गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी जीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी जरुरत होती है
ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा
यहाँ रोज निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज क़यामत होती है
वो पुर्सिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है
करना ही पड़ेगा जब्त-ए-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू
फरियाद-ओ-फुगां से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है
जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है
" saba afghani "
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काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी
आने का सबब याद न जाने की ही खबर है
वो दिल में रहा और इसे तोड़ गया भी
हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी
गुमनाम कभी अपनों से जो ग़म हुए हासिल
कुछ याद रहे उनमे तो कुछ भूल गया भी
" Gumnam Surinder Malik "
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उल्फत का जब किसी ने लिया नाम, रो पड़े
अपनी वफ़ा का सोचके हम अंजाम, रो पड़े
हर शाम ये सवाल मुहब्बत से क्या मिला
हर शाम ये जवाब कि, हर शाम रो पड़े
राहे वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी
दो कदम ही चले थे कि हर कदम रो पड़े
" Bashir Badr "
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जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी जरुरत होती है
ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा
यहाँ रोज निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज क़यामत होती है
वो पुर्सिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है
करना ही पड़ेगा जब्त-ए-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू
फरियाद-ओ-फुगां से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है
जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है
" saba afghani "
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काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी
आने का सबब याद न जाने की ही खबर है
वो दिल में रहा और इसे तोड़ गया भी
हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी
गुमनाम कभी अपनों से जो ग़म हुए हासिल
कुछ याद रहे उनमे तो कुछ भूल गया भी
" Gumnam Surinder Malik "
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उल्फत का जब किसी ने लिया नाम, रो पड़े
अपनी वफ़ा का सोचके हम अंजाम, रो पड़े
हर शाम ये सवाल मुहब्बत से क्या मिला
हर शाम ये जवाब कि, हर शाम रो पड़े
राहे वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी
दो कदम ही चले थे कि हर कदम रो पड़े
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला
अपने ही सर लिया कोई इलज़ाम, रो पड़े
" Bashir Badr "
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जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं ऊँगलियाँ,
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं ऊँगलियाँ
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं ऊँगलियाँ
दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस एक पल से महकती हैं ऊँगलियाँ
दिन रात उस एक पल से महकती हैं ऊँगलियाँ
जिस दिन से दूर हो गए, उस दिन से ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं ऊँगलियाँ
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं ऊँगलियाँ
पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फ़नकार की जहान में कटती हैं उँगलियाँ
" Madan Pal "
फ़नकार की जहान में कटती हैं उँगलियाँ
" Madan Pal "
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अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में
गुज़रेगा और एक बरस इंतज़ार में
ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में
है टूटे दिल में तेरी मुहब्बत, तेरा ख़याल
कुछ रंग है बहार के उजड़ी बहार में
आँसू नहीं हैं आँख में लेकिन तेरे बग़ैर
तूफ़ान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में
' पयाम सईदी '
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बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी
देख लेना वो न ख़ाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी
ग़र यही तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ है अन्दलीब
तू भी गुलशन से निकाली जाएगी
आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी
क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी ख़ाली जाएगी
तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ = दुहाई का ढँग, अन्दलीब = बुलबुल
बेख़याली = ख्याल में गुम
तेग़-ए-नाज़ = घमण्ड में चूर
' जलील मानिकपुरी '
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ये कैसी मुहब्बत कहाँ के फ़साने
ये पीने पिलाने के सब है बहाने
वो दामन हो उनका कि सुनसान सहरा
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने
ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा
लगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही कदम लड़खडाने
चलो तुम भी 'गुमनाम' अब मैकदे में
तुम्हे दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने
' गुमनाम सुरिंदर मलिक '
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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये
चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये
सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये
घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये
' मदन पाल '
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अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में
गुज़रेगा और एक बरस इंतज़ार में
ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में
है टूटे दिल में तेरी मुहब्बत, तेरा ख़याल
कुछ रंग है बहार के उजड़ी बहार में
आँसू नहीं हैं आँख में लेकिन तेरे बग़ैर
तूफ़ान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में
' पयाम सईदी '
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बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी
देख लेना वो न ख़ाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी
ग़र यही तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ है अन्दलीब
तू भी गुलशन से निकाली जाएगी
आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी
क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी ख़ाली जाएगी
तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ = दुहाई का ढँग, अन्दलीब = बुलबुल
बेख़याली = ख्याल में गुम
तेग़-ए-नाज़ = घमण्ड में चूर
' जलील मानिकपुरी '
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ये कैसी मुहब्बत कहाँ के फ़साने
ये पीने पिलाने के सब है बहाने
वो दामन हो उनका कि सुनसान सहरा
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने
ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा
लगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही कदम लड़खडाने
चलो तुम भी 'गुमनाम' अब मैकदे में
तुम्हे दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने
' गुमनाम सुरिंदर मलिक '
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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये
चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये
सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये
घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये
' मदन पाल '
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