" दर्द हल्का है, सांस भारी है /जिए जाने की रस्म जारी है
आपके बाद हर घडी हमने/ आपके साथ ही गुजारी है!... "
" मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे…
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते,
फिर मिलेंगे, तब तक जय जय…. " श्री लाल राठी "
आपके बाद हर घडी हमने/ आपके साथ ही गुजारी है!... "
ये शायरी तो पढ़ते ही समझ आ गया होगा, कि ये गुलज़ार शैली की लगती है… तो जनाब बता देते है कि ये इन्ही हुजुरात की कलम का कमाल है…य़ह कहाँ उपयोग आई है ये भी बता देते है.....यह ग़ज़ल है the voice from beyond एल्बम से, जिसे अभी ही रिलीज़ किया गया है on universal music …. मरने के बाद भी कोई इंसान कैसे जिन्दा रह सकता है, इसकी मिसाल है ये एल्बम …जगजीत सिंह जिनके प्रशंसक भारत में किसी भी दुसरे ग़ज़ल गायक से कई गुना ज्यादा होंगे……आज भी जब वो इस दुनिया में नहीं है…आम इंसान की जिंदगी में सुरीली ग़ज़ल की घुसपैठ करने वाले इस दिवंगत गायक को याद करके ग़ज़ल प्रेमियों के दिल में टीस सी उठती है कि ऐ मौला ऐसे शख्स को हजारों साल जीना चाहिए…किसी इंसान की जिंदगी में साहित्य शब्द ( जो मै यहाँ शायरी एवं कथा के लिए प्रयोग कर रहा हु ) क्या महत्व हो सकता है, जो उसकी पूरी जिंदगी को राह दे दे,
इससे सभी वाकिफ़ & सहमत होंगे परन्तु मेरी जिंदगी में इसने माता पिता के बाद गुरु वाला किरदार निभाया है…इस पाठशाला के प्रधानाचार्य ग़ालिब तथा शिक्षक मीर, गुलज़ार , निदा फाजली, अहमद फ़राज़, कैफ़ी आज़मी और ढेर सारे अन्य शायर रहे है… परन्तु इस पाठशाला में दाखिला दिलाने वाला शख्श जगजीत ही थे…हम शायद अच्छे शायरों को सुन ही नहीं पाते अगर जगजीत नहीं होते.....ग़ालिब की शायरी के बारे में सोचते है तो उसे आवाज़ में ढालने के लिए सिर्फ इनकी ही याद आती है…ये उस सीरियल का कमाल है कि ग़ालिब की शक्ल सोचने पर नसीरुद्दीन याद आते है और आवाज़ के लिए जगजीत….ग़ज़ल को शास्त्रीय फॉर्मेट से निकाल कर सुरीले सामान्य संगीत में पिरोने का काम इस जादूगर ने किया ….इसिलिये गुलज़ार साब ने इनका नामकरण किया गजलजीत सिंह…
लो जी, ये तो में अचानक ही बैठ गया लिखने, परन्तु अगर सोच कर लिखता तो शायद कुछ पेज बन ही जाते … इनकी ग़ज़ल को आम रूचि में ढालने की बात पर ये नज़्म याद आती है गुलज़ार की :
" मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे…
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते,
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ,
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो,
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता,
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती है मेरे यार जुलाहे,
मुझको भी तरकीब सिखा दे कोई यार जुलाहे "
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो,
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता,
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती है मेरे यार जुलाहे,
मुझको भी तरकीब सिखा दे कोई यार जुलाहे "
तो साहब जुलाहे जगजीत के पास जो तरकीब ग़ज़ल के ताने को दिल के बाने तक मिलाने की थी….वो तरकीब तो ढूंढना दूर की कौड़ी लगती है…हम तो दुआ करेंगे कि फिर कोई इन जैसा उस्ताद पैदा हो और फिर हम ग़ज़ल की गहराइयों में गोते लगा सके...
फिर मिलेंगे, तब तक जय जय…. " श्री लाल राठी "
