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Ghazal of Javed Akhtar

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है
हंसती आँखों में भी नमी सी है 

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था 
रात की नब्ज़ भी थमी सी है 

ख्वाब था या गुबार था कोई 
गर्द इन पलकों पे जमी सी है 

कह गए हम ये किस से दिल की बात 
शहर में एक सनसनी सी है 

हसरतें राख हो गई लेकिन 
राख़ अब भी कहीं दबी सी है