फेसबुक पर सही मायनों में अपने जैसे लोगों से अब मिलना हुआ है। अभी तक तो बस friend list ही बड़ी थी लेकिन अब उन लोगों से ऑनलाइन मुलाकातें हो रही है जो मेरे जैसे ही शौक पालते हैं बल्कि यूं कहूँ कि माक़ूल तौर पर वो मुझसे बड़े शौक़ीन है ग़ज़ल के, कविता के और साहित्य के। ग़ज़ल, कविता की बस्तियां अगर महान लेखकों से आबाद होती है तो इन बस्तियों को जाने वाले रास्ते प्रशंसकों से ही रोशन है वर्ना इस रास्ते पर कितने लोग मिलेंगे इसकी उम्मीद जरा मंद ही होती है।
हाल ही में एक ग्रुप में पटना के युवा ग़ज़ल प्रेमी कुंदन श्रीवास्तव से मिलना फेसबुक पर ही हुआ। जनाब जगजीत सिंह के बहुत बड़े फैन हैं और गुलज़ार साब के भी, और अपनी कलम की धार भी कभी कभी दिखा देते हैं। जगजीत ग्रुप में सर्वाधिक सक्रिय सदस्य हैं ये। गुलज़ार साब पे लिखी इनकी कविता मुझे बड़ी ही अच्छी लगी तो इनसे इजाजत लेकर अपने ब्लॉग पर इसे डाल रहा हूँ। जिस तरह से अनेकानेक आहुतियों से ही यज्ञ ज्वलंत होते हैं वैसे ही कुंदन जी जैसे प्रशंसकों से ही जगजीत और गुलज़ार जैसे नाम की चमक बढ़ती है।
किताबोँ से
लफ़्ज़ोँ को
चुगता
और
अपने ज़ेहन का
पेट भरता है
वो शख़्स !
वही लफ़्ज़
जब
फलसफ़ी नग़्मोँ . नज़्मोँ , गज़लोँ की
शक़्ल मेँ
सफ़ेद सफ़होँ पर
उतरते हैँ
तो
वो चुपचाप
ख़ामोशी से
सब कुछ देखता
और
फिर से
नये लफ़्ज़ोँ की
तलाश मेँ
किताबोँ की
दुनिया के
सफ़र पर
निकल पड़ता है . . . !!

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