Lyricist of this album is : " Qateel Shifai "
परेशां रात सारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूते-मर्गतारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही किस्मत हमारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
तुम्हे क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाजी हमने हारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
हंसो और हँसते हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
* सुकूते-मर्गतारी - मौत की ख़ामोशी से घिरे
* ख़लाओं - शून्य
*********************************************************************************
मिल कर जुदा हुए तो, न सोया करेंगे हम
इक दूसरे की याद में, रोया करेंगे हम
आंसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम
जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम
गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी ' क़तील '
साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम
*********************************************************************************
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की
उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की
* वस्ल - मिलन
* इसरार - आग्रह
* दानाई - अक्लमंदी
*********************************************************************************
सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं
बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं
क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं
ले मेरे तजुर्बों से सबक़ ऐ मेरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं
रक़ीब - प्रतिद्वंद्वी
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पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइए
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइए
पहले मिजाज़-ए-राहगुजर जान जाइए
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइए
कुछ कह रहीं हैं आपके सीने की धड़कनें
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइए
इक धूप सी जमी है निगाहों के आसपास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइए
शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झांककर हमें पहचान जाइए
मिजाज़-ए-राहगुजर = रास्ते का स्वाभाव/ प्रकृति,
गर्द-ए-राह = रास्ते की धूल
निस्बत = सम्बन्ध
*******************************************************************
तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते
तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमानें कहाँ जाते
चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
निकल कर दैरो काबा से अगर मिलता ना मैख़ाना
तो ठुकराये हुये इन्सान ख़ुदा जाने कहाँ जाते
अंजुमन = महफ़िल वाबस्ता = सम्बन्धित, सम्बद्ध
बादा-ख़ाना = मदिरालय
दैरो काबा = मंदिर और मस्जिद
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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको
ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको
बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं 'क़तील'
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको
बादा = शराब
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दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों
पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों
ये दिल, ज़रा सा दिल, तेरी यादों में खो गया
ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों
तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी
अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों
ग़म-ए-हयात : जीवन में ग़म
शब = रात
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ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे
वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे
वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे
मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ "क़तील"
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे
मोजज़ा = चमत्कार
संग = पत्थर
बदगुमाँ = मन में संदेह लिया हुआ आदमी
ग़म-ए-हयात = जीवन का दुःख
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परेशां रात सारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूते-मर्गतारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही किस्मत हमारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
तुम्हे क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाजी हमने हारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
हंसो और हँसते हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
* सुकूते-मर्गतारी - मौत की ख़ामोशी से घिरे
* ख़लाओं - शून्य
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मिल कर जुदा हुए तो, न सोया करेंगे हम
इक दूसरे की याद में, रोया करेंगे हम
आंसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम
जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम
गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी ' क़तील '
साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम
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अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की
उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की
* वस्ल - मिलन
* इसरार - आग्रह
* दानाई - अक्लमंदी
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सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं
बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं
क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं
ले मेरे तजुर्बों से सबक़ ऐ मेरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं
रक़ीब - प्रतिद्वंद्वी
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पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइए
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइए
पहले मिजाज़-ए-राहगुजर जान जाइए
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइए
कुछ कह रहीं हैं आपके सीने की धड़कनें
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइए
इक धूप सी जमी है निगाहों के आसपास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइए
शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झांककर हमें पहचान जाइए
मिजाज़-ए-राहगुजर = रास्ते का स्वाभाव/ प्रकृति,
गर्द-ए-राह = रास्ते की धूल
निस्बत = सम्बन्ध
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तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते
तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमानें कहाँ जाते
चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
निकल कर दैरो काबा से अगर मिलता ना मैख़ाना
तो ठुकराये हुये इन्सान ख़ुदा जाने कहाँ जाते
अंजुमन = महफ़िल वाबस्ता = सम्बन्धित, सम्बद्ध
बादा-ख़ाना = मदिरालय
दैरो काबा = मंदिर और मस्जिद
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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको
ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको
बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं 'क़तील'
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको
बादा = शराब
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दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों
पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों
ये दिल, ज़रा सा दिल, तेरी यादों में खो गया
ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों
तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी
अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों
ग़म-ए-हयात : जीवन में ग़म
शब = रात
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ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे
वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे
वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे
मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ "क़तील"
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे
मोजज़ा = चमत्कार
संग = पत्थर
बदगुमाँ = मन में संदेह लिया हुआ आदमी
ग़म-ए-हयात = जीवन का दुःख
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