झुकी झुकी सी नज़र, बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
वो पल कि जिसमें मोहब्बत जवां होती है
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये एतबार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
************************************************************
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - २
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो
आँखों में नमी, हंसी लबों पर - २
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो
बन जायेंगे, ज़हर पीते पीते - २
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो
जिन ज़ख्मों को वक़्त भर चला है - २
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो
रेखाओं का खेल है मुक़द्दर - २
रेखाओं से मात खा रहे हो
************************************************************
कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यों है
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आखिर येही होता क्यों है
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी क़ुरबत है तो फिर फासला इतना क्यूँ है
दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूं है
तुम मस्सर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूं है
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
वो पल कि जिसमें मोहब्बत जवां होती है
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये एतबार है कि नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं
झुकी झुकी सी नज़र
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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - २
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो
आँखों में नमी, हंसी लबों पर - २
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो
बन जायेंगे, ज़हर पीते पीते - २
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो
जिन ज़ख्मों को वक़्त भर चला है - २
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो
रेखाओं का खेल है मुक़द्दर - २
रेखाओं से मात खा रहे हो
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कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यों है
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आखिर येही होता क्यों है
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी क़ुरबत है तो फिर फासला इतना क्यूँ है
दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूं है
तुम मस्सर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूं है