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गिरहें

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ 
फिर से बाँध के 
और सिरा कोई जोड़ के उसमें 
आगे बुनने लगते हो 
तेरे इस ताने में लेकिन 
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की 
देख नहीं सकता है कोई 

मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता 
लेकिन उसकी सारी गिरहें 
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे 

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !  


Gulzar's first film song

मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे 
छुप जाउंगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे 

इक लाज रोके पैया, इक मोह खींचे बैंया
जाऊं किधर न जाऊं, हमका कोई बताई दे 

बदरी हटा के चंदा, चुपके से झांके चंदा 
तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये जी जलाई के 

कुछ खो दिया है पाइ के, कुछ पा लिया गवाईं के 
कहाँ ले चला है मनवा, मोहे बावरी बनाइ के

स्वर : आशा भोंसले 
संगीत : S.D. Burman   


जनाब ये ही वो गाना है जिसने हिंदी सिनेमा को एक नायाब गीतकार, शायर और असाधारण रूप से संवेदनशील निर्देशक दिया। बंदिनी फ़िल्म में बिमल रॉय ने सम्पूरन सिंह कालरा को मोटर गेराज से निकाल कर उसकी प्रतिभा के अनुरूप गीत लिखने को दिया और वहीं से गुलज़ार के रूप में उनका सफ़र शुरू हुआ। उसके बाद की कहानी सभी जानते हैं।  इसीलिए गुलज़ार बिमल रॉय को अपने पिता तुल्य मानते थे।  बाद में गुलज़ार ने बिमल दा का portrait भी बनाया।  जो कभी आपके सामने रखूँगा। 

तमन्ना : gulzar

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो
गिरने की आहट भी नहीं होती
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं

गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
" तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्ज़ा है, किश्तें तुझे चुकानी है "
जबर्दस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कहकर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं
जब होगा, हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च करने की तमन्ना है

धूप-छाँव

कैसे हम दर्द से दूर भागते रहते हैं। किसी तकलीफ या ग़म के बारे में सोचकर सिरहन सी दौड़ जाती है हमारे शरीर में। दुआ के लिए हाथ ऊपर उठ जाते हैं कि ऐ मालिक, रहम करना। लेकिन दर्द से क्या दूर रहा जा सकता है ? क्या दर्द से बचा जा सकता है ? कतई नहीं। हम सब जानते हैं कि सबको अपने हिस्से का सुख दुःख झेलना ही होगा। सही भी है क्यूँकि जब तक हम दर्द की आग में तप नहीं जाते, तब तक वैचारिक रूप से परिपक्व भी नहीं हो सकते। चोट खाया इंसान ही दूसरों के दर्द को समझ सकता है। बल्कि ये भी कह सकते हैं कि दर्द इंसान को मुकम्मल बनता है।
नीचे की नज़्म में गुलज़ार शांति का रास्ता दर्द से होकर गुजरता बताते हैं। बिना रात के सुबह का क्या महत्व ? बिना आंसू के हंसी का क्या महत्व ? और अंततः बिना धूप के छाँव का क्या महत्व ?


मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचाकर 
कि रूह को एक ख़ूबसूरत-सा जिस्म दे दूँ 
न कोई सिलवट, न दाग़ कोई 
न धुप झुलसे, न चोट खाये 
न ज़ख्म छूए, न दर्द पहूँचे 
बस एक कोरी कुंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं  

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की, दर्द की धूप से जो गुज़रा 
तो रूह को छाँव मिल गयी है 

अजीब है दर्द और तस्कीं* का साझा रिश्ता 
मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी 

तस्कीं : शांति

दंगे : Gulzar

कितना आसान होता है दंगाइयों के लिए तोड़-फोड़ करना और इंसानों का क़त्लेआम करना। एक ज़िन्दगी जाते जाते कितनी ज़िंदगियों को प्रभावित कर जाती है, कितने बच्चे यतीम हुए, कितनी औरतें विधवा हुई, कितनी माताओं की कोख़ सूनी हुई, कितने घर बर्बाद हुए ? ये बातें दंगाइयों के दिल में थोड़े ही आती है। उन्हें खुद मालूम नहीं होता कि जुनून में आकर वो क्या कर गए।  
गुलज़ार कहते हैं कि पूरी ज़िन्दगी खर्च करके एक इंसान अपनी शख्सियत और पहचान बनाता है, एक छोटे से नाम से पूरे इंसान का खाका सामने आ जाता है।  एक एक पल की मेहनत से अपने वज़ूद का सेहरा सर पर सजाता है। दंगाई इस अस्तित्व, नाम, वज़ूद को एक पल में काट देते हैं, बिना कुछ हासिल किये हुए। 




शहर में आदमी कोई भी नहीं क़त्ल हुआ 
नाम थे लोगों के, जो क़त्ल हुए 
सर नहीं काटा किसी ने भी कहीं पर कोई 
लोगों ने टोपियां काटीं थी, कि जिनमें सर थे 

और ये बहता हुआ सुर्ख़ लहू है जो सड़क पर 
सिर्फ़ आवाज़ें-ज़ुबा करते हुए ख़ून गिरा था 


पेड़ by gulzar

       आज का दिन, गहरे कोहरे से शुरुआत…सड़कें लिपटी कोहरे से, जैसे किसी कवि के दिल की आधी अधूरी और धुंधली सी रचना आकर शहर की सड़कों पर ही फैल गई हो…9 बजे तक भी सड़कों पर सन्नाटा…पक्षियों को दाना देने जाते हुए धुंध मुझे इस तरह छू रही है जैसे मेरा आलिंगन चाह रही हो और अपना प्यार पानी की अदृश्य बूंदो के रूप में मुझ पर छोड़े जा रही है, और कह रही है कि आजा,कुछ पल प्रकृति के साथ भी गुजार और आल्हादित हो…अपने फ्लैट में तू कहाँ मुझे महसूस करेगा…
       कितना अलग सा आनंद होता है जब हम कभी प्राकृतिक नजारों के साक्षी बनते हैं, किसी शाख़ को फूलों से लदे देखना, बारिश में पूरे नहाये हुए हरे पेड़ों को निहारना…याद करना कि कभी हमने सावन के झूले इन दरख्तों के कन्धों पे रस्सी डाल के खाये हैं.…वो उपक्रम करके बेर तोड़ना और खाना…वो कैरी के लिए पत्थर उछालना, निशाना सही तो मौज और गलत तो फिर समझ ही गए होंगे…चाहे अब कंक्रीट के जंगल चारों और फैल गए हैं, हर इंसान के साथ किसी पेड़, पौधे की कहानी जुडी ही है, तब या अब…घर के आँगन में खड़ा पड़-दादाजी की उम्र का पेड़ या गली, मोहल्ले के यार बाज पेड़, जिनकी शाखें हमें अपनी बाँहों में खिलाती थी…

       इसी प्रकृति या पेड़ की बात जब गुलज़ार अपने अंदाज़ में करते हैं तो उनका अंदाजेबयां उसे एक पूरा किरदार बना देता हैं, उसके साथ बीते हुए लम्हें बल्कि पूरा एक दौर हमारी आँखों के आगे जीवंत हो उठता है…


मोड़ पे देखा है वह बूढा-सा इक पेड़ कभी ?                      

मेरा वाकिफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूँ

जब मैं छोटा था तब एक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कन्धों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख़ से जा पाँव लगा
धाड़ से फ़ेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाख़ें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने

और जब हामला* थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियां फेंकी थी इसी ने

वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था में, जब मुन्ने से कहती बीबा
हाँ, उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है

अब भी जल जाता हूँ, जब मोड़ गुज़रते में कभी
खांसकर कहता है, "क्यों, सर के सभी बाल गए ?"

आज सुबह से काट रहे हैं वह कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको

                                                          " गुलज़ार "        
*हामला - गर्भवती


अंत में जाते जाते हुए यही कहूंगा के क्या हम अपनी पीढ़ियों के लिए यही कंक्रीट ही छोड़ के जायेंगे या प्रकृति की कुछ निशानी भी ?

                                                                                    " श्री लाल राठी "

Triveni by Gulzar

       आज में बात करूँगा शायरी, ग़ज़ल, नज़्म, कविता से भी अलग एक प्रारूप " त्रिवेणी " की, जिसे प्रयोग में लाना शुरू किया गुलज़ार साब ने…जी हाँ ये उन्ही द्वारा ईज़ाद की गई है…किसी भी २ मिसरे के शेर में सारे जहाँ की भावना लाकर समेटना तो शायरी की विशेषता है ही, लेकिन अगर इसी २ मिसरों में तीसरी लाइन जुड़े या यूँ कहे कि रोशनदान की तरह खुले और वो उन दो पंक्तियों की भावना बदल कर कुछ नए मायने सामने रख दे, या फिर उसके भाव में इजाफ़ा कर दे, और उसमें नई रौशनी भर दे, यही गुलज़ार की त्रिवेणी है…इस तीसरी पंक्ति ने उन दो पंक्तियों के शेर को तो विस्तार दिया ही है, साथ ही साहित्य में एक नयी शुरुआत भी करी है…
       वैसे भी गुलज़ार अपने अलहदा अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं और इन त्रिवेणियों की ताज़गी और गहराई इनके पाठकों को अलग जायके का अहसास देती है…गुलज़ार की कलम की खासियत है कि वो नए मुहावरे गढ़ती है, नए रूपक सामने लाती है वर्ना मेहबूब की तरह नज़र आने वाला चाँद इन्हे भूख में रोटी नज़र आता है तो कभी भिखारी का कटोरा नज़र आता है, एक बानगी देखिये :

1 . माँ ने इक चाँद सी दुल्हन की दुआएं दी थी
     आज की रात जो फूटपाथ से देखा मैंने

     रात भर रोटी नज़र आया है चाँद मुझे ।

2 . क्या पता कब, कहाँ से मारेगी
     बस, कि में ज़िन्दगी से डरता हूँ

     मौत का क्या है, एक बार मारेगी ।

3 . इतने लोगों में, कह दो आँखों को                                                              
     इतना ऊंचा न, ऐसे बोला करे

     लोग मेरा नाम जान जाते हैं ।

4 . आओ, सारे पहन ले आईने
     सारे देखेंगे अपना ही चेहरा

     सबको सारे हसीं लगेंगे यहाँ ।

5 . सांवले साहिल पे गुलमोहर का पेड़
     जैसे लैला की माँग में सिन्दूर

     धर्म बदला गया बेचारी का ।

6 . कौन खायेगा, किसका हिस्सा है
     दाने-दाने पे नाम लिखा है,

     सेठ सुदचंद, सेठ मूलचंद आक़ा ।

7 . सब पे आती है सबकी बारी से
     मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं

     ज़िन्दगी सब पे क्यों नहीं आती ।

7 . उठके जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
     देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख़ फ़िज़ा में

     अलविदा कहने को, या पास बुलाने के लिए ।

आज के लिए इतना ही, तब तक जय जय....फिर आउंगा किसी नए विषय या नयी ग़ज़ल के साथ....

                                                                                " श्री लाल राठी "


सरहद पार by गुलज़ार

आज़ादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बारे में काफी कुछ सुना है, पढ़ा है…उस समय के हालात इतने त्रासदीपूर्ण थे कि जिन्होंने ये मंज़र देखा वो सदा के लिए उनकी आँखों में बुरे सपने की तरह समा गया…बल्कि उनके अस्तित्व का हिस्सा हो गया,  वो चाहे हिंदुस्तान में रहे या पाकिस्तान में किन्तु उस मंज़र की परछाइयाँ हमेशा दोनों देशों के विस्थापितों के साथ रही…परिवारों के टुकड़े हो गए..... कुछ भारत में रहे, कुछ पाक में.....सरहदें अलग हो गई, सरकारें वीज़ा मांगने लगी.… लेकिन दिलों को, आँखों को कहाँ वीज़ा की जरुरत पड़ती है, वो तो कभी भी कही भी अपनों को यादों में, सपनों में मिल सकते है…वतन जुदा हुए लेकिन लोगों के दिल नही…
इन्हीं भावनाओं को संवेदनशीलता की पराकाष्ठा तक पहुंचते हुए गुलज़ार अपने शब्दों में बयां करते है तो यह दोनों देशों के लोगो को अपने दिल की आवाज़ मालूम पड़ती है…अपने व दूसरों के दर्द को इस भावना की तीव्रता के साथ कह पाना और आसान शब्दों में कह पाना, ऐसे कद्दावर शायर के वश की बात हो सकती है.…


सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला, देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं
आँखों से मानूस से सारे
चहरे सारे सुने सुनाये
पाँव धोये, हाथ धुलाए
आँगन में आसन लगवाए……
और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए
पोटली में मेहमान मेरे
पिछले सालों की फसलों का गुड़ लाये थे

आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगाकर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था
और होठों पे मीठे गुड़ का जायका अभी तक चिपक रहा था

ख्वाब था शायद !
ख्वाब ही होगा !!
सरहद पर कल रात, सुना है, चली थी गोली
सरहद पर कल रात, सुना है
कुछ ख्वाबों का ख़ून हुआ था


Subah subah ek khawab ki dastak par darwaza khola, dekha
sarhad ke us paar se kuch mehmaan aaye hain
aankhon se maanoos se saare
chehre saare sune sunaye
paanv dhoye, haath dhulaye
aangan me aasan lagvaye......

Aur tannor pe makki ke kuch mote mote rot pakaye
potli me mehmaan mere
pichle saalon ki phaslon ka gud laye the 

Aankh khuli to dekha ghar me koi nahi tha
haath lagakar dekha to tannoor abhi tak bujha nahi tha
aur hothon par meethe gud ka jayka abhi tak chipak raha tha

Khwab tha shayad !
khawab hi hoga !!
sarhad par kal raat, suna hai, chali thi goli
sarhad par kal raat, suna hai
kuch khwabon ka khoon hua tha






                                                                                   









Gulzar : Honeymoon

कल तुझे सैर करवाएंगे समन्दर से लगी गोल सड़क की
रात को हार सा लगता है समन्दर के गले में !

घोड़ा गाडी पे बहुत दूर तलक सैर करेंगे 
धोडों की टापों से लगता है कि कुछ देर के राजा है हम !
गेटवे ऑफ इंडिया पे देखेंगे हम ताज महल होटल 
जोड़े आते हैं विलायत से हनीमून मनाने,
तो ठहरते हैं यही पर !

आज की रात तो फुटपाथ पे ईंट रख कर,
गर्म कर लेते हैं बिरयानी जो ईरानी के होटल से मिली है 
और इस रात मना लेंगे "हनीमून" यहीं जीने के नीचे !

हाय, कौन न मर मिटे इस सादगी पर… इतने सरल शब्दों में भी आम इंसान की भावना को जिस ख़ूबसूरती से गुलज़ार साब ने अपने अंदाज़ में पिरोया है वोही इन्हे अपने समकालीन शायरों में एक अलहदा स्थान दिलाती है...बीड़ी, चिमटा, चटाई, तम्बाकू, केसर, सुपारी, कत्था, चिलम इत्यादि सैकड़ों शब्द जो रोजमर्रा की ज़िन्दगी में काम आते है, उनको अपनी रचनाओ में शामिल कर गुलज़ार ने इन्हे भी vip रुतबा तो दिला ही दिया है....ये आम शब्द भी किसी नज़्म या गीत में शामिल होकर श्रोताओ को ख़ास अहसास दिलाते है…वैसे साहित्य जितना मिटटी से जुड़ा हो उतना ही अवाम के दिल में उतरता है.…
सच कहें तो कैसे भूल सकते है गुलज़ार के अहसान कोई कि इन्होने ही ग़ालिब को हिंदुस्तान के घर घर में पहुँचाया, आज भी लोग इंटरनेट के जरिये ग़ालिब को इनके सीरियल के द्वारा ही जान पाते है....मीरा जैसे चरित्र को किताबों से निकाल कर फ़िल्म के जरिये सब के सामने रखा, हाल ही में टैगोर की बंगाली रचनाओ का हिंदी अनुवाद किया....मुंशी प्रेम चंद की रचना पर सीरियल बनाया " किरदार "....बच्चों के लिए कहानी, गीत इनके सर्वप्रिय है ही…इनकी फ़िल्में देखने पर भी महसूस होता है कि संवाद व कहानी ही स्क्रीन की सतह पर लहरा रही होती है एक गहराई लिए हुए.…किरदार तो सिर्फ उस सतह पर तैरने भर का काम करते है....संजीव कुमार महान अभिनेता साबित हुए अधिकतर गुलज़ार की फिल्मों से ही....भारत का एकमात्र गीतकार जिसने हमे ऑस्कर अवार्ड दिलाया…वैसे सारी बातें आज ही कर ली तो आगे के लिए कुछ नहीं बचेगा....लेकिन मिर्ज़ा ग़ालिब के गुलज़ार रचित सीरियल का विडियो आपके लिए छोड़े जाते हैं…आपकी ज़िन्दगी का श्रेष्ठ अनुभव होगा ये मेरा दावा है…तब तक जय जय.…

                                                                                                                       " श्री लाल राठी "




अख़बार by gulzar

सारा दिन मैं खून से लथपथ रहता हु
सारे दिन में सूख सूख के काला पड़ जाता है खून
पपड़ी  सी जम जाती है
खुरच खुरच के नाखूनों से
चमड़ी छिलने लगती है
नाक में खून की कच्ची बू
और कपड़ों पर कुछ काले काले चकते से रह जाते है

रोज़ सुबह अख़बार मेरे घर
खून से लथपथ आता है


saara din main khoon se lathpath rahta hoon
saare din me sookh sookh ke kala pad jata hai khoon
papdi see jam jaati hai
khurch khurch ke nakhuno se 
chamdi chilne lagti hai
naak me khoon ki kacchi boo
aur kapdon par kuch kaale kaale chakte se rah jate hain

roz subah akhbar mere ghar
khoon se lathpath aata hai