मेरी उम्र २२-२३ साल की होगी, जगजीत सिंह की ग़ज़लों का चस्का तो लग ही चुका था। मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम बहुत सुना था, सो एल्बम खरीद लिया। एल्बम की शुरुआत में गुलज़ार की आवाज़ में ग़ालिब का परिचय दिया हुआ है, बड़े ही ध्यान से सुना। काफ़ी शब्द समझ में भी नहीं आये परन्तु गुलज़ार की लरज़ती आवाज़ में इतना बेहतरीन परिचय मैंने किसी दुसरे के बारे में नहीं सुना, और हो भी क्यूँ न ? ग़ालिब साहब का परिचय जो था। उस पुराणी दिल्ली की टेढ़ी मेढ़ी गलियों को लिए रूपक इस्तेमाल किया ' पेचीदा दलीलों की सी गलियां ' । मैं तो उस रूपक पर ही लट्टू हो गया। इस परिचय का एक एक शब्द किसी सुनार द्वारा सोने पर की गई नक्काशी के समान प्रतीत होता है। ग़ालिब के लिए गुलज़ार के मन का आदर देखिये, वो उनके घर को ' क़ुरान-ए-सुख़न ' यानि क़ुरान के पवित्र पन्ने की माफ़िक बताते हैं। गुलज़ार की ये लरज़ती आवाज़ सुनने के लिए नीचे विडियो लिंक भी दे रहा हूँ :
बल्लीमाराँ के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियां
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के क़सीदे
चाँद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
और धुंधलाई हुइ शाम के बेनूर अँधेरे साये
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की ' बड़ी बी' जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी 'गली क़ासिम' से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरान-ए-सुख़न का भी वर्क़ खुलता है
' असद उल्लाह खां ग़ालिब ' का पता मिलता है
बल्लीमाराँ के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियां
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के क़सीदे
चाँद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
और धुंधलाई हुइ शाम के बेनूर अँधेरे साये
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की ' बड़ी बी' जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी 'गली क़ासिम' से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरान-ए-सुख़न का भी वर्क़ खुलता है
' असद उल्लाह खां ग़ालिब ' का पता मिलता है
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