कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे
कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुमसे
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे
कभी दुनिया मुकम्मल बनके आएगी निगाहों में
कभी मेरी कमी दुनिया की हर इक शय में पाओगे
कहीं पर भी रहे हम तुम मुहब्बत फिर मुहब्बत है
तुम्हे हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगे
" नज़ीर बनारसी "
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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गये
मेरी आँखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गये
कब की पत्थर हो चुकी थी मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गये
जाने क्या अहसास साजे-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गये
अब कोई उम्मीद है ' शाहिद ' न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गये
" Shahid Kabir "
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तुम ये कैसे जुदा हो गये
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे
कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुमसे
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे
कभी दुनिया मुकम्मल बनके आएगी निगाहों में
कभी मेरी कमी दुनिया की हर इक शय में पाओगे
कहीं पर भी रहे हम तुम मुहब्बत फिर मुहब्बत है
तुम्हे हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगे
" नज़ीर बनारसी "
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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गये
मेरी आँखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गये
कब की पत्थर हो चुकी थी मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गये
जाने क्या अहसास साजे-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गये
अब कोई उम्मीद है ' शाहिद ' न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गये
" Shahid Kabir "
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हर तरफ हर जगह हो गये
अपना चेहरा न बदला गया
आईने से ख़फ़ा हो गये
जाने वाले गए भी कहाँ
चाँद सूरज घटा हो गये
बेवफ़ा तो न वो थे न हम
यूँ हुआ बस जुदा हो गये
आदमी बनना आसां न था
शेख जी आरसा हो गये
" Nida Fazli "
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वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता
किस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता
ऐसे भी है दुनिया में जिन्हे ग़म नहीं होता
इक ग़म है हमारा जो कभी कम नहीं होता
क्या सुरमा भरी आँखों से आंसू नहीं गिरते
क्या मेहंदी लगी हाथों से मातम नहीं होता
कुछ और भी होती है बिगड़ने की अदाएं
बनने में संवरने में ये आलम नहीं होता
" Raiz Khairabadi "
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हमारा हौसला बढ़ाने के लिए कृपया पोस्ट के नीचे अपनी - Average, Good या Excellent की रेटिंग अवश्य दें और हो सके तो कमेंट भी लिखें । धन्यवाद....
" Nida Fazli "
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वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता
किस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता
ऐसे भी है दुनिया में जिन्हे ग़म नहीं होता
इक ग़म है हमारा जो कभी कम नहीं होता
क्या सुरमा भरी आँखों से आंसू नहीं गिरते
क्या मेहंदी लगी हाथों से मातम नहीं होता
कुछ और भी होती है बिगड़ने की अदाएं
बनने में संवरने में ये आलम नहीं होता
" Raiz Khairabadi "
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