Ghazal of Nida Fazli

बात कम कीजे, जहानत को छिपाते रहिये 
अजनबी शहर है, दोस्त बनाते रहिये 

दुश्मन लाख सही, ख़त्म न कीजे रिश्ता 
दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिये 

ग़म है आवारा, अकेले में भटक जाता है 
जिस जगह भी रहिये, मिलते मिलाते रहिये 

जाने कब चाँद बिखर जाए जंगल में 
घर की चौखट पे कोई दीया जलाते रहिये 




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