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Jagjit Singh : Album Hope

ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे 

ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे 
अब इतनी ज्यादा सफाई न दे 

हंसो आज इतना कि इस शोर में 
सदा सिसकियों की सुनाई न दे 

अभी तो बदन में लहू है बहुत 
कलम छीन ले रोशनाई न दे 

ख़ुदा ऐसे अहसास का नाम है 
रहे सामने और दिखाई न दे 
                                              " Dr. Bashir Badr "

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ना शिवाले ना कलीसा ना हरम झूठे हैं 
बस यही सच है कि तुम झूठे हो हम झूठे हैं 

हमने देखा ही नहीं बोलते उनको अब तक 
कौन कहता है कि पत्थर के सनम झूठे हैं 

उनसे मिलिए तो ख़ुशी होती है उनसे मिलकर 
शहर के दूसरे लोगों से जो कम झूठे हैं 

कुछ तो है बात जो तहरीरों में तासीर नहीं 
झूठे फ़नकार नहीं है तो कलम झूठे हैं 
                                                      " Ayaz Jhansvi "

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क्या खबर थी इस तरह से वो जुदा हो जायेगा 
ख़्वाब में भी उसका मिलना ख़्वाब सा हो जायेगा 

ज़िन्दगी की क़ैद-ए-ग़म से क्या निकालोगे उसे 
मौत जब आ जाएगी तो खुद रिहा हो जायेगा 

दोस्त बनकर उसको चाहा ये कभी सोचा न था 
दोस्ती ही दोस्ती में वो ख़ुदा हो जायेगा 

उसका जलवा होगा क्या जिसका कि पर्दा नूर है 
जो भी उसको देख लेगा वो फ़िदा हो जायेगा 
                                                                 " Rustam Sehgal Wafa "

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अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला 
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला 

उसको रुख़सत तो किया था मुझे मालूम न था 

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला 

इक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया 

कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला 

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा 

जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला 
                                                             " Nida Fazli "

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तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे
जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो
चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे
                                                                  " Nida Fazli "   

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देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा
ख़ुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा

उस का जो ख़त मिला तो मुझे सोचना पड़ा
अपना सा वो लगा तो मुझे सोचना पड़ा

मुझ को था ये गुमाँ के मुझी में है इक अना
देखी तेरी अना तो मुझे सोचना पड़ा

दुनिया समझ रही थी के नाराज़ मुझसे है
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा

सर को छुपाऊँ अपने कि पैरों को ढाँप लूँ
छोटी सी थी रिदा तो मुझे सोचना पड़ा

इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा ‘फ़राग़’
जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा

                                          ' फ़राग़ रोहवी '

अना = आत्मसम्मान
रिदा = घूँघट

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धूप है क्या और साया क्या है अब मालूम हुआ
ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ

हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख
अपने साथ ये क़िस्सा क्या है अब मालूम हुआ

हम बरसों के बाद भी उसको अब तक भूल न पाए
दिल से उसका रिश्ता क्या है अब मालूम हुआ

सहरा सहरा प्यासे भटके सारी उम्र जले
बादल का इक टुकड़ा क्या है अब मालूम हुआ
सहरा = रेगिस्तान

                                                      ' ज़फ़र गोरखपुरी '

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ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं

गती आँखों से भी देखो दुनिया को
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना
हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं

                                              ' शहरयार '

हिज्र = बिछोहजुदाई
ताब = शक्ति, सामर्थ्य
दश्त = जंगल

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कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, के बिछड़ने का कभी डर न हो

                                                ' बशीर बद्र '

सिफ़त  = गुण
अता = प्रदान

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