प्रिय मनुष्य,
सर्वप्रथम तुम्हे मेरा प्यार और आशीष…अगर इस दुनिया में सबसे पुराना कोई रिश्ता है तो वो है तुम्हारा और मेरा…एक पिता, अभिभावक, पालनकर्ता के रूप में तुम्हारा विकास देखकर में अभिभूत हुँ…मैंने जिस रूप में दुनिया बनाई, उसमे तुमने बहुत संशोधन भी किये…मैं यहाँ तुम्हे अच्छे या बुरे के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा…इसके लिए मैंने कुछ विदूषक भी छोड़ रखे है…
मैं खुश हूँ कि तुम मुझे याद करते हो ये अलग बात है कि सुख में कम और दुःख में ज्यादा…तुम मंदिर की चौखटें भी नापते हो, और मेरी दरगाह चूमते भी हो, सुबह सुबह शायद मुझे हाथ भी जोड़ते हो, या फिर कोई चालीसा करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हो…हाँ फैक्ट्री या दुकान में तुम मुझे सुबह के समय बड़ी शिद्दत से याद करते हो ( तुम्हारी रोजी रोटी का जो सवाल है ), शाम को मंगल करते समय भी वहाँ की चौकीदारी के लिए मुझसे ही गुहार लगाते हो...नौकरी वाले भी अपने प्रमोशन, ट्रान्सफर इत्यादि के लिए मुझे ही याद करते है…तुम सभी मेरी प्रसादी भी बोलते हो, परन्तु किसी काम को पूरा करने की शर्त रखते हुए…तुम्हे लगता है कि तुम्हारी सवामणि घूस का काम करेगी…
तुम मुझे सच्चे भाव से याद करोगे और में हाजिर हो जाउंगा, ऐसी धारणा तो शायद तुम भूल चुके हो…
बुरा मत मानना, मेरे पास एक प्रस्ताव है...क्यों न तुम मुझे अपने व्यापार में साझेदार बना लेते ? ऐसा करके तुम्हे मुझसे डरने की जरुरत नहीं रहेगी, तुम चिंता मुक्त रह सकते हो, सोचो जो शक्ति सारी दुनिया चला रही है, वही तुम्हारी भागीदार बन जाये तो तुम्हे आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है…लेकिन मेरा कुछ प्रतिशत निश्चित कर दो…मेरा भी ध्यान तुम पर ज्यादा रहेगा…
अब तुम कहोगे कि ये हिस्सा मुझ तक पहुँचे कैसे ? घर में कीर्तन, जगराता, मंदिरों में प्रसादी, दरगाह पर चादर, यज्ञ, पाठ पूजा, जप या कुछ और ? नहीं मुझे ये कुछ नहीं चाहिए…मुँह खुला रह गया ? बंद कर ले…तू सिर्फ इतना कर कि मेरे हिस्से के पैसे से किसी भूखे को खाना खिला, किसी गरीब के बच्चे को पढ़ा, किसी की कन्या की शादी में योगदान कर, गाय को चारा डाल ,मूक पक्षियों को दाना दे, किसी गरीब का अस्पताल में इलाज करा दे,रक्त दान कर… इन कामों से मेरा हिस्सा मेरे पास पंहुचा हुआ समझना....
अंत में तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बताता हु कि तुम किसी के काम आना चाहते हो परन्तु जरुरत के समय पर सामने वाले पर भरोसा नहीं कर पाते, यही संदेह तुम्हे एक नेक काम से रोक देता है…अतः अगर तुम्हे किसी की मदद करनी है तो कर डालो, इस काम में ज्यादा गुणा भाग उचित नहीं है....वैसे भी नेक काम गणित से नहीं, दिल से होते है…तो निकाल अपना कैलकुलेटर और मेरा प्रतिशत क्या रखेगा, इस पर विचार शुरू कर…यही सोच रहा है न कि ईश्वर ने कब से मांगना शुरू कर दिया, तो समझ ले कि ये तेरी संगति का असर है…
तुम्हारा,
ईश्वर,खुदा,वाहेगुरू,god