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एक ख़्वाब : Gulzar

एक ही ख़्वाब कई बार यूं ही देखा है मैंने 
तूने साड़ी में उरस ली है मेरी चाबियाँ घर की 
और चली आई है बस यूँ ही मेरा हाथ पकड़कर 
घर की हर चीज संभाले हुऐ अपनाये हुए तू 

तू मेरे पास मेरे घर पे, मेरे साथ है ' सोनूँ '

मेज़ पर फूल सजाते हुए देखा है कई बार 
और बिस्तर से कई बार जगाया भी है तुझको 
चलते-फिरते तेरे क़दमों की वो आहट भी सुनी है 

गुनगुनाती हुई निकली है बाथरूम से जब भी 
अपने भीगे हुए बालों से टपकता हुआ पानी 
मेरे चेहरे पर छटक देती है तू सोनूँ की बच्ची 

फ़र्श पर लेट गयी है तू कभी रूठ के मुझसे 
और कभी फ़र्श से मुझको भी उठाया है मनाकर 
ताश के पत्तों पे लड़ती है कभी खेल में मुझसे 
और कभी लड़ती भी ऐसे है कि बस खेल रही है 
और आग़ोश में नन्हे को…… 

और मालूम है ? जब देखा था ये ख़्वाब तुम्हारा 
अपने बिस्तर पे मैं उस वक़्त पड़ा जाग रहा था 



gulzar : हुस्न

चौदहवी रात के इस चाँद तले 
सुरमई रात में साहिल के क़रीब 
दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू 
ईसा के हाथों से गिर जाये सलीब 
बुध का ध्यान चटख़ जाए, कसम से 
तुझको बर्दाश्त न कर पाये ख़ुदा भी 

दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू 
चौदहवी रात के इस चाँद तले 


Yaarana : gulzar

दूर सूनसान - से साहिल के करीब 
इक जवाँ पेड़ के पास 
उम्र के दर्द लिए, वक़्त का मटियाला दुशाला ओढ़े 
बूढ़ा - सा पॉम का इक पेड़ खड़ा है कब से 
सैकड़ों सालों की तन्हाई के बाद 

झुकके कहता है जवाँ पेड़ से :
" यार, सर्द सन्नाटा है, तन्हाई है 
कुछ बात करो "



गिरहें

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ 
फिर से बाँध के 
और सिरा कोई जोड़ के उसमें 
आगे बुनने लगते हो 
तेरे इस ताने में लेकिन 
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की 
देख नहीं सकता है कोई 

मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता 
लेकिन उसकी सारी गिरहें 
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे 

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !  


पेड़ by gulzar

       आज का दिन, गहरे कोहरे से शुरुआत…सड़कें लिपटी कोहरे से, जैसे किसी कवि के दिल की आधी अधूरी और धुंधली सी रचना आकर शहर की सड़कों पर ही फैल गई हो…9 बजे तक भी सड़कों पर सन्नाटा…पक्षियों को दाना देने जाते हुए धुंध मुझे इस तरह छू रही है जैसे मेरा आलिंगन चाह रही हो और अपना प्यार पानी की अदृश्य बूंदो के रूप में मुझ पर छोड़े जा रही है, और कह रही है कि आजा,कुछ पल प्रकृति के साथ भी गुजार और आल्हादित हो…अपने फ्लैट में तू कहाँ मुझे महसूस करेगा…
       कितना अलग सा आनंद होता है जब हम कभी प्राकृतिक नजारों के साक्षी बनते हैं, किसी शाख़ को फूलों से लदे देखना, बारिश में पूरे नहाये हुए हरे पेड़ों को निहारना…याद करना कि कभी हमने सावन के झूले इन दरख्तों के कन्धों पे रस्सी डाल के खाये हैं.…वो उपक्रम करके बेर तोड़ना और खाना…वो कैरी के लिए पत्थर उछालना, निशाना सही तो मौज और गलत तो फिर समझ ही गए होंगे…चाहे अब कंक्रीट के जंगल चारों और फैल गए हैं, हर इंसान के साथ किसी पेड़, पौधे की कहानी जुडी ही है, तब या अब…घर के आँगन में खड़ा पड़-दादाजी की उम्र का पेड़ या गली, मोहल्ले के यार बाज पेड़, जिनकी शाखें हमें अपनी बाँहों में खिलाती थी…

       इसी प्रकृति या पेड़ की बात जब गुलज़ार अपने अंदाज़ में करते हैं तो उनका अंदाजेबयां उसे एक पूरा किरदार बना देता हैं, उसके साथ बीते हुए लम्हें बल्कि पूरा एक दौर हमारी आँखों के आगे जीवंत हो उठता है…


मोड़ पे देखा है वह बूढा-सा इक पेड़ कभी ?                      

मेरा वाकिफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूँ

जब मैं छोटा था तब एक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कन्धों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख़ से जा पाँव लगा
धाड़ से फ़ेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाख़ें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने

और जब हामला* थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियां फेंकी थी इसी ने

वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था में, जब मुन्ने से कहती बीबा
हाँ, उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है

अब भी जल जाता हूँ, जब मोड़ गुज़रते में कभी
खांसकर कहता है, "क्यों, सर के सभी बाल गए ?"

आज सुबह से काट रहे हैं वह कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको

                                                          " गुलज़ार "        
*हामला - गर्भवती


अंत में जाते जाते हुए यही कहूंगा के क्या हम अपनी पीढ़ियों के लिए यही कंक्रीट ही छोड़ के जायेंगे या प्रकृति की कुछ निशानी भी ?

                                                                                    " श्री लाल राठी "