Excellent ghazal by Gulzar

हवा के सींग न पकड़ो, खदेड़ देती है 
ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है 

मैं चुप कराता हूँ हर शब उमड़ती बारिश को 
मगर ये रोज गयी बात छेड़ देती है 

ज़मीं-सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा 
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है 

रूंधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता 
दरे-हयात, जिसे मौत भेड़ देती है 

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