हवा के सींग न पकड़ो, खदेड़ देती है
ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमड़ती बारिश को
मगर ये रोज गयी बात छेड़ देती है
ज़मीं-सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है
रूंधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता
दरे-हयात, जिसे मौत भेड़ देती है
ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमड़ती बारिश को
मगर ये रोज गयी बात छेड़ देती है
ज़मीं-सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है
रूंधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता
दरे-हयात, जिसे मौत भेड़ देती है
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