ये नज़राना तेरा भी है - मेरा भी
अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है - मेरा भी
तू मुझको और मैं तुझको समझाऊँ क्या
दिल दीवाना तेरा भी है - मेरा भी
शहर में गलियों गलियों जिसका चर्चा है
वो अफसाना तेरा भी है - मेरा भी
मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है - मेरा भी
" Shahid Kabir "
sung by both : lata ji and jagjit ji
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मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों
वो बेख़याल मुसाफिर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों
मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
मैं अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों
तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मैं उसकी घर का पता किससे पूछता यारों
" Waseem Barelvi "
sung by jagjit ji
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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग
क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग
तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग
कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग
" दानिश अलीगढ़ी "
sung by jagjit ji
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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह
मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह
सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह
या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह
" qateel shifai "
sung by Lata ji
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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं
मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं
वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं
" Sahir Bhopali "
sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी
हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी
ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखरी सांस तक बेकरार आदमी
" Nida fazli "
मज़ार : कब्र
sung by : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो
ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता
नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले
ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो
किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन
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" Waseem Barelvi "
sung by jagjit ji
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तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग
क्या खबर थी तेरे मिलने पर क़यामत होगी
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग
तेरी नज़रो से गिराने के लिए जाने-हया
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग
कहके दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग
" दानिश अलीगढ़ी "
sung by jagjit ji
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दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह
मैंने तुझसे चाँद सितारे कब मांगे
रोशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह
सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह
या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह
" qateel shifai "
sung by Lata ji
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दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ नहीं
मैं तेरी बारगाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब
मेरे पास अश्क़-ए-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं
वो तो मिटकर मुझे मिल ही गई राहत वर्ना
ज़िन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं
" Sahir Bhopali "
sung by Lata ji
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हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी
हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी
ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखरी सांस तक बेकरार आदमी
" Nida fazli "
मज़ार : कब्र
sung by : lata ji and jagjit ji *********************************************************************************
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखोवो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो
" Nida Fazli "
sung by : jagjit ji
sung by : jagjit ji
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जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है
ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
पर्दों में क्या छुपा है, अल्लाह जानता है
जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता
वो कौनसी जगह है, अल्लाह जानता है
नेकी-बदिे को अपने कितना ही तू छुपा ले
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है
ये धूप-छाँव देखो, ये सुबह शाम देखो
सब क्यूँ ये हो रहा है, अल्लाह जानता है
किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है
" अख्तर शीरानी "
sung by : lata ji and jagjit ji
" अख्तर शीरानी "
sung by : lata ji and jagjit ji
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मेरी तस्वीर में, रंग और किसी का तो नहीं
घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं
ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं
रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं
सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं
" मुजफ्फर वारसी "
sung by : lata ji
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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा
इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा
" अहमद फ़राज़ "
मानूस : लगाव
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी
अता : तोहफा
sung by : Lata Ji
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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ
वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ
दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ
ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ
यकता : बेजोड़
बेगाना-रवी : रूखापन
" अहमद नदीम क़ासमी "
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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते
दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते
ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते
तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते
" ज़फर गोरखपुरी "
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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे
इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे
बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे
ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे
" सबा अफगानी "
इब्तिदा : आरम्भ
इंतिहा : अंत
तसकीन : तसल्ली
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घेर ले मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं
ज़िन्दगी तुझसे हर एक सांस पे समझौता करूँ
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं
रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं
सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
जेहन की तह में ' मुजफ्फर ' कोई दरिया तो नहीं
" मुजफ्फर वारसी "
sung by : lata ji
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आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है, गुजरता है गुजर जाएगा
इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपने
तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सरे-राह वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रफक़त से गुजर जाएगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा
" अहमद फ़राज़ "
मानूस : लगाव
खिलवत-ऐ-ग़म : अकेलापन
बाम-ऐ-रफक़त : वफ़ा की जिम्मेदारी
अता : तोहफा
sung by : Lata Ji
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किसको क़ातिल में कहूं, किसको मसीहा समझूँ
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है, किसे क्या समझूँ
वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था
अब हक़ीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ
दिल जो टूटा तो कईं हाथ दुआ को उठे
ऐसे माहौल में किसको पराया समझूँ
ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगाना-रवी
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ
यकता : बेजोड़
बेगाना-रवी : रूखापन
" अहमद नदीम क़ासमी "
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मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते
दीवाना तुम्हारा हूँ कोई ग़ैर नहीं
मचला हूँ तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते
ख़त लिखके कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते
तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते
" ज़फर गोरखपुरी "
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तेरे जलवे अब मुझे हर-सू नज़र आने लगे
काश ये भी हो कि मुझमे तू नज़र आने लगे
इब्तिदा ये थी कि देखी थी ख़ुशी की इक झलक
इंतिहा ये है कि ग़म हर-सू नज़र आने लगे
बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फितरत बन गई
शायद अब तसकीन का पहलू नज़र आने लगे
ख़त्म कर दे ऐ ' सबा ' अब शाम-ऐ-ग़म की दास्तां
देख उन आँखों में भी आंसू नज़र आने लगे
" सबा अफगानी "
इब्तिदा : आरम्भ
इंतिहा : अंत
तसकीन : तसल्ली
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