दो दीवाने शहर में रात में या दोपहर में
आबूदाना ढूंढते है इक आशियाना ढूंढते हैं
इन भूल भुलैया गलियों में अपना भी कोई इक घर होगा
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या खिड़की पे खुला अम्बर होगा
आसमानी रंग की आँखों में बसने का बहाना ढूंढते है
जब तारे जमीं पर चलते हैं आकाश जमीं हो जाता है
उस रात नहीं फिर घर जाता वो चाँद यहीं सो जाता है
पल भर के लिए इन आँखों में हम एक ज़माना ढूंढते हैं
आबूदाना ढूंढते है इक आशियाना ढूंढते हैं
इन भूल भुलैया गलियों में अपना भी कोई इक घर होगा
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या खिड़की पे खुला अम्बर होगा
आसमानी रंग की आँखों में बसने का बहाना ढूंढते है
जब तारे जमीं पर चलते हैं आकाश जमीं हो जाता है
उस रात नहीं फिर घर जाता वो चाँद यहीं सो जाता है
पल भर के लिए इन आँखों में हम एक ज़माना ढूंढते हैं
तो साहब गुलज़ार साब का एक और filmfare पुरस्कार जीती हुई रचना आप लोगों के सामने रखी है। फ़िल्म घरोंदा के लिए 1978 का उपरोक्त अवार्ड इन्होने जीता। जिसमे स्वर थे भूपिंदर और रुना लैला के, संगीत जयदेव का था। आपके लिए 1976 का अवार्ड जीता आंधी का गाना रख चूका हूँ। ये भी बता दूं कि 1977 में मौसम फ़िल्म के लिए गुलज़ार नामांकित हुए पर अवार्ड नहीं जीत पाये और वो कालजयी गाना था " दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन " परन्तु 1978 फिर ट्रॉफी पे कब्ज़ा किया।
प्रेमियों के लिए अपना एक आशियाना जहाँ वो प्यारी गुफ्तगू कर सके, हमेशा से ही रचनाकारों का प्रिय विषय रहा है। गुलज़ार उस दौर में भी अपनी सरलता में नवीनता का निर्वाह कर जाते हैं। प्रेमियों की खिड़कियां अम्बर से नीचे कैसे खुल सकती है भला ? इससे पहले तारों को जमीन पर कोई भी नहीं लाया शायद। अमोल गुप्ते ने आमिर खान के लिए जो फ़िल्म शुरू की उसका शीर्षक यहीं से लिया शायद " तारे जमीं पर " । चाँद से अठखेलियां तो गुलज़ार ऐसे ही करते हैं जैसे कोई बच्चा अपनी बॉल से। आज की पीढ़ी को नए रूपक अजीब नहीं लगते परन्तु उस दौर में ऐसे रूपक कभी कभी आलोचना के पात्र बन जाते थे। लेकिन जो नवीनता को पकड़ के अपने बटुए में रख लेता है वो ही गुलज़ार होता है।
