जब हम छोटे थे, तब गोबर से बने उपले जलाने के काम आया करते थे क्यूंकि उस ज़माने में गैस सिलिंडर वगैरह हुआ नहीं करते थे तो ये उपले और लकड़ी ही ईंधन का काम करती थी। इन जलते हुए उपलों को देखकर कवि गुलज़ार ने इनको रूपक बनाते हुए बड़ी ही मार्मिक और गहरी बात नीचे की कविता में कही है। एक एक उपले को इंसान का रूप बनाते हुए बात बहुत सरलता से हमारे दिल में उतर जाती है और हमारे नश्वर होने की याद दिलाती है। प्रस्तुत है ये कविता :
छोटे थे, माँ उपले* थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर - नाक सजाकर
पगड़ी वाला, टोपी वाला - मेरा उपला, तेरा उपला
अपने अपने जाने पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता खेलता सूरज रोज सवेरे आकर
गोबर के उपलों पर खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक़्त के चूल्हे में
इक दोस्त का ऊपला और गया !
*उपला - गोबर से बनी गोल टुकड़ी जो जलाने के काम आती है
छोटे थे, माँ उपले* थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर - नाक सजाकर
पगड़ी वाला, टोपी वाला - मेरा उपला, तेरा उपला
अपने अपने जाने पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता खेलता सूरज रोज सवेरे आकर
गोबर के उपलों पर खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक़्त के चूल्हे में
इक दोस्त का ऊपला और गया !
*उपला - गोबर से बनी गोल टुकड़ी जो जलाने के काम आती है

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