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Jagjit & Lata ji : Album Sajda


माँ सरस्वती का जीता जागता रूप और ग़ज़ल सम्राट अर्थात लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जब एक साथ एक एल्बम में आये तो वो एल्बम विशिष्ट तो हो ही जाता है। मुझे याद है जब hmv ने बड़े ही royal पैक में इन दोनों दिग्गजों का एल्बम जारी किया था जिसकी कीमत भी उस वक़्त के हिसाब से ज्यादा थी। फिर भी ग़ज़ल प्रेमियों ने इस एल्बम को हाथों हाथ लिया। मेरी उम्र उस वक़्त कम थी महज 18 साल लगभग, किन्तु मैंने अपनी माँ से इतने पैसे की व्यवस्था करवाई, बदले में एक साल तक मुझे 1 भी रुपया नहीं मिला। लेकिन ग़ज़ल के शौक के आगे सभी जरूरतें बौनी थी। उस वक़्त के हिसाब से इसमें आधुनिक echo sound भी था जो कि लोगों के लिए विशेष था। विभिन्न शायरों की रचनाओं से युक्त ये एल्बम कालजयी की श्रेणी में आ गया। लता जी की आवाज़ एक बारगी जगजीत जी को भी फीका कर देती है। अपने गायकी और आवाज़ के चरम पर हैं लता जी इस एल्बम में। फिलहाल दोनों की गाई हुई ग़ज़ल आपके सामने रखी है। और हाँ अगर आप ग़ज़ल प्रेमी हैं तो ये एल्बम आपके पास होना ही चाहिए।


ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है - मेरा भी 
ये नज़राना तेरा भी है - मेरा भी 

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना 
राग पुराना तेरा भी है - मेरा भी 

तू मुझको और मैं तुझको समझाऊँ क्या 
दिल दीवाना तेरा भी है - मेरा भी 

शहर में गलियों गलियों जिसका चर्चा है 
वो अफसाना तेरा भी है - मेरा भी 

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है - मेरा भी 

                                             " Shahid Kabir " 

sung by both : lata ji and jagjit ji

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मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों 
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों 

वो बेख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों 

मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
मैं अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों 

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था 
मैं उसकी घर का पता किससे पूछता यारों 

                                                   " Waseem Barelvi "

sung by jagjit ji

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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग 
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग 

क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी 
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग 

तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया 
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग 

कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर 
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग 

                                             " दानिश अलीगढ़ी "

sung by jagjit ji

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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह 
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह 

मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे 
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह 

सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके 
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह 

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे 
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह 

                                         " qateel shifai "

sung by Lata ji

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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं 

मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ 
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं 

ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब 
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं 

वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना 
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं 

                                                                    " Sahir Bhopali "

sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी 

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ 
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी 

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते 
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी 

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ 
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी 

ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आखरी सांस तक बेकरार आदमी 

                                                 " Nida fazli " 

मज़ार : कब्र 

sung by  : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

                                                         " Nida Fazli "

sung by : jagjit ji

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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है 
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है 

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता 
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है

नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले 
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो 
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन 
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है

                                                 " अख्तर शीरानी "

sung by : lata ji and jagjit ji

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मेरी तस्वीर में, रंग और किसी का तो नहीं 
घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं 

ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ 
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं 

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं 
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं 

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा 
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं 

                                             " मुजफ्फर वारसी "

sung by : lata ji

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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा 
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा 

इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने 
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा 

तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे 
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा 

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला 
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा 

                                                    " अहमद फ़राज़ "

मानूस : लगाव 
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन 
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी 
अता : तोहफा 



sung by : Lata Ji 

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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ 
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ 

वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था 
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ 

दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे 
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ 

ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी 
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ 

यकता : बेजोड़ 
बेगाना-रवी : रूखापन 

                                            " अहमद नदीम क़ासमी "


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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं 
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते 

                                        " ज़फर गोरखपुरी "

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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे 
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे 

इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे 

बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई 
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे 

ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां 
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे 

                                         " सबा अफगानी "

इब्तिदा : आरम्भ 
इंतिहा : अंत 
तसकीन : तसल्ली 


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jagjit singh : Album Desires

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी जीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी जरुरत होती है

ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा
यहाँ रोज निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज क़यामत होती है

वो पुर्सिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है

करना ही पड़ेगा जब्त-ए-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू
फरियाद-ओ-फुगां से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है

जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है 
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है 

                                                " saba afghani "

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काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी 
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी 

आने का सबब याद न जाने की ही खबर है 
वो दिल में रहा और इसे तोड़ गया भी 

हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है 
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी 

गुमनाम कभी अपनों से जो ग़म हुए हासिल 
कुछ याद रहे उनमे तो कुछ भूल गया भी 

                                               " Gumnam Surinder Malik "

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उल्फत का जब किसी ने लिया नाम, रो पड़े 
अपनी वफ़ा का सोचके हम अंजाम, रो पड़े 

हर शाम ये सवाल मुहब्बत से क्या मिला 
हर शाम ये जवाब कि, हर शाम रो पड़े 

राहे वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी 
दो कदम ही चले थे कि हर कदम रो पड़े 


रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला 

अपने ही सर लिया कोई इलज़ाम, रो पड़े 

                                                    " Bashir Badr "

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जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं ऊँगलियाँ,
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं ऊँगलियाँ

दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस एक पल से महकती हैं ऊँगलियाँ

जिस दिन से दूर हो गए, उस दिन से ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं ऊँगलियाँ

पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फ़नकार की जहान में कटती हैं उँगलियाँ 


                                                  " Madan Pal "

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अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में
गुज़रेगा और एक बरस इंतज़ार में

ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में

है टूटे दिल में तेरी मुहब्बत, तेरा ख़याल
कुछ रंग है बहार के उजड़ी बहार में

आँसू नहीं हैं आँख में लेकिन तेरे बग़ैर
तूफ़ान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में

                                               ' पयाम सईदी '


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बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी

देख लेना वो न ख़ाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी

ग़र यही तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ है अन्दलीब
तू भी गुलशन से निकाली जाएगी

आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी

क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी ख़ाली जाएगी


तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ = दुहाई का ढँग, अन्दलीब = बुलबुल
बेख़याली = ख्याल में गुम 

तेग़-ए-नाज़ = घमण्ड में चूर 

                                                           ' जलील मानिकपुरी '


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ये कैसी मुहब्बत कहाँ के फ़साने
ये पीने पिलाने के सब है बहाने

वो दामन हो उनका कि सुनसान सहरा
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने

ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा
लगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही कदम लड़खडाने

चलो तुम भी 'गुमनाम' अब मैकदे में
तुम्हे दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने

                                                ' गुमनाम सुरिंदर मलिक '


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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये 

चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये

सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये

घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये

                                                       ' मदन पाल '


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