29.12.13 के राजस्थान पत्रिका रविवारीय अंक में एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली, उसे सबके सामने रखने से रोक नहीं पाया....यद्यपि पत्रिका के लाखों की तादाद में पाठक है, परन्तु अपने ब्लॉग के माध्यम से उन लोगों के सामने भी में रखना चाहता हूँ, जो इसे पढ़ नहीं पाये....सामान्य शब्दों में गहरी भावनाएं उंडेल दी है कवि ने इस ग़ज़ल में…एक कुंए में पानी की सतह को देख कर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि इसकी गहराई कितनी है…इसी तरह इस ग़ज़ल में भी सतह के नीचे बहुत गहराई छिपी है जिसे सुधि पाठक की गहरी आँखे नाप लेती है....कवि अखिलेश तिवारी को मेरा अभिनन्दन, उम्मीद करते हैं कि वो हम जैसे पाठकों को ऐसे ही रचना रस का आस्वादन करवाते रहेंगे...
खुद से ही संवाद है शायद
क्या है तेरी याद है शायद।
सीने पर पत्थर रखा है
रिश्तों की बुनियाद है शायद।
पहले बस्ती का सन्नाटा
जंगल इसके बाद है शायद।
पांवों में जंजीर पड़ी है
मुझ जैसा आजाद है शायद।
पलकों की कोरें भीगी हैं
खुशियों का अनुवाद है शायद।
" अखिलेश तिवारी "
English Lyrics :
Khud se hi sanvad hai shayad
kya hai teri yaad hai shayad
Seene par patthar rakha hai
rishton ki buniyad hai shayad
Pahle basti ka sannata
jungle iske baad hai shayad
Paanvon me janjeer padi hai
mujh jaisa aazad hai shayad
Palkon ki korein bhigi hai
khushiyon ka anuvaad hai shayad
" Akhilesh Tiwari "
खुद से ही संवाद है शायद
क्या है तेरी याद है शायद।
सीने पर पत्थर रखा है
रिश्तों की बुनियाद है शायद।
पहले बस्ती का सन्नाटा
जंगल इसके बाद है शायद।
पांवों में जंजीर पड़ी है
मुझ जैसा आजाद है शायद।
पलकों की कोरें भीगी हैं
खुशियों का अनुवाद है शायद।
" अखिलेश तिवारी "
English Lyrics :
Khud se hi sanvad hai shayad
kya hai teri yaad hai shayad
Seene par patthar rakha hai
rishton ki buniyad hai shayad
Pahle basti ka sannata
jungle iske baad hai shayad
Paanvon me janjeer padi hai
mujh jaisa aazad hai shayad
Palkon ki korein bhigi hai
khushiyon ka anuvaad hai shayad
" Akhilesh Tiwari "
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