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A Sound Affair

ये तो नहीं कि ग़म नहीं
हाँ मेरी आँख नम नहीं

तुम भी तो तुम नहीं हो आज
हम भी तो आज हम नहीं

अब ना ख़ुशी की है ख़ुशी
ग़म का भी अब तो ग़म नहीं

मौत अगर चि-मौत  है
मौत से ज़ीस्त कम नहीं

 Sung by : Chitra Singh,  Lyrics : Firaq Gorakhpuri

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आँख से आँख मिला, बात बनाता क्यूँ है 
तू अगर मुझसे खफ़ा है तो छुपाता क्यूँ है 

गैर लगता है ना अपनों की तरह मिलता है 
तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है 

वक़्त के साथ ख्यालात बदल जाते हैं 
ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है 

एक मुद्दत से जहाँ काफ़िले गुजरे ही नहीं 
ऐसी राहों पे चरागों को जलाता क्यूँ है 

Sung by : Chitra singh,  Lyrics : Saeed Rahi

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ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे 
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे 

तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैंने 
आ किसी दिन मेरे अहसास को पैकर कर दे 

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन 
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे 

Sung by : Jagjit Singh,   Lyrics : Shahid Meer

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कभी तो खुल के बरस अब्रे मेहरबाँ की तरह 
मेरा वज़ूद है जलते हुए मकां की तरह 

मैं एक ख़्वाब ही सही आपकी अमानत हूँ 
मुझे सम्भालके रखियेगा जिस्म-ओ-जाँ की तरह 

कभी तो सोच के वो शख्स किस कदर था बुलंद 
जो बिछ गया तेरे क़दमों में आसमां की तरह 

बुला रहा है मुझे फिर किसी बदन का बसंत 
गुजर न जाए ये रुत भी कहीं ख़िज़ाँ की तरह 

Sung By : Chitra Singh,   Lyrics : Prem Warbartoni

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मंज़िल न दे चराग़ न दे हौसला तो दे 
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे 

मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब 
लेकिन खामोश क्यूँ है तू कोई फैसला तो दे 

बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब 
मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे 

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख़्तियार 
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे 

Sung By : Chitra & Jagjit Singh.    Lyrics : Rana Sahri

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कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह 
लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह 

मेरे मेहबूब मेरे प्यार को इलज़ाम न दे 
हिज्र में ईद मनाई है मुहर्रम की तरह 

मैंने खुशबू की तरह तुझको किया है महसूस 
दिल ने छेड़ा है तेरी याद को शबनम की तरह 

कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है 
दिल पे नश्तर भी लगाते हो मरहम की तरह 

Sung By : Jagjit Singh.     Lyrics : Rana Sahri

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तेरी ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे 
प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे 
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे 

जिन को दुनिया की निगाहों से छुपाये रक्खा 
जिन को इक उम्र कलेजे से लगाये रक्खा 
दीन जिन को, जिन्हें ईमान बनाये रक्खा 

जिन का हर लफ़्ज़ मुझे याद था पानी की तरह 
याद थे मुझ को जो पैग़ामे -ज़ुबानी की तरह 
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह 

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिक्खे 
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिक्खे 
कभी दिन में तो कभी रात को उठ कर लिक्खे 

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूं 
आग बहते हुये पानी में लगा आया हूं 

                                                  ' राजेन्द्र नाथ ‘रहबर’ '

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