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तमन्ना : gulzar

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो
गिरने की आहट भी नहीं होती
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं

गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
" तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्ज़ा है, किश्तें तुझे चुकानी है "
जबर्दस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कहकर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं
जब होगा, हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च करने की तमन्ना है

धूप-छाँव

कैसे हम दर्द से दूर भागते रहते हैं। किसी तकलीफ या ग़म के बारे में सोचकर सिरहन सी दौड़ जाती है हमारे शरीर में। दुआ के लिए हाथ ऊपर उठ जाते हैं कि ऐ मालिक, रहम करना। लेकिन दर्द से क्या दूर रहा जा सकता है ? क्या दर्द से बचा जा सकता है ? कतई नहीं। हम सब जानते हैं कि सबको अपने हिस्से का सुख दुःख झेलना ही होगा। सही भी है क्यूँकि जब तक हम दर्द की आग में तप नहीं जाते, तब तक वैचारिक रूप से परिपक्व भी नहीं हो सकते। चोट खाया इंसान ही दूसरों के दर्द को समझ सकता है। बल्कि ये भी कह सकते हैं कि दर्द इंसान को मुकम्मल बनता है।
नीचे की नज़्म में गुलज़ार शांति का रास्ता दर्द से होकर गुजरता बताते हैं। बिना रात के सुबह का क्या महत्व ? बिना आंसू के हंसी का क्या महत्व ? और अंततः बिना धूप के छाँव का क्या महत्व ?


मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचाकर 
कि रूह को एक ख़ूबसूरत-सा जिस्म दे दूँ 
न कोई सिलवट, न दाग़ कोई 
न धुप झुलसे, न चोट खाये 
न ज़ख्म छूए, न दर्द पहूँचे 
बस एक कोरी कुंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं  

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की, दर्द की धूप से जो गुज़रा 
तो रूह को छाँव मिल गयी है 

अजीब है दर्द और तस्कीं* का साझा रिश्ता 
मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी 

तस्कीं : शांति