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Nida Fazli : Superb Poetry

कुछ तबियत ही मिली थी ऐसी, चैन से जीने की सूरत ना हुई 
जिसको चाहा, उसे अपना न सके, जो मिला उससे मुहब्बत न हुई 

जिससे जब तक मिले, दिल ही से मिले, दिल जो बदला तो फ़साना बदला 
रस्में दुनिया की निभाने के लिए, हमसे  रिश्तों की तिज़ारत न हुई 

वक़्त रूठा रहा बच्चे की तरह, राह में कोई खिलौना ना मिला 
दोस्ती भी तो निभाई ना गई, दुश्मनी में भी अदावत न हुई 

दूर से था वो कई चेहरों में, पास से कोई वैसा ना लगा 
बेवफाई भी था उसी का चलन फिर किसी से भी शिकायत ना हुई 

तिज़ारत : व्यापार 
अदावत : निभाना 

Ghazal of Nida Fazli

बात कम कीजे, जहानत को छिपाते रहिये 
अजनबी शहर है, दोस्त बनाते रहिये 

दुश्मन लाख सही, ख़त्म न कीजे रिश्ता 
दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिये 

ग़म है आवारा, अकेले में भटक जाता है 
जिस जगह भी रहिये, मिलते मिलाते रहिये 

जाने कब चाँद बिखर जाए जंगल में 
घर की चौखट पे कोई दीया जलाते रहिये