कितना आसान होता है दंगाइयों के लिए तोड़-फोड़ करना और इंसानों का क़त्लेआम करना। एक ज़िन्दगी जाते जाते कितनी ज़िंदगियों को प्रभावित कर जाती है, कितने बच्चे यतीम हुए, कितनी औरतें विधवा हुई, कितनी माताओं की कोख़ सूनी हुई, कितने घर बर्बाद हुए ? ये बातें दंगाइयों के दिल में थोड़े ही आती है। उन्हें खुद मालूम नहीं होता कि जुनून में आकर वो क्या कर गए।
गुलज़ार कहते हैं कि पूरी ज़िन्दगी खर्च करके एक इंसान अपनी शख्सियत और पहचान बनाता है, एक छोटे से नाम से पूरे इंसान का खाका सामने आ जाता है। एक एक पल की मेहनत से अपने वज़ूद का सेहरा सर पर सजाता है। दंगाई इस अस्तित्व, नाम, वज़ूद को एक पल में काट देते हैं, बिना कुछ हासिल किये हुए।
नाम थे लोगों के, जो क़त्ल हुए
सर नहीं काटा किसी ने भी कहीं पर कोई
लोगों ने टोपियां काटीं थी, कि जिनमें सर थे
और ये बहता हुआ सुर्ख़ लहू है जो सड़क पर
सिर्फ़ आवाज़ें-ज़ुबा करते हुए ख़ून गिरा था