' दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वर-ऐ-जानां किये हुए '
( This is written by Ghalib and rest r from Gulzar pen )
जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर
आँखों पे खिंच कर तेरे आँचल के साये को
औंधे पड़े रहे, कभी करवट लिए हुए
या गर्मियों की रात में पुरवाइयां चलें
ठन्डे सफ़ेद बिस्तर पर जागे देर तक
तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए
बर्फीली सर्दियों की किसी रात में कभी
जा कर उसी पहाड़ के कोने में बैठकर
वादी में गूंजती हुई तन्हाईयाँ सुने
Voice : Bhupinder singh, Lata ji
Music : Madan Mohan
बैठे रहें तसव्वर-ऐ-जानां किये हुए '
( This is written by Ghalib and rest r from Gulzar pen )
जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर
आँखों पे खिंच कर तेरे आँचल के साये को
औंधे पड़े रहे, कभी करवट लिए हुए
या गर्मियों की रात में पुरवाइयां चलें
ठन्डे सफ़ेद बिस्तर पर जागे देर तक
तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए
बर्फीली सर्दियों की किसी रात में कभी
जा कर उसी पहाड़ के कोने में बैठकर
वादी में गूंजती हुई तन्हाईयाँ सुने
Voice : Bhupinder singh, Lata ji
Music : Madan Mohan