लीजिये गुलज़ार साब का एक और पुरस्कार प्राप्त गाना लेकर हाजिर हूँ। कई गाने बार बार सुनकर ही हम उनसे प्रभावित होते हैं लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि कोई भी इंसान इस गीत को पहली बार सुनकर ही जबर्दस्त प्रभावित हो सकता है। गुलज़ार इस गीत में भी अपने चरम पर नज़र आते हैं। स्वाभाविक भी है क्यूंकि यहाँ उनके साथ R. D. Burman जो हैं। कभी कभी सोचता हूँ कि क्या दौर रहा होगा वो जिसमें एक से बढ़कर एक सार्थक और साहित्यिक गीत लिखे जाते थे। ये गाना मेरे हिसाब से हर संगीत प्रेमी का favourite होगा। इसके पुरुष version में अनूप घोषाल ने आवाज़ दी तो महिला version में लता जी ने। और हाँ इस गीत ने filmfare पुरस्कार जीता 1984 का ।
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं
जीने के लिए सोचा ही नहीं दर्द सँभालने होंगे
मुस्कुराये तो मुस्कराने के कर्ज़ उतारने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे कर्ज़ रखा है.…तुझसे नाराज़ नहीं
ज़िन्दगी तेरे दर्द ने हमें रिश्ते नए समझाए
मिले जो हमें धुप में मिले छांव के ठन्डे साये
तुझसे नाराज़ नहीं....
आज अगर भर आई हैं बूँदें बरस जाएँगी
कल क्या पता इनके लिए आँखें तरस जाएँगी
जाने कब गम हुआ, कहाँ खोया
इक आंसू छुपा के रखा था.…तुझसे नाराज़ नहीं
