ऊपर मैंने शुरुआत तो नया ब्लॉगर बोल कर की है, लेकिन पूर्ण रूप से स्वयं को ब्लॉगर भी कहते हुए अटपटा लग रहा है…लेकिन शायद ऑनलाइन लिखने को यही कहा जा सकता है…
किसी ज़माने में शायरी लिखना, गाना बना लेना, या आर्टिकल बना लेना शायद यह कमोबेश मात्रा में कर लेता था या यूँ कहें कि इस ग़लतफ़हमी के पौधे को पानी दे दिया करता था…लेकिन आज जब ३७ का होकर अपने आप को अधेड़ों की श्रेणी में शामिल होते देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि लिखने की क्षमता कुंद हो चुकी है…ये सारे काम संवेदना से चलते है…और किस्मत ने मुझे डाला व्यापार में…जाहिर सी बात है, आदमी व्यापार करे तो संवेदना तो कहीं छुट्टी पर चली ही जाती है...लेकिन कहीं अपने भीतर अपने संवेदनशील इंसान को किसी तरह जिन्दा रखने की कोशिश तो की ही है…बल्कि उसे जिन्दा रखा है…ये में इसलिए कह पा रहा हूँ क्यूंकि गाहे बगाहे दूसरों के लिए आँखें आज भी नाम तो हो ही जाती है…और एक बात, श्रोता में आज भी बढ़िया हूँ, वाह वाही में जरा सी भी कंजूसी नहीं करता…लेखन मैं नहीं हूँ परन्तु दोनों दिग्गजों के लिए मेरे प्यार ने यह ब्लॉग बनाने को प्रेरित किया…
लेकिन भला हो इन्टरनेट का एवं यू ट्यूब का, जिनमें अपने पसंदीदा शायर और कवियों की रचनाएँ पढने एवं सुनने को मिली…विशेष रूप से गुलज़ार रचित सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब तथा मेरे अपने, आंधी, कोशिश, अंगूर, आनन्द ( डायलॉग ), जैसी क्लासिक फ़िल्में देखी…आप कहेंगे कि गुलज़ार ही क्यों, तो साहब आपको बताऊं कि गुलज़ार का बहुत बड़ा प्रशंसक तो मैं शुरू से रहा हूँ, परन्तु अब उससे एक कदम आगे निकल कर दीवाना हो गया हूँ…मेरा मानना है कि ये एक मात्र शायर और गीतकार है जिन्हें हर आदमी कमोबेश रूप से पसंद करता है…व्याकरण, शब्द सीमा से परे इनके जज़्बात होते इसी जहाँ के है, परन्तु सुनने वाले को अलग दुनिया में ले जाते हैं…
वैसे निदा फ़ाज़ली भी आम आदमी के दर्द को बड़ी ही गहराई से अपनी ग़ज़ल और नज़्म में पिरोते है…सबसे अधिक में शुक्रगुजार हूँ ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी का जिन्होंने आसान व मधुर धुनों में पिरोके मशहूर शायरों की ग़ज़लों को हम सब तक पहुँचाया…ग़ालिब की क्लिष्ट रचनाओं को भी इनकी धुनों ने आसान बनाया…इसीलिए इनके द्वारा संगीतबद्ध व गाई हुई ग़ज़लों को में यहाँ रखूँगा साथ ही साथ गुलज़ार साब की क्लासिक कविताएं तो होंगी ही, मेरे ब्लॉग का नाम इन दिग्गजों को आदरांजलि है और यहाँ अधिकतर बातें भी इन्ही की होने वाली है.…जो भी संगीत और साहित्य-रसिक इन्हें पसंद करता है उसके लिए ये मंच काफ़ी रुचिकर रहेगा और इस मंच को बेहतर बनाने के लिए comment द्वारा सुझाव भी बेझिझक रख सकते हैं
जाहिर सी बात है कि यह श्रोता आज लिख रहा है तो झेलना मुश्किल लग सकता है…परन्तु में अपनी बात चवन्नी जितनी और शायरी की बात बारह आने करूँगा, ये तय है…आज के शुभारम्भ हेतु इतना ही…जाते जाते गुलज़ार के शब्दों में :
” ज़िन्दगी लम्बी नहीं, बड़ी होनी चाहिए बाबु मोशाय “
इसी में जुटते है….
” श्री लाल राठी “
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