Hasrat Jaipuri : Ghazal

चल मेरे साथ ही चल, ऐ मेरी जान-ऐ-ग़ज़ल 
इन समाजों के बनाये बंधन से निकल, चल 

हम वहां जाएँ, जहाँ प्यार पर पहरे न लगे 
दिल की दौलत पे जहाँ, लुटेरे न कोई लगें 
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, चल 

प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं 
बिजलियाँ अर्श से खुद रास्ता दिखाती हैं 
तू भी बिजली की तरह ग़म के अंधेरों से निकल, चल 

अपने मिलने पे जहाँ कोई भी ऊँगली न उठे 
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे 
छेद दे प्यार से तू साज़-ऐ-मोहब्बत-ऐ-ग़ज़ल, चल 

पीछे मत देख, न शामिल हों गुनहगारों में 
सामने देख कि मंजिल है तेरी तारों में 
बात बनती है अगर इरादे हों अटल, चल 

Rahat Indori : Ghazal

मोम के पास कभी आग को लेकर देखूं 
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगाकर देखूं 

मैंने देखा है ज़माने को शराब पीकर 
दम निकल जाए अगर होश में आकर देखूं 

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है 
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूं 

तेरे बारे में सुना है ये कि तू सूरज है 
मैं जरा देर तेरे साये में आकर देखूं 

याद आता है के पहले भी कर बार यूँ ही 
मैंने सोचा था के तुझे भुलाकर देखूं 

Gulzar : Humko man ki shakti dena

हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें 
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें 

भेदभाव अपने दिल से साफ़ कर सकें 
दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सकें 
झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें 
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें

मुश्किल पड़े हमपे तो इतना कर्म कर 
साथ दें तो धर्म का, चलें तो धर्म पर 
खुद पर हौसला रहे, बदी से ना डरें 
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें

हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें 
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें 

movie : guddi
music : vasant desai
singer : vaani jairam

Hosh walon ko Khabar Kya

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है 
इश्क़ कीजे, फिर समझिये, ज़िन्दगी क्या चीज़ है 

उनसे नज़रें क्या मिलीं, रोशन फ़िज़ाएं हो गईं 
आज जाना, प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है 

खुलती जुल्फों ने सिखाई, मौसमों को शायरी 
झुकती आँखों ने बताया, मैकशी क्या चीज़ है 

हम लबों से कह न पाए, उनसे हाल-ए-दिल कभी 
और वो समझे नहीं ये, ख़ामोशी क्या चीज़ है 

                                 "  निदा फ़ाज़ली "       

Album Soz : Jagjit singh and Javed Akhtar

तमन्‍ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
यह मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

मुझे ग़म है कि मैने ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया
ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्‍से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ


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आज मैंने अपना फिर सौदा किया
और फिर मैं दूर से देखा किया

ज़िन्‍दगी भर मेरे काम आए उसूल
एक एक करके उन्‍हें बेचा किया

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी
तुम से क्‍या कहते के तुमने क्‍या किया

हो गई थी दिल को कुछ उम्‍मीद सी
ख़ैर तुमने जो किया अच्‍छा किया


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अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में ज़ंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्‍म निभाने के लिए मत आना


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आप भी आइये हमको भी बुलाते रहिये
दोस्ती जुर्म नहीं दोस्त बनाते रहिये

ज़हर पी जाइये और बाँटिये अमृत सब को
ज़ख्म भी खाइये और गीत भी गाते रहिये

वक़्त ने लूट लीं लोगों की तमन्नाएँ भी
ख़्वाब जो देखिये औरों को दिखाते रहिये

शक्ल तो आपके भी ज़हन में होगी कोई
कभी बन जाएगी तस्वीर बनाते रहिये


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क्‍यों डरें ज़िन्‍दगी में क्‍या होगा
कुछ ना होगा तो तज़ुर्बा होगा

हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा

इन दिनों ना-उम्‍मीद सा हूँ मैं
शायद उसने भी ये सुना होगा

देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
क्‍या किसी ने तुम्‍हें छुआ होगा


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तुम बैठे हो लेकिन जाते देख रहा हूँ
मैं तन्हाई के दिन आते देख रहा हूँ

आने वाले लम्हे से दिल सहमा है
तुमको भी डरते घबराते देख रहा हूँ

कब यादों का ज़ख्म भरे कब दाग मिटे
कितने दिन लगते हैं भुलाते देख रहा हूँ

उसकी आँखों में भी काजल फैला है
मैं भी मुड़ के जाते जाते देख रहा हूँ


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इक पल ग़मों का दरिया इक पल खुशी का दरिया
थमता नहीं कहीं भी ये ज़िन्दगी का दरिया

आँखें थी वो किसी की या ख़्वाब के जज़ीरे
आवाज़ थी किसी की या रागिनी का दरिया

इस दिल की वादियों में अब ख़ाक उड़ रही है
बहता यहीं था पहले इक आशिक़ी का दरिया

किरनों में हैं ये लहरें या लहरों में हैं किरनें
दरिया की चाँदनी है या चाँदनी का दरिया

जज़ीरे : टापू 

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प्यास की कैसे लाए ताब कोई
नहीं दरिया तो हो सराब कोई

रात बजती थी दूर शहनाई
रोया पीकर बहुत शराब कोई

कौन-सा ज़ख़्म किसने बख़्शा है
इसका रक्खे कहाँ हिसाब कोई

फ़िर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की
आने वाला है फिर अज़ाब कोई

ताब : सहनशक्ति 
सराब : तृष्णा 
अज़ाब : दुःख 

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all ghazals lyrics are penned by Javed Akhtar.

Tum to Nahi ho : Jagjit singh and Bashir Badr

All Lyrics in this album are from pen of  ' Bashir Badr '

सुन ली जो ख़ुदा ने वो दुआ तुम तो नहीं हो 
दरवाज़े पे दस्तक की सदा तुम तो नहीं हो 

महसूस किया तुमको तो गीली हुई पलकें 
भीगे हुए मौसम की अदा तुम तो नहीं हो 

अनजानी सी राहों में नहीं कोई भी मेरा 
किसने मुझे अपना कहा तुम तो नहीं हो 

दुनिया को बहरहाल गिले-शिकवे रहेंगे 
दुनिया की तरह मुझसे खफ़ा तुम तो नहीं हो 

                                     
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मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है
ये दुनिया खूबसूरत हो गई है

ख़ुदा से रोज़ तुमको मांगता हूँ
मेरी चाहत इबादत हो गई है

वो चेहरा चाँद है, आँखें सितारे
ज़मीं फूलों को जन्नत हो गई है

बहुत दिन से तुम्हे देखा नहीं है
चले ही आओ मुद्दत हो गई है

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रात आँखों में ढली, पलकों पे जुगनू आये
हम हवाओं की तरह जाके, उसे छू आये

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई खुशबू मैं लगाऊं तो तेरी खुशबू आये

उसने छू कर मुझे पत्थर से इंसान किया
मुद्दतों बाद मेरी आँख में आंसू आये

मैंने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ मांगी थी
कोई आहट ना हो दर पर मेरे जब तू आये

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कभी तो आसमां से चाँद उतरे जाम हो जाये
तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाए

वो मेरा नाम सुनकर कुछ जरा शरमा से जाते हैं
बहुत मुमकिन है कहीं इसका मोहब्बत ना हो जाए

जरा सा मुस्कुरा कर हाल पूछो दिल बहल जाए
हमारा काम हो जाए, तुम्हारा नाम हो जाए

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए

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खुश रहे या बहुत उदास रहे 
ज़िन्दगी तेरे आस पास रहे 

आज हम सब के साथ खूब हँसे 
और फिर देर तक उदास रहे 

रात के रास्ते भी रोशन हों 
हाथ में चाँद का गिलास रहे 

आदमी के लिये जरुरी है
कोई उम्मीद, कोई आस रहे 

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वो नहीं तो मलाल क्या, जो गुजर गया सो गुजर गया 
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुजर गया सो गुजर गया 

ना गिला किया, ना ख़फा हुए,  यूँ ही रास्ते में जुदा हुए 
ना तू बेवफा ना मैं बेवफा, जो गुजर गया सो गुजर गया

तुझे ऐतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं 
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुजर गया सो गुजर गया

वो वफायें थी, कि जफ़ाएं थी, ये न सोच किसकी खतायें थीं 
वो तेरा है, उसको गले लगा, जो गुजर गया सो गुजर गया

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Aas hogi naa aasra hoga : Bashir Badr

आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा


मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक़्त सब कुछ बदल चुका होगा

नाम हम ने लिखा था आँखों में
आँसुओं ने मिटा दिया होगा

आसमाँ भर गया परिंदों से
पेड़ कोई हरा गिरा होगा


कितना दुश्वार था सफ़र उस का
वो सर-ए-शाम सो गया होगा

Royal Salute

कृपया ग़ज़ल के निचे दिए गए ऑप्शन में Average, Good, Excellent  रेटिंग जरूर देवें ।


मान मौसम का कहा, छायी घटा जाम उठा 
आग से आग बुझा, फूल खिला जाम उठा 

ऐ मेरे यार, तुझे उसकी कसम देता हूँ 
भूल जा शिकवा-गिला, हाथ मिला जाम उठा 

एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा 
देर क्या करना यहाँ, हाथ बढ़ा जाम उठा 

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर है यहाँ 
मयकदे में कोई छोटा न बड़ा, जाम उठा 

मान मौसम का कहा, छायी घटा जाम उठा 
आग से आग बुझा, फूल खिला जाम उठा 

                                    " बशीर बद्र "

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मेरे करीब न आओ, कि मैं शराबी हूँ 
मेरा शऊर जगाओ, कि मैं शराबी हूँ 

ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं 
नज़र से तुम न गिराओ कि मैं शराबी हूँ 

ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलूस वालों से 
उठा सको तो उठाओ कि मैं शराबी हूँ

तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में 
नज़र नज़र से मिलाओ कि मैं शराबी हूँ

ख़ुलूस : अच्छे लोग 

                                                  "  सबा सीकरी "

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झूम के जब रिंदों ने पिला दी 
शेख ने चुपके चुपके दुआ दी 

एक कमी थी ताजमहल में 
हमने तेरी तस्वीर लगा दी 

तेरी गली में सज़दे करके 
हमने इबादतगाह बना दी 

आपने झूठा वादा करके 
आज हमारी उम्र बढा दी 

                                          " Kaif Bhopali :      

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नज़र नज़र से मिला कर शराब पीते हैं 
हम उनको पास बिठाकर शराब पीते हैं 

इसीलिए तो अंधेरा है मयकदे में बहुत 
यहाँ घरों को जलाकर शराब पीते हैं 

हमें तुम्हारे सिवा कुछ नज़र नहीं आता 
तुम्हे नज़र में सजाकर शराब पीते हैं 

उन्हीं के हिस्से में आती है प्यास ही अक्सर 
जो दूसरों को रुलाकर शराब पीते है 

                                                            " Tasneem Faruqi "

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ये पीने वाले बहुत ही अजीब होते हैं 
जहाँ से दूर ये खुद के करीब होते हैं 

किसी को प्यार मिले, और किसी को रुसवाई 
मोहब्बतों के सफर भी अजीब होते हैं 

मिला किसी को है क्या सोचिये अमीरी से 
दिलों के शाह तो अक्सर ग़रीब होते हैं 

यहाँ के लोगों की है ख़ासियत ये सबसे बड़ी 
हबीब लगते हैं लेकिन रक़ीब होते हैं 

                                                    अज्ञात 
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आप आये जनाब बरसों में 
हमने पी है शराब बरसों में 

दिल से दिल की कली खिली अपनी 
फिर से देखा शबाब बरसों में 

तुम कहाँ थे, कहाँ रहे साहिब  
आज होगा हिसाब बरसों में 

पहले नादां थे अब हुए दाना
उनको आया अदब बरसों में 

इसी उम्मीद पे मैं ज़िंदा हूँ 
क्या वो देंगे जवाब बरसों में 

                                          " Rustam Sehgal 'wafa' "

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बात साक़ी की ना टाली जाएगी 
करके तौबा तोड़ डाली जाएगी 

देख लेना वो न खाली जाएगी 
आह जो दिल निकाली जायेगी 

गर यही तर्ज-ए-फुगाँ है अंदलीब 
तू भी गुलशन से निकाली जाएगी 

आते आते आएगा उनको ख्याल 
जाते जाते बेखयाली जाएगी 

क्यों नहीं मिलती गले से तेग-ए-नाज़ 
ईद क्या अबके भी खाली जायेगी 

                                                      " Jalil Manikpuri "

तर्ज-ए-फुगाँ : दुहाई देने का तरीका 
अंदलीब : बुलबुल 
बेखयाली : असावधानी 
तेग-ए-नाज़ : घमंडी 

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Jagjit singh-Kaifi Aazmi : Movie Arth

झुकी झुकी सी नज़र, बेक़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं 

तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता 
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र 

वो पल कि जिसमें मोहब्बत जवां होती है 
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र 

तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को 
तुझे भी अपने पे ये एतबार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र 

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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - २ 
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो 

आँखों में नमी, हंसी लबों पर - २ 
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो 

बन जायेंगे, ज़हर पीते पीते - २ 
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो 

जिन ज़ख्मों को वक़्त भर चला है - २ 
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो 

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर - २ 
रेखाओं से मात खा रहे हो 

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कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यों है 
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों है 
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है 
यही होता है तो आखिर येही होता क्यों है

इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ ले दामन 
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन 
इतनी क़ुरबत है तो फिर फासला इतना क्यूँ है 

दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई 
इक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई 
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूं है 

तुम मस्सर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता 
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता 
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूं है