Visaal : मिलन
जब भी आँखों में अश्क़ भर आये
लोग कुछ डूबते नज़र आये
मुद्दतें हो गई सहर देखे
कोई आहट कोई ख़बर आये
चाँद जितने भी गुम हुए शब के
सबके इलज़ाम मेरे सर आये
मुझको अपना पता ठिकाना मिले
वो भी इक बार मेरे घर आये
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खुशबू ग़ुंचे तलाश करती है
बीते रिश्ते तलाश करती है
जब गुजरती है उस गली से सबा
ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है
अपने माज़ी की जुस्तज़ू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है
एक उम्मीद बार-बार आकर
अपने टुकड़े तलाश करती है
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हम तो कितनों को महजबीं कहते
आप हैं इसलिए नहीं कहते
चाँद होता न आसमां पे अगर
हम किसे आप सा हसीं कहते
आपने औरों से कहा सब कुछ
हम से कुछ तो कभी नहीं कहते
रात देखा था जाते जाते उन्हें
चाँद को अपना जानशीं कहते
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खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में
चाँद के साये बालिश्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में
दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है
किसकी आहट सुनता हूँ वीराने में
जाने किसका जिक्र है इस अफ़साने में
दर्द मजे लेता है जो दोहराने में
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कोई अटका हुआ है पल शायद
वक़्त में पड़ गया है बल शायद
आ रही है जो चाप कदमों की
खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद
दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इसका कोई नहीं है हल शायद
राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद
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मेरा क्या था तेरे हिसाब में, मेरा सांस सांस उधार था
जो गुजर गया वो तो वक़्त था, जो बचा रहा वो ग़ुबार था
तेरी आरज़ू में उड़े तो थे चंद खुश्क पत्ते चनार के
जो हवा के दोष से गिर पड़ा, उनमें एक ये ख़ाकसार था
वो उदास-उदास इक शाम थी, एक चेहरा था एक चिराग़ था
और कुछ नहीं था ज़मीन पर, एक आसमान का ग़ुबार था
बड़े सूफियों से ख़याल थे, और बयां भी उसका कमाल था
कहा मैंने कब कि वही था वो, एक शख्स था वादाख़्वार था
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जब भी आँखों में अश्क़ भर आये
लोग कुछ डूबते नज़र आये
मुद्दतें हो गई सहर देखे
कोई आहट कोई ख़बर आये
चाँद जितने भी गुम हुए शब के
सबके इलज़ाम मेरे सर आये
मुझको अपना पता ठिकाना मिले
वो भी इक बार मेरे घर आये
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खुशबू ग़ुंचे तलाश करती है
बीते रिश्ते तलाश करती है
जब गुजरती है उस गली से सबा
ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है
अपने माज़ी की जुस्तज़ू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है
एक उम्मीद बार-बार आकर
अपने टुकड़े तलाश करती है
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हम तो कितनों को महजबीं कहते
आप हैं इसलिए नहीं कहते
चाँद होता न आसमां पे अगर
हम किसे आप सा हसीं कहते
आपने औरों से कहा सब कुछ
हम से कुछ तो कभी नहीं कहते
रात देखा था जाते जाते उन्हें
चाँद को अपना जानशीं कहते
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खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में
चाँद के साये बालिश्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में
दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है
किसकी आहट सुनता हूँ वीराने में
जाने किसका जिक्र है इस अफ़साने में
दर्द मजे लेता है जो दोहराने में
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कोई अटका हुआ है पल शायद
वक़्त में पड़ गया है बल शायद
आ रही है जो चाप कदमों की
खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद
दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इसका कोई नहीं है हल शायद
राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद
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मेरा क्या था तेरे हिसाब में, मेरा सांस सांस उधार था
जो गुजर गया वो तो वक़्त था, जो बचा रहा वो ग़ुबार था
तेरी आरज़ू में उड़े तो थे चंद खुश्क पत्ते चनार के
जो हवा के दोष से गिर पड़ा, उनमें एक ये ख़ाकसार था
वो उदास-उदास इक शाम थी, एक चेहरा था एक चिराग़ था
और कुछ नहीं था ज़मीन पर, एक आसमान का ग़ुबार था
बड़े सूफियों से ख़याल थे, और बयां भी उसका कमाल था
कहा मैंने कब कि वही था वो, एक शख्स था वादाख़्वार था
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