Jagjit singh : Mirage Album

Mirage : मृगतृष्णा


पिछले कुछ साल मुल्क के लिए बहुत निराशाजनक रहे हैं।  इस दौरान भ्रष्टाचार ध्वनि की गति से ज्यादा से भी तेज बढ़ा है।  मुल्क के रहनुमा ही इसे नोच नोच कर खाये जा रहे हैं।  अवाम हताश और निराश है। कल्पना करें इसी बीच कोई ज्योतिषि कहे कि 2014 बहुत ही उम्दा साल रहेगा इस मुल्क के लिए, तो अचानक से दिमाग में नई रौशनी सी कौंधती महसूस होती है।  यही बात शायर को पता चले तो वो कल्पना के सागर में गोते लगाने लगता है और अपनी उसका संवेदनशील मन नए ताने बाने बुनने लगता है।  लेकिन जब वो वापस हक़ीकत के धरातल पर आता है तो खुद को ही टोकता है और कहता है कि में भी कौनसे ख्वाब देख रहा हूँ जो कि पूरे हो ही नहीं सकते।  क्या वाकई हम इस हद तक निराश हो चुके हैं ? सबके अलग अलग जवाब हो सकते हैं।  इसी विषय पर बेहद खूबसूरत और झकझोरने वाली नज़्म। 

इक ब्राह्मण ने कहा है के ये साल अच्छा है !!!

ज़ुल्म की रात बहुत जल्द ढलेगी अब तो
आग चुल्हों में हर एक रोज़ जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोयेगा
चैन की नींद हर इक शख्स यहाँ सोयेगा
आंधी नफरत की चलेगी न कहीं अब के बरस
प्यार की फसलें उगाएगी ज़मीं अब के बरस
है यकीं अब न कोई शोर शराबा होगा
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून खराबा होगा
ओस और धूप के जलवे न सहेगा कोई
अब मेरे देस में बेघर न रहेगा कोई

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है के ये साल अच्छा है

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है। 

                                 " साबिर दत्त "

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रिश्ता क्या है तेरा मेरा 
मैं हूँ शब और तू है सवेरा । 

तू है चाँद सितारों जैसा 
मेरी किस्मत घोर अँधेरा । 

फूलों जैसी राहें तेरी 
कांटो जैसा मेरा डेरा । 

आता जाता है ये जीवन 
पल दो पल का रैन बसेरा । 

                     " Ramal Sahgal "

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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम है 
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है 
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं 

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से 
किसको मालूम कहाँ के है किधर के हम हैं 

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब 
सोचते रहते हैं किस राहगुजर के हम हैं 

                                 " Nida Fazli "

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दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले 
हम अपने बुजुर्गों का ज़माना नहीं भूले 

तुम आँखों की बरसात बचाये हुए रखना 
कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले 

ये बात अलग हाथ कलम हो गए अपने 
हम आपकी तस्वीर बनाना नहीं भूले 

इक उम्र हुई मैं तो हंसी भूल चुका हूँ 
तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले 

                                           " Sagar Aazmi "

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मय रहे मीना रहे, गर्दिश में पैमाना रहे 
मेरे साक़ी तू रहे, आबाद मैखाना रहे 

हश्र भी तो हो चुका, रुख से नहीं हटती नक़ाब 
हद भी आखिर कुछ है, कब तक कोई दीवाना रहे 

रात को जा बैठते हैं रोज हम मजनू के पास 
पहले अनबन रह चुकी है अब तो याराना रहे 

ज़िन्दगी का लुत्फ़ हो उड़ती रहे हरदम ' रियाज़ '
हम  हो शीशे की परी हों, घर परीखाना रहे 

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ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं 
और क्या ज़ुल्म है पता ही नहीं 

इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं 
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं 

सच घटे या बढे तो सच ना रहे 
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं 

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में 
आइना झूठ बोलता ही नहीं 










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