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Ghazal of Bashir Badr

दिल की दहलीज़ पे यादों के दीये रखे हैं 
आज तक हमने ये दरवाज़े खुले रखे हैं 

इस कहानी के वो किरदार कहाँ से लाऊं 
वही दरिया है, वही कच्चे घड़े रखे हैं 

हम पे जो गुजरी, न बताया न बताएँगे कभी 
कितने ख़त अब भी तेरे नाम लिख रखे हैं 

आप के पास खरीद-दारी की कुव्वत है अगर 
आज सब लोग दुकानों में सजे रखे हैं 

An evening with Jagjit & Chitra singh

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं
ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं


गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं


जिसको तूने न आज़माया हो
वो कहीं पर भी कामयाब नहीं


जाने किस किस की मौत आयी है
आज रुख़ पे कोई नक़ाब नहीं


वो करम उँगलियों पे गिनते हैं
ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं


जो क़यामत न ढा सके 'राही'
वो किसी काम का शबाब नहीं                                               
                                             " सईद राही "

गाहे-गाहे : कभी कभी 

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हरसू दिखाई देते हैं वो जल्वागर मुझे
क्या क्या फ़रेब देती है मेरी नज़र मुझे

डाला है बेख़ुदी ने अजब राह पर मुझे
आँखें हैं और कुछ नहीं आता नज़र मुझे

दिल लेके मुझसे देते हो दाग़-ए-जिगर 
मुझे ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे

आया ना रास नाला-ए-दिल का असर मुझे
अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी ख़बर मुझे

                                                    " जिगर मुरादाबादी "


दाग़-ए-जिगर : दिल की आग 
नाला-ए-दिल : दिल की पुकार 

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जब कभी तेरा नाम लेते हैं
दिल से हम इन्तक़ाम लेते हैं

मेरी बर्बादियों के अफ़साने
मेरे यारों के नाम लेते हैं


बस यही एक जुर्म है अपना
हम मुहब्बत से काम लेते हैं


हर क़दम पर गिरे मगर सीखा
कैसे गिरतों को थाम लेते हैं


हम भटक कर जुनूँ की राहों में
अक़्ल से इन्तक़ाम लेते हैं


                                             " सरदार अन्जुम "


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कोई पास आया सवेरे सवेरे
मुझे आज़माया सवेरे सवेरे 

मेरी दास्ताँ को ज़रा सा बदल कर

मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे

जो कहता था कल शब संभलना संभलना
वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे

जली थी शमा रातभर जिसकी ख़ातिर

उसी को जलाया सवेरे सवेरे

कटी रात सारी मेरी मैकदे में

ख़ुदा याद आया सवेरे सवेरे

                                                     " सईद राही "
शब : रात 

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माना के मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़कर नहीं हूँ मैं
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूँ मैं

इंसान हूँ धड़कते हुये दिल पे हाथ रख

यूँ डूबकर न देख समुंदर नहीं हूँ मैं

चेहरे पे मल रहा हूँ सियाही नसीब की

आईना हाथ में है सिकंदर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब तेरी ज़मीन में लिक्खी तो है ग़ज़ल
तेरे कद-ए-सुख़न के बराबर नहीं हूँ मैं

                                                      " मुज़फ़्फ़र वारसी "
मुश्त-ए-ख़ाक : मुट्ठी भर धूल 
कद-ए-सुख़न : लेखन कला 

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मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के पन्ने उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा पन्ना मुड़ा हुआ निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले


                                                       " वसीम बरेलवी "


किताब-ए-माज़ी : बीते समय की दास्ताँ 
औराक़ : पृष्ठ 
सफ़हा : पन्ना 

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ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो

अब कोई आरज़ू नहीं बाक़ी

जुस्तजू मेरी आख़री तुम हो

मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ

आसमानों की चांदनी तुम हो


दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो
                                             " बशीर बद्र "

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Jagjit Singh : Album Hope

ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे 

ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे 
अब इतनी ज्यादा सफाई न दे 

हंसो आज इतना कि इस शोर में 
सदा सिसकियों की सुनाई न दे 

अभी तो बदन में लहू है बहुत 
कलम छीन ले रोशनाई न दे 

ख़ुदा ऐसे अहसास का नाम है 
रहे सामने और दिखाई न दे 
                                              " Dr. Bashir Badr "

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ना शिवाले ना कलीसा ना हरम झूठे हैं 
बस यही सच है कि तुम झूठे हो हम झूठे हैं 

हमने देखा ही नहीं बोलते उनको अब तक 
कौन कहता है कि पत्थर के सनम झूठे हैं 

उनसे मिलिए तो ख़ुशी होती है उनसे मिलकर 
शहर के दूसरे लोगों से जो कम झूठे हैं 

कुछ तो है बात जो तहरीरों में तासीर नहीं 
झूठे फ़नकार नहीं है तो कलम झूठे हैं 
                                                      " Ayaz Jhansvi "

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क्या खबर थी इस तरह से वो जुदा हो जायेगा 
ख़्वाब में भी उसका मिलना ख़्वाब सा हो जायेगा 

ज़िन्दगी की क़ैद-ए-ग़म से क्या निकालोगे उसे 
मौत जब आ जाएगी तो खुद रिहा हो जायेगा 

दोस्त बनकर उसको चाहा ये कभी सोचा न था 
दोस्ती ही दोस्ती में वो ख़ुदा हो जायेगा 

उसका जलवा होगा क्या जिसका कि पर्दा नूर है 
जो भी उसको देख लेगा वो फ़िदा हो जायेगा 
                                                                 " Rustam Sehgal Wafa "

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अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला 
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला 

उसको रुख़सत तो किया था मुझे मालूम न था 

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला 

इक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया 

कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला 

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा 

जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला 
                                                             " Nida Fazli "

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तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे
जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो
चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे
                                                                  " Nida Fazli "   

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देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा
ख़ुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा

उस का जो ख़त मिला तो मुझे सोचना पड़ा
अपना सा वो लगा तो मुझे सोचना पड़ा

मुझ को था ये गुमाँ के मुझी में है इक अना
देखी तेरी अना तो मुझे सोचना पड़ा

दुनिया समझ रही थी के नाराज़ मुझसे है
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा

सर को छुपाऊँ अपने कि पैरों को ढाँप लूँ
छोटी सी थी रिदा तो मुझे सोचना पड़ा

इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा ‘फ़राग़’
जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा

                                          ' फ़राग़ रोहवी '

अना = आत्मसम्मान
रिदा = घूँघट

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धूप है क्या और साया क्या है अब मालूम हुआ
ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ

हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख
अपने साथ ये क़िस्सा क्या है अब मालूम हुआ

हम बरसों के बाद भी उसको अब तक भूल न पाए
दिल से उसका रिश्ता क्या है अब मालूम हुआ

सहरा सहरा प्यासे भटके सारी उम्र जले
बादल का इक टुकड़ा क्या है अब मालूम हुआ
सहरा = रेगिस्तान

                                                      ' ज़फ़र गोरखपुरी '

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ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं

गती आँखों से भी देखो दुनिया को
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना
हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं

                                              ' शहरयार '

हिज्र = बिछोहजुदाई
ताब = शक्ति, सामर्थ्य
दश्त = जंगल

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कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, के बिछड़ने का कभी डर न हो

                                                ' बशीर बद्र '

सिफ़त  = गुण
अता = प्रदान

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Album : Saher

ये जो ज़िन्दगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है 
कहीं इक हसीन सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा हिजाब है

कहीं छाँव है कहीं धुप है, कहीं और ही कोई रूप है 
कई चेहरे इसमें छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है 

कहीं खो दिया कहीं पा लिया, कहीं रो लिया कहीं गा लिया 
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबाँ बेहिसाब है 

कहीं आंसुओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ 
कहीं बरकतों की है बारिशें, कहीं तिश्नगी बेहिसाब है 

                                                     " राजेश रेड्डी "

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मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो                                    
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

एक टहनी पे चाँद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

उजले उजले फूल खिले थे
मैं ये समझा तुम हँसते हो

मुझको शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

तुम तनहा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

                    " डॉ बशीर बद्र "

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तेरे आने की जब खबर महके
तेरी खुशबू से सारा घर महके

शाम महके तेरे तसव्वुर से
शाम के बाद फिर सहर महके

रात भर सोचता रहा तुझको
ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर महके

याद आए तो दिल मुनव्वर हो
दीद हो जाए तो नज़र महके

वो घड़ी दो घड़ी जहाँ बैठे
वो ज़मीं महके वो शजर महके

तेरे आने की जब खबर महके
तेरी खुश्बू से सारा घर महके


Lyrics : Dr. Nawaz Deobandi

दीद : दिखना 
शज़र : माहौल 

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चराग़े इश्क़ जलाने की रात आयी है 
किसी को अपना बनाने की रात आयी है 

वो आज आये हैं महफ़िल में चांदनी लेकर 
कि रौशनी में नहाने की रात आयी है 

फ़लक का चाँद भी शरमा के मुंह छुपायेगा 
नक़ाब रुख़ से उठाने की रात आयी है 

निगाहे साक़ी से पैहम छलक रही है शराब 
पियो कि पीने पिलाने की रात आयी है 

                              " faiz ratlami "

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Jagjit Singh : Aaeena

घर से निकले थे हौसला करके 
लौट आये ख़ुदा ख़ुदा करके 

दर्दे दिल पाओगे वफ़ा करके 
हमने देखा है तजुर्बा करके 

ज़िन्दगी तो कभी नहीं आई 
मौत अाई जरा जरा करके 

लोग सुनते रहे दिमाग की बात 
हम चल दिल को रहनुमा करके 

किसने पाया सुकून दुनिया में 
ज़िंदगानी का सामना करके 

                          " rajesh reddy "

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तेरा चेहरा है आईने जैसा 
क्यूँ न देखूं है देखने जैसा 

तुम कहो तो मैं पूछ लूँ तुमसे 
है सवाल एक पूछने जैसा 

दोस्त मिल जायेंगे कई लेकिन 
ना मिलेगा कोई मेरे जैसा 

तुम अचानक मिले थे जब पहले 
पल नहीं है भूलने जैसा 

                                       " Payyam Sayyidi "

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परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता 
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता 

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना 
जहाँ दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता 

तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है 
हमारे शहर में भी अब कोई हम सा नहीं रहता 

मोहब्बत एक खुशबू है हमेशा साथ चलती है 
कोई इंसान तन्हाई में तनहा नहीं रहता 

                                                               " Dr. Bashir Badr "

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उसकी बातें तो फूल हों जैसे 
बाकी बातें बबूल हों जैसे 

छोटी छोटी सी उसकी वो आँखें 
दो चमेली के फूल हों जैसे 

उसका हंसकर नज़र झुका लेना 
सारी शर्तें क़ुबूल हों जैसे 

कितनी दिलकश है उसकी ख़ामोशी 
सारी बातें फ़िज़ूल हों जैसे 

                                            " Ibrahim Ashq "

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फिर नज़र से पिला दीजिये 
होश मेरे उड़ा दीजिये 

छोड़िये दुश्मनी की रबिश 
अब ज़रा मुस्कुरा दीजिये 

बात अफ़साना बन जाएगी 
इस कदर मत हवा दीजिये 

आइये खुल के मिलिये गले 
सब तकल्लुफ हटा दीजिये 

कब से मुश्ताक़-ए-दीदार हूँ 
अब तो जलवा दिखा दीजिये 

                                                " Jaam Nasimi "

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अपना अपना रास्ता है कुछ नहीं 
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नहीं 

जुस्तजू है इक मुसलसल जुस्तज़ू 
क्या कहीं कुछ खो गया है कुछ नहीं 

मोहर मेरे नाम की हर शय में है 
मेरे घर में मेरा क्या है कुछ नहीं

कहने वाले अपनी अपनी कह गए 
मुझसे पूछो क्या सुना है कुछ नहीं 

                                                  " Dr. Bashir Badr "

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मुस्कुरा कर मिला करो हमसे
कुछ कहा और सुना करो हमसे

बात करने से बात बढ़ती है
रोज़ बातें किया करो हमसे

दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको
दोस्त बनकर रहा करो हमसे

देख लेते है सात पर्दों में
यूँ ना पर्दा किया करो हमसे


                                        " इब्राहिम अश्क "


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jagjit singh : Album Desires

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी जीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी जरुरत होती है

ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा
यहाँ रोज निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज क़यामत होती है

वो पुर्सिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है

करना ही पड़ेगा जब्त-ए-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू
फरियाद-ओ-फुगां से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है

जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है 
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है 

                                                " saba afghani "

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काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी 
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी 

आने का सबब याद न जाने की ही खबर है 
वो दिल में रहा और इसे तोड़ गया भी 

हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है 
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी 

गुमनाम कभी अपनों से जो ग़म हुए हासिल 
कुछ याद रहे उनमे तो कुछ भूल गया भी 

                                               " Gumnam Surinder Malik "

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उल्फत का जब किसी ने लिया नाम, रो पड़े 
अपनी वफ़ा का सोचके हम अंजाम, रो पड़े 

हर शाम ये सवाल मुहब्बत से क्या मिला 
हर शाम ये जवाब कि, हर शाम रो पड़े 

राहे वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी 
दो कदम ही चले थे कि हर कदम रो पड़े 


रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला 

अपने ही सर लिया कोई इलज़ाम, रो पड़े 

                                                    " Bashir Badr "

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जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं ऊँगलियाँ,
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं ऊँगलियाँ

दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस एक पल से महकती हैं ऊँगलियाँ

जिस दिन से दूर हो गए, उस दिन से ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं ऊँगलियाँ

पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फ़नकार की जहान में कटती हैं उँगलियाँ 


                                                  " Madan Pal "

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अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में
गुज़रेगा और एक बरस इंतज़ार में

ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में

है टूटे दिल में तेरी मुहब्बत, तेरा ख़याल
कुछ रंग है बहार के उजड़ी बहार में

आँसू नहीं हैं आँख में लेकिन तेरे बग़ैर
तूफ़ान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में

                                               ' पयाम सईदी '


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बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी

देख लेना वो न ख़ाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी

ग़र यही तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ है अन्दलीब
तू भी गुलशन से निकाली जाएगी

आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी

क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी ख़ाली जाएगी


तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ = दुहाई का ढँग, अन्दलीब = बुलबुल
बेख़याली = ख्याल में गुम 

तेग़-ए-नाज़ = घमण्ड में चूर 

                                                           ' जलील मानिकपुरी '


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ये कैसी मुहब्बत कहाँ के फ़साने
ये पीने पिलाने के सब है बहाने

वो दामन हो उनका कि सुनसान सहरा
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने

ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा
लगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही कदम लड़खडाने

चलो तुम भी 'गुमनाम' अब मैकदे में
तुम्हे दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने

                                                ' गुमनाम सुरिंदर मलिक '


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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये 

चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये

सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये

घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये

                                                       ' मदन पाल '


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