Jagjit singh : Face to Face

दैरो हरम में बसने वालों,
मैखानों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे,
तुम अपनी कश्ती को सम्भालो।

मैखाने में आये वाइज़,
इनको भी इंसान बना लो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो,
ताजमहल पे रंग न डालो।

                      " खामोश ग़ाज़ीपुरी "

वाइज़ - पंडित,
दैरो हरम - घरबार
आरिज़-ओ-लब - गाल और होंठ

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शेख़ जी, थोड़ी सी पीकर आइये
मय है क्या शै फिर हमें बतलाइये

आप क्यूँ है सारी दुनिया से जुदा
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइये

क्या है अच्छा, क्या बुरा बन्दा-नवाज़
आप समझें तो हमें समझाइये

जाने दीजे अक्ल की बातें जनाब
दिल की सुनिए और पीते जाइये

उलझनें दुनिया की सुलझा लेंगे हम
आप अपनी ज़ुल्फ़ तो सुलझाइए

                            ' sudarshan fakir '


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तुमने बदले हमसे गिन गिन के लिये  
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिये 

वस्ल का दिन और इतना मुक्तसर 
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये 

वो नहीं सुनते हमारी क्या करें 
मांगते हैं हम दुआ जिनके लिये 

चाहने वालों से गर मतलब नहीं 
आप फिर पैदा हुए किनके लिये 

बागबां कलियाँ वो हलके रंग की 
भेजनी है एक कमसिन के लिये 

                                         " Daag & Ameer Minayee "

वस्ल - मिलन
मुक्तसर - थोड़ा/कम

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सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन न आया.... सच्ची बात कही थी मैंने

ले के जहाँ भी वक़्त गया है
ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है
सच का इक इनाम मिला है.... सच्ची बात कही थी मैंने

सबसे बेहतर कभी न बनना
जग के रहबर कभी न बनना
पीर-पैगम्बर कभी न बनना.... सच्ची बात कही थी मैंने

चुप रहकर ही वक़्त गुजारो
सच कहने में जां मत वारो
कुछ तो सीखो मुझसे यारों.... सच्ची बात कही थी मैंने

                                                                     " Sabir Dutt "

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बेसबब बात बढाने की जरुरत क्या है
हम ख़फ़ा कब थे मनाने की जरुरत क्या है

आप के दम से तो दुनिया का भरम है कायम
आप जब हैं तो ज़माने की जरुरत क्या है

तेरा कूचा, तेरा दर, तेरी गली काफी है
बे-ठिकानों को ठिकाने के जरुरत क्या है

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में
हाथ से हाथ मिलाने की जरुरत क्या है

रंग आँखों के लिए, बू है दिमागों के लिए 
फूल को हाथ लगाने की जरुरत क्या है 

                                     " Shahid kabir "

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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है 
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है 

गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हो या डोर 
लाख करे कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है 

हमने इलाजे ज़ख्मे दिल तो ढूंढ लिया लेकिन 
गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है 

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था 
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है

                                                            " Hastimal Hasti "

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कोई मौसम ऐसा आये 
उसको अपने साथ जो लाये 

लोगों से तारीफ़ सुनी थी 
उससे मिलकर देखा जाये 

आज भी दिल पर बोझ बहुत है 
आज भी शायद नींद न आये 

हाल है दिल का जुगनू जैसा 
जलता जाए बुझता जाये 

बीते लम्हे कुछ ऐसे हैं 
खुशबू जैसे हाथ न आये 

                                      " Azhar Inayati "

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ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या, कुछ भी नहीं 

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो 
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं 

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ 
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं 

या-खुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार 
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं 

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह 
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं 

                                                                      " rajesh reddy "

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