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Awesome Poetry : Nida Fazli

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती

हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने को यहाँ वैसे भी फुरसत नहीं मिलती

Wo Ladki : Nida Fazli

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे

Tanha ( तन्हा ) : Gulzar

कहाँ छुपा दी है रात तूने 
कहाँ छुपाये है तूने अपने गुलाबी हाथों के ठन्डे फाये 
कहाँ है तेरे लबों के चेहरे 
कहाँ है तू आज - तू कहाँ है ? 

ये मेरे बिस्तर पे कैसा सन्नाटा सो रहा है ?


Definition of Love by Gulzar

प्यार एक जिस्म के साज पे बजती गूँज नहीं है,
ना मन्दिर की आरती है,ना पूजा है,
प्यार नफ़ा है,ना लालच है,
ना कोई लाभ,ना कोई हानि,
प्यार ऐलान है,ना अहसान है,ना कोई जंग की जीत है ये,
ना ये हुनर है,ना ईनाम है,ना ये रिवाज,ना रीत है ये,

ये रहम नहीं ,ये दान नहीं,ये बीज नहीं जो बीज सके,
ख़ुशबू है मगर ये ख़ुशबू की पहचान नहीं ,

दर्द,दिलासे,शक,विश्वास,जुनून और
होश-ओ-हवास के अहसास की कोख से पैदा हुआ इक रिश्ता है,
या सम्बन्ध है दो जनों का,दो रूहों का,पहचानों का,
पैदा होता है,बढ़ता है ये बूढ़ा होता नहीं              " Gulzar "



वो जो शायर था : Gulzar

वो जो शायर था, चुप-सा रहता था 
बहकी-बहकी-सी बातें करता था 
आँखें कानों पे रख के सुनता था 
गूंगी ख़ामोशियों की आवाज़ें 
जमा करता था चाँद के साये 
गीली-गीली-सी नूर की बूँदें 
ओक में भरके खड़खड़ाता था 
रूखे-रूखे से रात के पत्ते 
वक़्त के इस घनेरे जंगल में 
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था 

हाँ, वही, वो अजीब-सा शायर 
रात को उठके कोहनियों बल 
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था 

चाँद से गिर कर मर गया है वो 
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है




कतरा कतरा जहान : मधुसूदन चौबे

कतरे कतरे से मिलकर समंदर महान बना है 
अक्षर अक्षर से मिलकर वेदों का ज्ञान बना है 

किसी का भी वजूद छोटा समझना है नासमझी 
भाप के कण कण से विशाल आसमान बना है        

खुद को तूफान के हिमायती समझने वालों सुनों
छोटी छोटी सांसों से तुम्हारा जीवनदान बना है

समंदर भूल गया कि एक कतरा था वो कभी
वो खारा हुआ क्योंकि उसमें अभिमान बना है

बरसों पोथियाँ चाटकर कचरा रहा वो ‘मधु’
केवल ढाई आखर पढ़कर कबीर विद्वान बना है 






Gulzar : Aah !

ठंडी सांसें न पालो सीने में 
लम्बी साँसों में सांप रहते हैं 
ऐसी ही एक सांस ने इक बार 
डस लिया था हसीं क्लियोपेत्रा को

मेरे होठों पे अपने लब रखकर 
फूँक दो सारी साँसों को ' बीबा '

मुझको आदत है ज़हर पीने की 


Kundan Srivastav : Lafz

फेसबुक पर सही मायनों में अपने जैसे लोगों से अब मिलना हुआ है। अभी तक तो बस friend list ही बड़ी थी लेकिन अब उन लोगों से ऑनलाइन मुलाकातें हो रही है जो मेरे जैसे ही शौक पालते हैं बल्कि यूं कहूँ कि माक़ूल तौर पर वो मुझसे बड़े शौक़ीन है ग़ज़ल के, कविता के और साहित्य के। ग़ज़ल, कविता की बस्तियां अगर महान लेखकों से आबाद होती है तो इन बस्तियों को जाने वाले रास्ते प्रशंसकों से ही रोशन है वर्ना इस रास्ते पर कितने लोग मिलेंगे इसकी उम्मीद जरा मंद ही होती है। 

हाल ही में एक ग्रुप में पटना के युवा ग़ज़ल प्रेमी कुंदन श्रीवास्तव से मिलना फेसबुक पर ही हुआ। जनाब जगजीत सिंह के बहुत बड़े फैन हैं और गुलज़ार साब के भी, और अपनी कलम की धार भी कभी कभी दिखा देते हैं। जगजीत ग्रुप में सर्वाधिक सक्रिय सदस्य हैं ये।  गुलज़ार साब पे लिखी इनकी कविता मुझे बड़ी ही अच्छी लगी तो इनसे इजाजत लेकर अपने ब्लॉग पर इसे डाल रहा हूँ। जिस तरह से अनेकानेक आहुतियों से ही यज्ञ ज्वलंत होते हैं वैसे ही कुंदन जी जैसे प्रशंसकों से ही जगजीत और गुलज़ार जैसे नाम की चमक बढ़ती है। 

अक़्सर
किताबोँ से 

लफ़्ज़ोँ को
चुगता
और
अपने ज़ेहन का
पेट भरता है
वो शख़्स !
वही लफ़्ज़
जब
फलसफ़ी नग़्मोँ . नज़्मोँ , गज़लोँ की
शक़्ल मेँ
सफ़ेद सफ़होँ पर
उतरते हैँ
तो
वो चुपचाप
ख़ामोशी से
सब कुछ देखता
और
फिर से
नये लफ़्ज़ोँ की
तलाश मेँ
किताबोँ की
दुनिया के
सफ़र पर
निकल पड़ता है . . . !! 



डॉ.मधुसूदन चौबे : कर्म का उच्चारण हो

हाल ही में अतिलोकप्रिय सोशल साईट facebook पर मैंने एक ग्रुप join किया है ' मधु कवि की महफ़िल ' । इस ग्रुप के संचालक हैं मध्य-प्रदेश के कवि डॉ मधुसूदन चौबे। इस ग्रुप में आप अपनी कविता, ग़ज़ल, शेर कुछ भी डाल सकते हैं, अर्थात सब के लिए एक खुला मंच है। हाल ही में fb पर मधुजी ने एक के बाद एक पोस्ट दागी, जैसे कि सीमा पर मुस्तैद जवान दनादन गोलियां दागता है। फर्क ये है कि जवान दुश्मन के सामने गोलियां दागता है और चौबे जी समाज की बुराइयों और समाज में विलुप्त होती नैतिकता पर अपनी कविता दागते हैं। वो हमारे अंतर्मन को झकझोरते भी हैं। उनके शब्द जैसे हमें भीतर से जगाने के लिए आतुर हैं। सब जानते हैं कि मैं एक अच्छा श्रोता हूँ और पाठक भी। ये बात अलग है कि अपनी बात कहने के लिए शब्दों की सीमा होती है। अतः उनकी वजनदार रचनाओं पर अधिक बात न करते हुए एक कविता ही आपके सम्मुख रखता हूँ, जो मुझे बड़ी अच्छी लगी।

कोयले का हीरे में रूपांतरण हो जाता है 
मेहनतकश दुनिया में उदाहरण हो जाता है 

लंकाओं को ध्वस्त होते देर नहीं लगती गर 
हनुमानों की शक्ति का जागरण हो जाता है 

इंसा को इंसा होने का अहसास हो जाये तो 
रोम रोम से कर्म का उच्चारण हो जाता है

नमकहलाली का चस्का लगने का है असर 
श्रमपथ का अनुसरण आमरण हो जाता है 

अकड़ता है, झगड़ता है सबसे मगर ' मधु '
वतन के उन्नायकों का चारण हो जाता है