आज में बात करूँगा शायरी, ग़ज़ल, नज़्म, कविता से भी अलग एक प्रारूप " त्रिवेणी " की, जिसे प्रयोग में लाना शुरू किया गुलज़ार साब ने…जी हाँ ये उन्ही द्वारा ईज़ाद की गई है…किसी भी २ मिसरे के शेर में सारे जहाँ की भावना लाकर समेटना तो शायरी की विशेषता है ही, लेकिन अगर इसी २ मिसरों में तीसरी लाइन जुड़े या यूँ कहे कि रोशनदान की तरह खुले और वो उन दो पंक्तियों की भावना बदल कर कुछ नए मायने सामने रख दे, या फिर उसके भाव में इजाफ़ा कर दे, और उसमें नई रौशनी भर दे, यही गुलज़ार की त्रिवेणी है…इस तीसरी पंक्ति ने उन दो पंक्तियों के शेर को तो विस्तार दिया ही है, साथ ही साहित्य में एक नयी शुरुआत भी करी है…
वैसे भी गुलज़ार अपने अलहदा अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं और इन त्रिवेणियों की ताज़गी और गहराई इनके पाठकों को अलग जायके का अहसास देती है…गुलज़ार की कलम की खासियत है कि वो नए मुहावरे गढ़ती है, नए रूपक सामने लाती है वर्ना मेहबूब की तरह नज़र आने वाला चाँद इन्हे भूख में रोटी नज़र आता है तो कभी भिखारी का कटोरा नज़र आता है, एक बानगी देखिये :
1 . माँ ने इक चाँद सी दुल्हन की दुआएं दी थी
आज की रात जो फूटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है चाँद मुझे ।
2 . क्या पता कब, कहाँ से मारेगी
बस, कि में ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है, एक बार मारेगी ।
3 . इतने लोगों में, कह दो आँखों को
इतना ऊंचा न, ऐसे बोला करे
लोग मेरा नाम जान जाते हैं ।
4 . आओ, सारे पहन ले आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हसीं लगेंगे यहाँ ।
5 . सांवले साहिल पे गुलमोहर का पेड़
जैसे लैला की माँग में सिन्दूर
धर्म बदला गया बेचारी का ।
6 . कौन खायेगा, किसका हिस्सा है
दाने-दाने पे नाम लिखा है,
सेठ सुदचंद, सेठ मूलचंद आक़ा ।
7 . सब पे आती है सबकी बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं
ज़िन्दगी सब पे क्यों नहीं आती ।
7 . उठके जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख़ फ़िज़ा में
अलविदा कहने को, या पास बुलाने के लिए ।
आज के लिए इतना ही, तब तक जय जय....फिर आउंगा किसी नए विषय या नयी ग़ज़ल के साथ....
" श्री लाल राठी "
वैसे भी गुलज़ार अपने अलहदा अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं और इन त्रिवेणियों की ताज़गी और गहराई इनके पाठकों को अलग जायके का अहसास देती है…गुलज़ार की कलम की खासियत है कि वो नए मुहावरे गढ़ती है, नए रूपक सामने लाती है वर्ना मेहबूब की तरह नज़र आने वाला चाँद इन्हे भूख में रोटी नज़र आता है तो कभी भिखारी का कटोरा नज़र आता है, एक बानगी देखिये :
1 . माँ ने इक चाँद सी दुल्हन की दुआएं दी थी
आज की रात जो फूटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है चाँद मुझे ।
2 . क्या पता कब, कहाँ से मारेगी
बस, कि में ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है, एक बार मारेगी ।
3 . इतने लोगों में, कह दो आँखों को
इतना ऊंचा न, ऐसे बोला करे
लोग मेरा नाम जान जाते हैं ।
4 . आओ, सारे पहन ले आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हसीं लगेंगे यहाँ ।
5 . सांवले साहिल पे गुलमोहर का पेड़
जैसे लैला की माँग में सिन्दूर
धर्म बदला गया बेचारी का ।
6 . कौन खायेगा, किसका हिस्सा है
दाने-दाने पे नाम लिखा है,
सेठ सुदचंद, सेठ मूलचंद आक़ा ।
7 . सब पे आती है सबकी बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं
ज़िन्दगी सब पे क्यों नहीं आती ।
7 . उठके जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख़ फ़िज़ा में
अलविदा कहने को, या पास बुलाने के लिए ।
आज के लिए इतना ही, तब तक जय जय....फिर आउंगा किसी नए विषय या नयी ग़ज़ल के साथ....
" श्री लाल राठी "

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