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Ghazal by Gulzar

दिखाई देते हैं, धुंध में अब भी साये कोई 
मगर बुलाने से वक़्त लौटे न आये कोई 

मेरे मुहल्ले का आसमाँ सूना हो गया है 
पतंग उड़ाए, फलक में पेचे लड़ाए कोई 

वो ज़र्द पत्ते जो पेड़ से टूट कर गिरे थे 
कहाँ गए बहते पानियों में, बुलाये कोई 

ज़ईफ़ बरगद के हाथ में रेशा आ गया है 
जटाएं आँखों पे गिर रही है, उठाये कोई 

मज़ार पे खोल कर गरेबाँ, दुआएं मांगे 
जो आये अबके, तो लौट कर फिर न जाये कोई 

Milestone ghazal of Gulzar

सब्र हर बार अख़्तियार किया 
हम से होता नहीं, हज़ार किया 

आदतन तुमने कर दिए वादे 
आदतन हमने ऐतबार किया 

हमने अक्सर तुम्हारी राहों में 
रुक के अपना ही इंतज़ार किया 

फिर न मांगेंगे ज़िंदगी या रब 
ये गुनाह हमने इक बार किया 


Excellent ghazal by Gulzar

हवा के सींग न पकड़ो, खदेड़ देती है 
ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है 

मैं चुप कराता हूँ हर शब उमड़ती बारिश को 
मगर ये रोज गयी बात छेड़ देती है 

ज़मीं-सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा 
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है 

रूंधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता 
दरे-हयात, जिसे मौत भेड़ देती है