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Encore : jagjit singh


आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया


                                           " वसीम बरेलवी "

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तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी होगी
फिर उस सजदे का क्या कहना अनोखी बंदगी होगी

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी

दिखा दूँगा सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर
वो मेरे दिल में होगी और दुनिया देखती होगी

मज़ा आ जायेगा महशर फिर कुछ सुनने सुनाने का
ज़ुबाँ होगी वहाँ मेरी, कहानी आप की होगी

तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी

                                             " सीमाब अकबराबादी "

क़ज़ा : मौत 
नसीम-ए-सुबह : सुबह की ठंडी हवा 
सर-ए-महफ़िल : भरी महफ़िल में 
सर-ए-महशर : क़यामत के दिन 
दानिस्ता : जान बुझ कर 

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इश्क़ की दास्तान है प्यारे
अपनी अपनी ज़ुबान है प्यारे

हम ज़माने से इन्तक़ाम तो लें
एक हसीं दरमियान है प्यारे

तू नहीं मैं हूँ, मैं नहीं तू है
अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे

रख क़दम फूँक फूँक कर नादाँ
ज़र्रे ज़र्रे में जान है प्यारे


                                       " जिगर मुरादाबादी "


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ठुकराओ अब, के प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ऐ-वफ़ा मगर
मेरा ना एतबार करो, मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे, मेरा साग़र संभाल लो
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

मुझको क़दम-क़दम पे भटकने दो वाइज़ों
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ

फ़िर बेख़ुदी में हद से गुज़रने लगा हूँ मैं
इतना ना मुझसे प्यार करो, मैं नशे में हूँ

                                                         " शाहिद कबीर "


वाइज : धर्म उपदेशक 

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चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले

फ़स्ल-ए-गुल आई फिर इक बार असिरान-ए-वफ़ा
अपने ही ख़ून के दरिया में नहाने निकले

दिल ने एक ईटं से तामीर किया ताज-महल
तूने इक बात कही लाख़ फ़साने निकले

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा में खड़ा सोचता हूँ
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले

                                                          " अमजद इस्लाम अमजद "


फ़स्ल-ए-गुल : बहार का मौसम 
असिरान-ए-वफ़ा : वफ़ा निभाने वाले 
तामीर : निर्माण 
दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा : बिछड़ा हुआ तन्हाई के जंगल में 

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