो गए

आँधियों की कुछ खता नहीं
हम भी गर्द-ऐ-राह हो गए

दुश्मनों को चिठियां लिखो
दोस्त ख़ैरख्वाह हो गए

सियाह : काले

                               ' बेकल उत्साही '

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Nasha : Jagjit singh

चराग़-ओ-आफ़ताब गुम, बड़ी हसीन रात थी 
शबाब की नक़ाब गुम, बड़ी हसीन रात थी

मुझे पिला रहे थे वो, कि खुद ही शमा बुझ गई 
गिलास गुम शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है 
हुई वही किताब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब ही सिल गए 
सवाल गुम जवाब गुम, बड़ी हसीन रात थी 

चराग़-ओ-आफ़ताब : दीया और सूरज   
                                                                   " सुदर्शन फ़ाकिर "

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जवां है रात साक़िया, शराब ला शराब ला 
जरा सी प्यास तो बुझा, शराब ला शराब ला

तेरे शबाब पर सदा करम रहे बहार का 
तुझे लगे मेरी दुआ, शराब ला शराब ला

यहाँ कोई न जी सका, न जी सकेगा होश में 
मिटा दे नाम होश का, शराब ला शराब ला

तेरा बड़ा ही शुक्रिया, पिलाये जा पिलाये जा 
न जिक्र कर हिसाब का, शराब ला शराब ला

                                                            " मदन पाल "

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ये पीने वाले बहुत ही अजीब होते हैं 
जहाँ से दूर, ये खुद के करीब होते हैं 

किसी को प्यार मिले और किसी को रुसवाई 
मोहब्बतों के सफर भी अजीब होते हैं 

मिला किसी को है क्या सोचिये अमीरी से 
दिलों के शाह तो अक्सर ग़रीब होते हैं 

यहाँ के लोगों की है ख़ासियत ये सबसे बड़ी 
हबीब लगते हैं लेकिन रक़ीब होते हैं 

हबीब : दोस्त 
रक़ीब : प्रेमिका का दूसरा प्रेमी 


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शायद में ज़िदगी की सहर ले के आ गया 
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया 

ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की 
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र ले के आ गया 

नश्तर है मेरे हाथ में, कान्धों पे मयकदा 
लो मैं ईलाजे दर्द-ए-जिगर ले के आ गया 

' फ़ाकिर ' सनम-कदे में ना आता मैं लौटकर 
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया 

सनम-कदे : प्रेमिका का स्थान 

                                                   " सुदर्शन फाकिर "

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ना कह साक़ी बहार आने के दिन हैं 
जिगर के दाग छिल जाने के दिन हैं 

अदा सीखो अदा आने के दिन हैं 
अभी तो दूर शरमाने के दिन हैं 

गिरेबां ढूंढते हैं हाथ मेरे 
चमन में फूल खिल जाने के दिन हैं 


तुम्हे राज़-ए-मोहब्बत क्या बताएं 
तुम्हारे खेलने खाने के दिन हैं

                                                " बेखुद देहलवी "

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क़ासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं 
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में 

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ऐ-ख़राब में 
शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में 

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ऐ-जाम 
साक़ी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में 

ता फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर 
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में 

ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी कभी 
पीता हूँ रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब में 

                                                       " मिर्ज़ा ग़ालिब "
क़ासिद : डाकिया 
हिज्र : जुदाई 
बज़्म : महफ़िल 
अहद : वादा 
रोज़-ऐ-अब्र-ओ-शब-ऐ-माहताब : जिस दिन आसमान में चाँद निकला हो 

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Album : Aawaz ( jagjit & chitra singh )

आवारा है गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई 
जाएं तो कहाँ जाएं, हर मोड़ पर रुसवाई 

ये फूल से चेहरे है, हँसते हुए गुलदस्ते 
कोई भी नहीं अपना, बेगाने हैं सब रस्ते 
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई.......मैं और मेरी तन्हाई

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे 
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे 
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई.......मैं और मेरी तन्हाई

आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है 
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है 
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई.......मैं और मेरी तन्हाई

हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है 
रोकर कभी हंसती है, हंसकर कभी गाती है 
ये प्यार की बाहें है, या मौत की अंगड़ाई.......मैं और मेरी तन्हाई

                                                                      " Ali Sardar Jafri "

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मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म-खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद

                                                                  " Ali Sardar Jafri "

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ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए 
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए 

दिल को अपने सजा न दे यूँही 
इस ज़माने की बेरुखी के लिए 

कल जवानी का हश्र क्या होगा 
सोच ले आज दो घड़ी के लिए 

हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ 
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए 

वक़्त के साथ साथ चलता रहे 
यही बेहतर है आदमी के लिए 

                                                       " Sudarshan Fakir "

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तम्मनाओं के बहलावे में अक्सर आ ही जाते हैं 
कभी हम चोट खाते हैं, कभी हम मुस्कुराते हैं 

हम अक्सर दोस्तों की बेवफाई सह तो लेते हैं 
मगर हम जानते हैं, दिल हमारे टूट जाते हैं 

किसी के साथ जब बीते हुए लम्हों की याद आई 
फटी आँखों में अश्क़ों के सितारे झिलमिलाते हैं 

ये कैसा इश्तियाक़-ए-दीद  है और कैसी मजबूरी 
किसी की बज़्म तक जा जा के हम क्यों लौट आते हैं

                                                                   " Ali Sardar Zafri "

इश्तियाक़-ए-दीद : दीदार की लालसा
बज़्म : महफ़िल

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नशीली रात में जब तुमने ज़ुल्फ़ों को संवारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है 

गुलों को मिल गई रंगत तुम्हारे सुर्ख गालों से 
सितारों ने चमक पाई तबस्सुम के उजालों से 
तुम्हारी मुस्कराहट ने बहारों को निखारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है

लब-ए-रंगीं अरे तौबा, गुलाबी कर दिया मौसम 
तुम्हारी शौख नज़रों ने शराबी कर दिया मौसम 
नशे में चूर है आलम, नशीला हर नज़ारा है 
हमारे जज़्बा-ए-दिल को उमंगों ने उभारा है

                                                              " Asrar M. Suri "

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जब नहीं आये थे तुम तब भी तो तुम आये थे 
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत 
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत 

तुम नहीं आये अभी फिर भी तो तुम आये हो 
रात के सीने में मेहताब के खंजर की तरह 
सुबह के हाथ में खुर्शीद के सागर  की तरह 

तुम नहीं आओगे जब फिर भी तो तुम आओगे 
ज़ुल्फ़ दर ज़ुल्फ़ बिखर जायेगा फिर रात का रंग 
शब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़े मुलाकात का रंग 

आओ आने की करें बात कि तुम आये हो 
अब तुम आये हो तो मैं कौनसी शय नज़र करूँ 
कि मेरे पास सिवा मेहर-ओ-वफ़ा कुछ भी नहीं 
एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                       " Ali Sardar Zafri "
मेहताब : चाँद
खुर्शीद : सूरज
शब-ए-तन्हाई : तन्हाई भरी रात 
मेहर-ओ-वफ़ा : प्यार व् वफ़ा 

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Someone Somewhere : Jagjit and Chitra Singh

मेरी ज़िन्दगी किसी और की, मेरे नाम का कोई और है 
मेरा अक्स है सर-ए-आईना, पस-ए-आईना कोई और है 

मेरी धड़कनों में है चाप सी, ये भी जुदाई है मिलाप सी 
मुझे क्या पता मेरे दिल बता, मेरे साथ क्या कोई और है 

न गये दिनों को खबर मेरी, न शरीक-ए-हाल नज़र तेरी 
तेरे देस में, मेरे भेस में, कोई और था, कोई और है 

वो मेरी तरफ निगराँ रहे, मेरा ध्यान जाने कहाँ रहे 
मेरी आँख में कई सूरतें, मुझे चाहता कोई और है 

                                                    " Mujaffar Warsi "


सर-ए-आईना - आईने के सामने
सर-ए-आईना - आईने के पीछे
चाप - आवाज़
निगराँ - नज़र रखने वाला

sung by : jagjit singh

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मेरे दुःख की कोई दवा न करो 
मुझको मुझसे अभी जुदा न करो 

नाख़ुदा को ख़ुदा कहा तो फिर 
डूब जाओ ख़ुदा ख़ुदा न करो 

ये सिखाया है दोस्ती ने हमें 
दोस्त बनकर कभी वफ़ा न करो 

इश्क़ है इश्क़, ये मजाक नहीं
चंद लम्हों में फैसला न करो 

आशिक़ी हो कि बंदगी ' फ़ाकिर '
बेदिली से तो इब्तिदा न करो 

                                                 " Sudarshan Fakir "


बंदगी - पूजा, प्रार्थना
इब्तिदा - प्रारम्भ

sung by : chitra singh

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फासला तो है मगर, कोई फासला नहीं 
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं 

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां ख़फ़ा सही 
आप ये बताइये, आप तो ख़फ़ा नहीं 

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास है 
कह दो नाख़ुदाओं से, तुम कोई ख़ुदा नहीं 

लीजिये, बुला लिया आपको ख्याल में 
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं 

आइये चराग़-ए-दिल, आज ही जलाएं हम 
कैसी कल हवा चले, कोई जानता नहीं 

                                                     " Shami Karhani "



 नाख़ुदा : नाविक, मल्लाह

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आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा 

मेरा क़ातिल ही मेरा मुन्सिफ़ है 
क्या मेरे हक़ में फैसला देगा 

ज़िन्दगी को करीब से देखो 
इसका चेहरा तुम्हे रुला देगा 

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

इश्क़ का जहर पी लिया ' फाकिर '
अब ख़ुदा भी क्या दवा देगा 

                                            " Sudarshan Fakir "


मुन्सिफ़ : न्यायकर्ता 

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कोई समझेगा क्या राज-ए-गुलशन 
जब तक उलझे ना काँटों में दामन 

यक-ब-यक सामने आ न जाना 
रुक न जाए कहीं दिल की धड़कन 

गुल तो गुल, खार तक चुन लिए हैं 
फिर भी खाली है गुलचीं का दामन 

अज़मत-ए-आशियाँ बढ़ा दी 
बर्क को दोस्त समझूँ कि दुश्मन 

                                                 " Fana Nizami "

अज़मत-ए-आशियाँ : घर की रौनक
बर्क : बिजली

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All Time Hit : Ye daulat bhi le lo

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो 
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी 
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन 
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी 

मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी 
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी 
वो नानी की बातों में परियों का डेरा 
वो चेहरे की झुरियों मे सदियों का फेरा  
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई 
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी 

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना 
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना 
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना झगड़ना 
वो झूलों से गिरना वो गिरके सम्भलना  
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे 
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी 

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना 
घरोंदे बनाना, बनाकर मिटाना 
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी 
वो ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी 
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन 
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी 

                           " सुदर्शन फाकिर "

from movie : Aaj

अगर आपने ये गाना नहीं सुना तो आप बहुत कुछ गँवा रहे हैं। listen it on this link :
http://www.saavn.com/p/song/hindi/Jazbah---Jagjit-Singh/Yeh-Daulat-Bhi-Lelo/GxEFCUdFfWE

Jagjit singh : Face to Face

दैरो हरम में बसने वालों,
मैखानों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे,
तुम अपनी कश्ती को सम्भालो।

मैखाने में आये वाइज़,
इनको भी इंसान बना लो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो,
ताजमहल पे रंग न डालो।

                      " खामोश ग़ाज़ीपुरी "

वाइज़ - पंडित,
दैरो हरम - घरबार
आरिज़-ओ-लब - गाल और होंठ

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शेख़ जी, थोड़ी सी पीकर आइये
मय है क्या शै फिर हमें बतलाइये

आप क्यूँ है सारी दुनिया से जुदा
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइये

क्या है अच्छा, क्या बुरा बन्दा-नवाज़
आप समझें तो हमें समझाइये

जाने दीजे अक्ल की बातें जनाब
दिल की सुनिए और पीते जाइये

उलझनें दुनिया की सुलझा लेंगे हम
आप अपनी ज़ुल्फ़ तो सुलझाइए

                            ' sudarshan fakir '


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तुमने बदले हमसे गिन गिन के लिये  
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिये 

वस्ल का दिन और इतना मुक्तसर 
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये 

वो नहीं सुनते हमारी क्या करें 
मांगते हैं हम दुआ जिनके लिये 

चाहने वालों से गर मतलब नहीं 
आप फिर पैदा हुए किनके लिये 

बागबां कलियाँ वो हलके रंग की 
भेजनी है एक कमसिन के लिये 

                                         " Daag & Ameer Minayee "

वस्ल - मिलन
मुक्तसर - थोड़ा/कम

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सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन न आया.... सच्ची बात कही थी मैंने

ले के जहाँ भी वक़्त गया है
ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है
सच का इक इनाम मिला है.... सच्ची बात कही थी मैंने

सबसे बेहतर कभी न बनना
जग के रहबर कभी न बनना
पीर-पैगम्बर कभी न बनना.... सच्ची बात कही थी मैंने

चुप रहकर ही वक़्त गुजारो
सच कहने में जां मत वारो
कुछ तो सीखो मुझसे यारों.... सच्ची बात कही थी मैंने

                                                                     " Sabir Dutt "

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बेसबब बात बढाने की जरुरत क्या है
हम ख़फ़ा कब थे मनाने की जरुरत क्या है

आप के दम से तो दुनिया का भरम है कायम
आप जब हैं तो ज़माने की जरुरत क्या है

तेरा कूचा, तेरा दर, तेरी गली काफी है
बे-ठिकानों को ठिकाने के जरुरत क्या है

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में
हाथ से हाथ मिलाने की जरुरत क्या है

रंग आँखों के लिए, बू है दिमागों के लिए 
फूल को हाथ लगाने की जरुरत क्या है 

                                     " Shahid kabir "

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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है 
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है 

गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हो या डोर 
लाख करे कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है 

हमने इलाजे ज़ख्मे दिल तो ढूंढ लिया लेकिन 
गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है 

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था 
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है

                                                            " Hastimal Hasti "

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कोई मौसम ऐसा आये 
उसको अपने साथ जो लाये 

लोगों से तारीफ़ सुनी थी 
उससे मिलकर देखा जाये 

आज भी दिल पर बोझ बहुत है 
आज भी शायद नींद न आये 

हाल है दिल का जुगनू जैसा 
जलता जाए बुझता जाये 

बीते लम्हे कुछ ऐसे हैं 
खुशबू जैसे हाथ न आये 

                                      " Azhar Inayati "

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ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या, कुछ भी नहीं 

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो 
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं 

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ 
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं 

या-खुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार 
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं 

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह 
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं 

                                                                      " rajesh reddy "

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cry for cry

मित्रों, जगजीत सिंह को ग़ज़ल सम्राट यूं ही नहीं कहते,  यह बात इस ग़ज़ल से सिद्ध हो जाती है.... उन्होंने जब से ग़ज़ल गायन शुरू किया तब से लेकर इंतेकाल तक अपनी क्वालिटी, अपनी लोक लुभावन धुनों से दुनिया भर के दिलों पर राज किया, ये एक मात्र कलाकार मेरे दिमाग में आते है जिन्होंने अपने पूरे संगीत कॅरिअर में कभी भी विफलता नहीं देखी…उसके पीछे एक बड़ी वजह उनकी ग़ज़लों का चयन भी था, उन्होंने आम आदमी को समझ में आने वाली रचनाएं चुनी, न कि क्लिष्ट और भारी भरकम शब्दों से युक्त रचना…उनका एक भी एल्बम ये कह कर नकारा नहीं जा सकता कि यार मज़ा नहीं आया…खुद गुलज़ार इस बात को मानते है कि  " जगजीत के उत्पाद में कोई भिन्नता नहीं है, ये निरंतरता वाला कलाकार है ( a composer with consistency ) "……

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
जख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ  है ?

जब हक़ीक़त है कि हर जहन में तू रहता है 
फिर ज़माने में कहीं मस्ज़िद कहीं मंदिर क्यूँ  है ?

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है ?

ज़िन्दगी जीने के काबिल ही नहीं अब फाकिर 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है ?  



                                            " sudarshan fakir "


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कभी आंसू कभी खुशी बेची
हम ग़रीबों ने बेकसी बेची 

चंद सांसें खरीदने के लिए 
रोज थोड़ी सी ज़िन्दगी बेची 

जब रुलाने लगे मुझे साये 
मैंने उकता के रौशनी बेची

एक हम थे कि बिक गए खुद ही 
वरना दुनिया ने दोस्ती बेची

                                   " Abu Talib "

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अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ 

इतनी महंगाई कि बाजार से कुछ लाता हूँ 
अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ 

अपनी नींदों का लहू पोंछने की कोशिश में,
जागते जागते थक जाता हूँ, सो जाता हूँ 

कोई चादर समझ के खींच न ले फिर से ' खलील '
मैं कफ़न ओढ़ के फूटपाथ पे सो जाता हूँ। 

                                              "  Khalil dhantejvi "

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माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी

जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें न हो अप्सरा की
हो न परियां जहाँ आसमानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख को जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रौशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमे……

                                        " नन्द लाल पाठक "

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